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अयोध्या यात्रा वृतांत: पुर सोभा कछु बरनि न जाई भाग -1

प्र बिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।             य ह चौपाई हमारी यात्रा पर सटीक बैठती है। भगवान राम का नाम लेकर और भक्त शिरोमणी महाबली हनुमान जी को प्रणाम कर हमारी यात्रा उस नगर, उस शहर, उस राज्य और राजधानी की ओर निकली जिसकी शोभा का वर्णन करना इतना कठिन है कि रामचरितमानस के रचयिता आदिकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि और उनके अवतार माने जाने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा "पुर सोभा कछु बरनि न जाई"  जिस शहर की ओर हम निकल आए हैं उस शहर को हम देखकर लालायित और आनंदित बस हो सकते हैं, उसकी व्याख्या शब्दों से नहीं कर सकते। गोस्वामी तुलसीदास ने जिस तरह से भगवान राम की व्याख्या की है उस तरह से कोई और नहीं कर सकता। गोस्वामी तुलसीदास ने इस नगर की व्याख्या करते हुए रामचरितमानस में लिखते हैं -  चौपाई दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।। पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।। राजघाट सब बिधि सुंदर बर।  मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।। तीर तीर देवन्ह के मंदिर। ...

अयोध्या यात्रा वृतांत: पुर सोभा कछु बरनि न जाई भाग - ।2

दूसरा दिन 18 जनवरी 2024        दू सरे दिन की यात्रा मां महामाया को प्रणाम कर रतनपुर से शुरू हुई। यात्रा अचानकमार टाइगर रिजर्व की घाटी से बढ़ते हुए पेंड्रा पहुंची।  यहां पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई, उनके साथ भोजन और फिर वहां से यात्रा गौरेला से आगे बढ़ गई। हमारी मोटर साइकिल दनदनाते हुए वेंकटनगर से मध्यप्रदेश में प्रवेश कर अनूपपुर पहुंच गई। इस दौरान रास्ते में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की सीमा वेंकटनगर में ही बलौदा बाजार से अयोध्या यात्रा के लिए निकले साइकल यात्रियों से मुलाकात हुई। उनके साथ कुछ समय चर्चा करने के बाद हम अनूपपुर पहुंच गए।         अनूपपुर में यात्रा पर अल्प विराम लगा। हम अपने मामा जी के यहां पहुंचे। कुछ समय आराम करने के बाद एक बार फिर यात्रा की शुरुआत हुई। अनूपपुर में ही कुछ और दोस्तों से मुलाकात होने पर उनके साथ कुछ समय बिताने के बाद हम शहडोल के लिए आगे बढ़ गए। अमलाई कागज मिल से होते हुए शहडोल और फिर शहडोल के बायपास में जायसवाल ढाबा में थकान मिटाने और बढ़ती ठंड से बचाव के लिए रुके। यह खुद के भीतर कप में भर भर कर चाय रु...