अयोध्या यात्रा वृतांत: पुर सोभा कछु बरनि न जाई भाग -1
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
यह चौपाई हमारी यात्रा पर सटीक बैठती है। भगवान राम का नाम लेकर और भक्त शिरोमणी महाबली हनुमान जी को प्रणाम कर हमारी यात्रा उस नगर, उस शहर, उस राज्य और राजधानी की ओर निकली जिसकी शोभा का वर्णन करना इतना कठिन है कि रामचरितमानस के रचयिता आदिकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि और उनके अवतार माने जाने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा "पुर सोभा कछु बरनि न जाई" जिस शहर की ओर हम निकल आए हैं उस शहर को हम देखकर लालायित और आनंदित बस हो सकते हैं, उसकी व्याख्या शब्दों से नहीं कर सकते। गोस्वामी तुलसीदास ने जिस तरह से भगवान राम की व्याख्या की है उस तरह से कोई और नहीं कर सकता। गोस्वामी तुलसीदास ने इस नगर की व्याख्या करते हुए रामचरितमानस में लिखते हैं -
चौपाई
दूरि फराक रुचिर सो घाटा।
जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।
पनिघट परम मनोहर नाना।
तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।।
राजघाट सब बिधि सुंदर बर।
मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।
तीर तीर देवन्ह के मंदिर।
चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।।
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी।
बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।।
तीर तीर तुलसिका सुहाई।
बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।।
पुर सोभा कछु बरनि न जाई।
बाहेर नगर परम रुचिराई।।
देखत पुरी अखिल अघ भागा।
बन उपबन बापिका तड़ागा।।
छंद
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं।
सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं।।
बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।।
दोहा/सोरठा
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।
मन में जय सिया राम और सीता राम की धूनी रमाए हमारी यात्रा भगवान राम के ननिहाल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के एक जिले बलौदा बाजार के जिला मुख्यालय से रॉयल एनफील्ड थंडरबर्ड मोटर साइकिल से 17 जनवरी 2024 की करीब शाम 7 बजे भक्त शिरोमणी महाबली हनुमान जी की पूजा अर्चना कर शुरू हुई। भगवान राम की नगरी अयोध्या के लिए निकली हमारी यह यात्रा इतना आसान और सरल नहीं थी। क्योंकि ठंड का असर अपने चरम पर था, कदम कदम पर अहसास दिला रहा था कि यात्रा कितना कठिन होने वाला है। लेकिन प्रभु राम के दर्शन के लिए निकले थे तो तकलीफ चाहे जो आ जाए वापस लौटने का निर्णय नहीं लेने वाले थे। यात्रा बलौदा बाजार से भाटापारा और फिर वहां अल्प विराम कर आगे बढ़ गई। हम रायपुर- बिलासपुर मुख्य मार्ग से होते हुए भोजपुरी टोल प्लाजा और वहां से पेंड्रीडीह बायपास से मां महामाया की नगरी रतनपुर पहुंच गए। रात में जंगल का सफर और आगे बढ़ते जाने का जुनून ठंडी हवाओं ने कुछ इस तरह से रोक रही थी मानो कह रही हो बस आज का सफर यहीं खत्म कर दो। हम थे कि हमारे ऊपर राही मासूम रज़ा की वह लाइन कुछ इस तरह से फिट बैठी थी कि
इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई।
रतनपुर में बिगड़े मौसम के मिजाज ने हमें अपनी यात्रा को अल्प विराम देने पर मजबूर किया। पहले दिन की यात्रा सर्किट हाउस में खत्म हुई।
जय सिया राम
हमारी यात्रा आपको कैसी लगी आपकी टिप्पणी अवश्य भेजें।
©® दीपेंद्र शुक्ला
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