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सरकारें बना रही पत्रकारिता पर दबाव

सरकारी तंत्र का दुरूपयोग करके पत्रकारिता पर दबाव बनाना सरकारों का अब एक हथकंडा हो चुका है। मुख्य तीन स्तंभ को अपने कब्जे में लेने के बाद अब कथित चौथे स्तंभ को भी मोड़ने की कोशिश की जा रही है। लोकतंत्र के सभी चारो स्तंभ लगभग सरकार के शरणागत हो चुके हैं, जो नहीं हुए उन्हें किसी भी हद तक जाकर गुलाम बनाया जा ‌रहा है। हाल के दिनों में जिस तरह से हाईकोर्ट में जजों की राजनैतिक नियुक्तियां करवाई गयी है, जिस तरह से आईएएस, आईपीएस राजनैतिक विशेष पार्टियों के लिए काम कर रहे हैं, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका पूरी तरह शरणागत हुए से दिखने लगे हैं। बीच बीच में दो‌ चार जजमेंट करके भले ही सुप्रीम कोर्ट और गिने चुने हाईकोर्ट के जज सुर्खियों में आ जाएं, वरन अब तो न्यायालय और न्यायपालिका से लोगों का भरोसा उठने सा लगा है। अपराधियों के लिए सहूलतें बढ़ती जा रही हैं, पीड़ित लगातार प्रताड़ित होते जा रहे हैं। लोक तंत्र से लोक गायब है, जन तंत्र से जन, न्यापालिका‌ से न्याय गायब है, व्यवस्थापिका से व्यवस्था, कार्यपालिका से कार्य गायब है, बची हुई थी मीडिया उससे अब समाचार गायब हो रहे हैं। अगर सरकार ने कह ...

नदियां हमारी मां है, उसके हम उपभोक्ता नहीं हो सकते, इसलिए नदी तीर्थ‌ शुरू करे सरकार

नदीवेता और पूर्व सांस्कृतिक राजदूत फिजी प्रो. ओमप्रकाश भारती प्रेस क्लब के पहुना कार्यक्रम में पहुंचे। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नदियों को मां का दर्जा प्राप्त है। पहले सरकार ने ब्रिटिश अधिनियम की नकल कर देश की नदी नीति बनाकर समाज से नदियों को छीन ली और अब सरकारें यूरोपीय देशों की नकल कर यहां नदी पर्यटन की बात कह रही हैं। जबकि नदियां हमारी मां है, मां का कोई उपभोक्ता नहीं हो सकता। नदियां मानव के पृथ्वी पर आने से‌ हजारों लाखों साल पहले से पृथ्वी पर मौजूद हैं तभी तो उसले किनारे पर मानव बसा, इसके उदाहरण अब मिल रही सभ्यताएं हैं। उन्होंने बिलासपुर के पत्रकारों को धन्यवाद देते हुए कहा कि  अरपा को लेकर यहां के पत्रकारों ने जितना लिखा है, उतना महत्व गंगा नदी को मध्य भारत के पत्रकारों ने नहीं दिया। आगे कहा कि कुछ समय से नदी पर्यटन को लेकर बात चल रही है, यह अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए नियम लागू किया जाना चाहिए। बल्कि यह कहूंगा कि नदी टूरिज्म की जगह नदी तीर्थ शुरू करें, जिससे समाज की आस्था उस पर रहे। प्रो. भारती ने आगे कहा कि नदी पर सबसे ज्यादा अधिकार समाज का है, लेकिन कार्पोरेट इसका...

