पुस्तकालयों की घटती संख्या और हम

दीपेंद्र की कलम से...
क्या है? क्यों है, क्या हुआ था? कैसे हुआ था? और आने वाले समय में उससे क्या उम्मीदें होती। इन सारे सवालों के जवाब इतिहास से हीं मिलते हैं। यह इतिहास हमें कहां से मिलता है या तो दादा दादी की कहानियों में या फिर पुस्तकों में। अब एकल परिवारवाद जोरों पर है तो कोई भी अब अपने मां बाप के साथ नहीं रहता। जब वह साथ नहीं रहता तो बच्चे अपने दादा दादी से दूर होंगे। इतिहास तो बच्चों को पता नहीं चलेगा। बच्चे कैसे जाने की इतिहास क्या है। इसके लिए पुस्तक है जो बताती हैं कि इतिहास क्या है? वर्तमान में जो हम देख रहे हैं वह इतिहास की देन है और जो वर्तमान है वह भविष्य है। अब ऐ पुस्तकें कहां मिलेंगी जिससे इतिहास की जानकारी हो तो फिर याद आता है कि पुस्तकों को संग्रह किया जाता रहा है पुराने समय से यह प्रक्रिया चलती आ रही है। राजा रानी सभी की कहानियां और इतिहास इसी से तो पता चलता है कि कौन सा राजा कैसा था और वह अपनी रानी और प्रजा के साथ कैसे रहता था। जानकारी देने वाली यह पुरानी पुस्तकें मिलेगी कहा से जब यह बात याद आती है तो हम संग्रहालय की तरफ रूख करते हैं कि पुस्तक वहां मिल जाए हमारे इतिहास के बारे में जानकारी मिल जाए यहीं से पुस्तकालय की नीव पड़ती है। पुस्तकालय की सबसे ज्यादा जरुरत वैज्ञानिकों को भी होती है उन्हे इससे पता चलता है कि कौन सी चीज की वैज्ञानिक प्रक्रिया की जा चुकी है और किस चीज का परिणाम क्या आया था। ऐसे में वैज्ञानिक भी पुस्तकालय और पुस्तकों को लेकर बेहद संजीदा होते है। पुस्तकालयों में तो सालों साल पुस्तकें सुरक्षित रहती है और पुराने इतिहास, रिसर्च और कहानियों के बारे में बताती हैं। इसको संग्रह करने के लिए पहले सैकड़ों साल पहले आंदोलन हुआ ताकि पुस्तकालय का निर्माण हो। फिर निर्माण हुआ और उसमें पुस्तके सुरक्षित है। अब क्या पुस्तकें वाकई में सुरक्षित है तो इसका जवाब होगा कि पुस्तकालय ही जीर्ण शीर्ण है तो पुस्तक यहा कैसे सुरक्षित होंगी। पहले सार्वजनिक पुस्तकालय हुआ करते थे वहां पर पुस्तक के अलवा अखबार और पत्रिकाएं होती थी जिसे पढ़ने के लिए लोग रोज पुस्तकालय खुलने का इंतजार करते थे। इंटरनेट युग आ जाने से उन पुस्तकों के दिन लदने लगे हैं आज एक क्लिक पर पुस्तक सामने जिस प्रकार के पुस्तक चाहिए वे सब आपके हाथ में है। उपन्यास पढ़ना हो या कहानी मैग्जीन पढ़नी हो या समाचार पत्र आज सब मोबाइल पर उपलब्ध है बस इंटरनेट के कुछ चार्ज कटेंगे और वे आपके पास उपलब्ध हो जाता है। यह नहीं है कि पुस्तक पढ़ने के शौकिन नहीं है या पुस्तक लोग पढ़ना नहीं चाहते सब पुस्तक पढ़ना चाहते हैं और पहले जैसे ही धुनी लोग आज भी है पुस्तक पढ़ने के शौकिन भी उतने हीं है, पर कोई भी संग्रहालय नहीं बनाना चाहता मेहनत ज्यादा लगता है और फिर एक बार पुस्तक पढ़ लेने के कारण उसे कोई दोबारा पढ़ना नहीं चाहता जो संग्रहालय बनाए भी है उनके यहां की कहानी भी बहुत