ट्रेंड बदला: शादियों से गारी हुई गुम, फिल्मी गानों पर अब घराती थिरकते हैं

शादी में डांस का परफार्मेंस अच्छा हो इसके लिए महंगे इवेंट मैनेजर रखे जा रहे है। डां स का स्टेप व मूवमेंट की तैयारी करते हैं , ड्रेस कोड ने भी अलग पहचान  बनाई हुई है। शादियों का सीजन चल रहा है और ऐसे में शादियों की बात न हो, उनकी प्रथाओं और परंपराओं की बात न हो ऐसा हो नहीं सकता। जब हम किसी शादी विवाह में जाते हैं हमें तो कुछ ना कुछ नए ट्रेंड देखने को मिलता है। अब शादी गांव की हो या शहर की हर जगह की शादी में अब बदलाव देखने को मिल रहा है। हालांकि पुराने जमाने से लेकर नए जमाने की तुलना नहीं हो रही है। लेकिन वास्‍तव में देखें तो पुरानी शादियों और अब की शादियों के तरीकों में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। याद है मुझे पहले बड़े अदब से ब्‍याह-शादियां होती थीं, जो अब सब बदल रहा है। खासकर शादियों की गीत-गालियां (गारी) अब गुम हो गई हैं। पहले फिल्मी गानों पर बराती डांस किया करते थे, अब घराती भी थिरकते दिखते हैं। इतना ही नहीं शादी में डांस का परफार्मेंस अच्छा हो इसके लिए महंगे इवेंट मैनेजर तक नियुक्त किए जा रहे हैं। ये मैनेजर डांस के प्रशिक्षक के माध्चयम से दुल्हा और दुल्हन परिवार के लोगों को ...

सुपर सीएम की प्रथा छत्तीसगढ़ में जारी है

 छत्तीसगढ़ में सुपर सीएम की एक बार फिर बात निकलकर आ रही है। छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़िया का यह दुर्भाग्य ही कहेंगे की निर्वाचन में जनता अपने लिए जन प्रतिनिधि का चुनाव करती है और यही जन प्रतिनिधि सत्ता में आने के बाद अधिकारियों को सुपर सीएम बना लेते हैं। अजीत जोगी के समय से चली आ रही व्यवस्था को डाॅ. रमन के समय अमन सिंह को और अब भूपेश बघेल के समय सौम्या चौरसिया को कथित सुपर सीएम घोषित किया जाना राज्य की जनता के वोट पर करारा प्रहार होने के साथ ही लोकतांत्रिक गणराज्य को मजाक बना दिया गया है। इधर ईडी ने छत्तीसगढ़ की कथित सुपर सीएम को कथित भ्रष्टाचार के मामले में हिरासत में ली है। राज्य मेंववैसे आई तो झारखंड पुलिस भी है भाजपा के नेता और भानुप्रतापपुर के प्रत्याशी को गिरफ्तार करने पर लगता है हौंसला नहीं कर पा रही या फिर राज्य की सरकार सहयोग नहीं कर पा रही। चाचा कह रहे थे बात जो भी हो चोर चोर मौसेरा भाई होते हैं, डाॅ. रमन के समय हुए कथित घोटालों में अब वर्तमान की कांग्रेस सरकार की संलिप्त होना उजागर हुआ है। जो भी हो जनता के धन का सरकार में कोई भी रहे जमकर दुरुपयोग हो रहा है।

सरकार नहीं निभा पा रही जिम्मेदारी

 इसी ठंड के महीने की बात थी 2014 में बिलासपुर में नया नया आया था, कुछ माह ही बीते थे, रायपुर में तीन साल रहने के बाद यहां मौका मिला था, चुनौती थी सबकुछ समझने की। अब तब अखबारों से रिपोर्टर की खबर टाइप करने के लिए लगाए गये कंप्यूटर टाइपिस्ट हटा दिए गये थे। ऐसे में लंबी लंबी खबर लिखने पर हर दिन समझाइश दी जाती और कभी कभार सीनियर से डांट भी पड़ती थी। हालांकि वक्त का पहिया चलता जा रहा था, मुद्दे की बात यह है कि ऐसे ही ठंड के समय में कानन पेंडारी के पास कैंसर के इलाज के लिए एक परिवार द्वारा दान की गयी जमीन और अस्पताल में महिला नसबंदी शिविर लगाई गयी।   जहां बड़ी संख्या में आस-पास की‌ महिलाओं की नसबंदी की गयी। साथ ही कयी दवाइयों के साथ जहरीली सीप्रोसिन 500 दवा भी विपरीत कर दी गयी। यह दवाइयां  सरकार ने सप्लाई की गयी थी। इसे खाने के बाद एक एक कर महिलाओं की तबीयत बिगड़ने लगी और फिर एक के बाद एक महिलाओं की मौत होने लगी। इस घटना के बाद प्रदेश के स्वास्थ्य का सच सामने आया और मीडिया के माध्यम से एक के बाद एक पोल खुलता चला गया। इसके कयी साल बाद सिम्स में एक घटना घटी जिसमें पता चला कि...

प्राचार्य के भाषण का डर

 प्राचार्य के हाथ में माइक देखकर प्रोफेसर डाल लेते हैं कान में रूई यह पढ़कर आश्चर्य में मत पड़िए यह हकीकत बिलासपुर में एक कॉलेज की प्राचार्य के भाषण का है। वैसे तो बिलासपुर में सौ से ज्यादा कॉलेज हैं लेकिन इस काॅलेज की बात ही कुछ अलग है। यहां के छात्र से लेकर प्रोफेसर तक में भाषण को लेकर दहशत महसूस किया गया है। कोई छात्र हो या प्रोफेसर मैडम का भाषण शुरू होने वाला है इतना सुनकर ही भयभीत हो जाते हैं यह भय इतना है कि वे इस बारे में बात तक नहीं करते। भय का माहौल ऐसा है कि मैडम प्राचार्य के हाथ में माइक देखकर ही प्रोफेसर कान में रूई डाल लेते हैं। वहीं प्राचार्य मैडम एक बार भाषण देना शुरू कर दीं तो फिर किसी की मजाल नहीं है कि उन्हें कोई टोक दे। भाषण देने से रोक ले ऐसा हिम्मत किसी में नहीं है। इतना ही नहीं कॉलेज में कोई कार्यक्रम होने वाला है इस बात की जानकारी होने और प्राचार्य का भाषण होगा इतनी सी जानकारी मात्र से कॉलेज के प्रोफेसर अपने जेब में रुई डालकर लाते हैं और भाषण के समय कान से खून न निकल जाए इससे पहले ही वे अपने कान में डाल लेते हैं। इतना ही नहीं बच्चे कार्यक्रम छोड़कर गायब हो जात...

बढ़ते अपराध पर पुलिस का नियंत्रण नहीं

 एक समय था जब बिलासपुर रहने के लिए सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले शहरों में से एक हुआ करता था। लेकिन अब न तो शहर रहने लायक है, न शहर की सड़क चलने लायक, अपराध, नशाखोरी का गढ़ बनता जा रहा है छत्तीसगढ़। लाॅ एंड आर्डर नहीं सुधर रहा, आईजी बीएन मीणा सबसे सख्त एएसपी और एसपी रहे हैं, अब उनके आईजी बनने से पहले जैसी ही उम्मीद है कि वे अपराधियों पर लगाम लगाने में सफल रहेंगे। जिस तरह दिनदहाड़े गोली चल रही है, एसएसपी हत्या के चंद घंटे में मरने वाले के ही अपराध की जानकारी दे रही हैं, जैसे पुलिस मान रही हो कि ठीक हत्या हुआ। इसके बाद भी‌ लगातार हत्याएं हो रही हैं उससे ऐसा लगने लगा है जैसे कानून का भय खत्म हो रहा है। आज एक नया निर्देश एसएसपी ने मीडिया के लिए जारी की हैं, उनके मुताबिक मीडिया काम करे, पुलिस मीडिया के अनुसार कब काम की है जो‌ मीडिया से उम्मीद करती है मीडिया उनके अनुसार काम करे। अब तो लगनर लगा है कि पुलिस ही अपराधियों के साथ मिलकर घटनाओं को‌अंजाम दे रही है। क्योंकि पुलिस द्वारा अपरिपक्व हरकत किया जा रहा है।  पुलिस की गश्ती कम होने के साथ ही कोर्ट से अपराधियों को सजा देने और जमानत म...

ताप मान

  भारत में इन दिनों गर्मी का मौसम चल रहा है। ऐसे में तापमान का बढ़ना भी स्वाभाविक है। पिछले कई दशक से लगातार तापमान बढ़ता जा रहा है। इसको लेकर पूरी दुनिया चिंतित है। होना भी चाहिए क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग से न सिर्फ इंसान, पेड़, पौधे, पशु व पक्षियों के साथ ही पर्यावरण और हमारे वातावरण पर व्यापक असर पड़ रहा है। एक तरफ बर्फ पिघल रही है, दूसरी तरफ ओजोन परत में भयंकर छेद हो चुका है। इस विषय से इत्तर हाल ही में मान ताप देखने को मिला। एक तरफ जहां गर्मी से लोग पसीना-पसीना होकर एसी, कूलर और पंखे से राहत पाने की कोशिश कर हैं। इधर पंजाब के मुख्यमंत्री मान साहब का ताप अपने ही मंत्री के लिए बढ़ गया। उनके तापमान कहें या मान ताप का असर यह हुआ कि इस भीषण गर्मी में मंत्री जी को जेल की हवा खानी पड़ी। हालांकि पंजाब में इस बार नई गर्मी का असर लू के थपेड़े जैसे महसूस हो रहा है। इधर वैज्ञानिक अध्ययन की माने तो तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है उसका कारण बढ़ती आबादी, पेड़-पौधों की घटती संख्या और पर्यावरण में बदलाव ही नहीं शहर का क्रांक्रिटीकरण भी है। घर सीमेंट के, सड़कें सीमेंट की, बाग, बगीचे और फुलवारी, गली सबक...

पेट्रोल का दाम नहीं गाड़ी का माइलेज कम हुआ है

  गाड़ी बनाने वाली कई कंपनियों ने प्रचार किया कि एक लीटर में 100 तो किसी ने 110 किलोमीटर तक माइलेज देने का दावा की। इधर पेट्रोल का दाम बढ़ने के बाद इन गाड़ियों को खरीदने वाले परेशान हैं कि उनके गाड़ी का माइलेज कम हो गया है। उनके लिए ही यह लेख है, उन्हें स्पष्ट और पूरे होशोहवाश में बताना जरूरी है कि उनके गाड़ी का माइलेज माइलेज कम हुआ है। क्योंकि अगर वे पोट्रोल के बढ़ते दाम को देखेंगे तो गाड़ी का उपयोग कम करेंगे। इससे टैक्स कम वसूल होगा सरकार के खाते में कम पैसा जाएगा। ऐसा हुआ तो लाखों रुपए वेतन और कई हजार रुपए का पेंशन पाने वाले नेता भूखमरी के शिकार हो जाएंगे। आप ऐसा कतई न करें, उनके भी बाल बच्चे हैं, बाल बच्चे नहीं है तो बाहर वाली, कोठेवाली, मसाजवाली तो हैं ही जहां वे सेवा लेने जाते हैं। उसका खर्च कैसे निकलेगा। यही टैक्स के पैसे से तो वे उधर अपना तनाव और थकान दूर करेंगे। इसलिए पेट्रोल का दाम नहीं बल्कि गाड़ी का माइलेज कम हुआ है, इस पर ही ध्यान केंद्रित करके रखें। एक बात और अभी 110 रुपए पेट्रोल का भाव है इससे ज्यादा होने पर दुखी न हों क्योंकि अभी नशे का सामग्री तैयार हो रहा है। चूरण देने क...

झुलसना तय है निजीकरण की आग में

  हाल के दिनों में निजीकरण की चर्चा अपने चरम पर है। जहां कुछ वर्ग इसका विरोध तो कुछ वर्ग इसके समर्थन में दिख रहे हैं। इन सबसे इत्तर अगर बात करें तो किसी भी चीज का उपाय निजीकरण नहीं हो सकता। एक तरफ जहां केंद्र की सरकार ने निजीकरण की आग लगाकर हाथ सेंक रही है, वहीं दूसरी तरफ केंद्र की देखा देखी राज्य की सरकारों ने भी सरकारी संस्थाओं को निजीकरण की आग में झोंक दिए हैं। हर तरफ फैली निजीकरण की आग में झुलसना मानों तय है। लेकिन एक बात देखने को मिल रही है कि निजीकरण के समर्थन में निजी कंपनियों में काम करने वाले लोग भी हैं। यह वे लोग हैं जो अपनी संस्था के फैसले पर मालिकों को कोसते हैं, लेकिन सरकार के फैसले का समर्थन इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिली और जिनको मिली है उनकी नजर में वे कामचोर हैं। अपनी कमजोरियों का खिझ वे उन सरकारी कर्मचारियों पर निकाल रहे हैं जो मेहनत करके रात-दिन की तैयारी करके सैकड़ों बार परीक्षा, साक्षात्कार में बैठकर उपलब्धि हांसिल किए हुए होते हैं। इन नाकारत्मक सोच में सबसे ऊपर पत्रकार हैं। मैं भी एक पत्रकार हूं और मुझे भी लगाता है कि सरकारी कर्मचारी कामचो...