खराब है उनसे लोग पुस्तकें तो ले जाते हैं पर उसे वापस नहीं करते तो उससे भी संग्रहालय खत्म होते जाते है। इस और ध्यान देना जरुरी है। अगर पुस्तकालय खत्म हो गए तो इतिहास की जानकारी नहीं होगी। जो लोग संग्रहालय बनाए हैं उनकी मदद होनी चाहिए जो लोग एक बार पुस्तक बढ़ लेते है वे उन संग्रह कर्ता को दें ताकि वे अपने संग्रहालय में उसको स्थापित कर दें। साथ ही जो उस संग्रहालय से पुस्तक लें वे वापस भी करें ताकि स्थिति समान्य हमेशा बनी रहे। अभी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी तक पुस्तकालय सिमित हो गई है। कुछ विद्वान लगातार प्रयासरत है कि वे पुस्तकालय का निर्माण करें और बेहतर संग्राहलय में अच्छी पुस्तकों का संग्रह रखे ऐसे लोग अगर शहरों में है तो उनकों पढ़ने वाले संपर्क करें और पढ़ी हुई पुस्तक देकर मदद तो कर ही सकते है। किताबें हमें बेहतर जिंदगी का रास्ता बताती हैं। किताबों के घर यानी पुस्तकालय की इसमें अहम भूमिका है। यूरोप के एक मशहूर पुस्तकालय का आज जन्म दिन है, नीदरलैंड्स में लीडन यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी की शुरूआत 1587 में आज ही के दिन 31 अक्टूबर को हुई थी। इस पुस्तकालय को यूरोप की सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण दर्जा दिया जाता है। सांस्कृतिक विकास और ज्ञान-विज्ञान के प्रसार में जिन केंद्रों ने अपना योगदान दिया, उनमें इस पुस्तकालय का महत्व बहुत अधिक माना जाता है। पुस्तकालय की विशालता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यहां 35 लाख पुस्तकों के साथ 10 लाख ई-बुक्स, करीब 30 हजार ई-जर्नल्स, 60 हजार पांडुलिपियां और 12 हजार ड्रॉइंग्स आदि का व्यापक संग्रह मौजूद है।16वीं शताब्दी में हुए डच विद्रोह के बाद सांस्कृतिक अवधारणाओं में कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिले। जल्द ही शिक्षा के विस्तार के बारे में सोचा जाने लगा और 1575 में लीडन यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई। इसके बाद लेक्चर हॉल्स के करीब पुस्तकालय की अहमियत का अनुभव हुआ। स्पेन के खिलाफ हुए डच विद्रोह के अग्रणी नेता प्रिंस ऑफ ऑरेंज, विलियम प्रथम, जो लीडन यूनिवर्सिटी की स्थापना में निर्णायक साबित हुए, ने पुस्तकालय के लिए पहली पुस्तक दान में दी। इतिहास के ऎसे ही महत्वपूर्ण पड़ाव में 1595 में आए "नॉमनक्लेटर" का जिक्र भी किया जाता है। यह इस पुस्तकालय का प्रथम कैटलॉग (सूचीपत्र) था। इसे दुनिया भर में किसी संस्थागत पुस्तकालय का पहला प्रकाशित सूचीपत्र भी माना जाता है। यह पुस्कालय अपने वर्तमान स्थान विटे सिंजेल, लीडन की नई इमारत में वर्ष 1983 में शिफ्ट हुआ। इस विशाल इमारत की स्थापना का श्रेय वास्तुकार बार्ट वान कास्टील को दिया जाता है। 1988 में पुस्तकालय का प्रथम ऑनलाइन सूचीपत्र उपलब्ध हुआ। इतिहासकारों की नजर में इस पुस्तकालय को पुस्तकों के समृद्ध संग्रह के साथ ही इनकी सालों साल उचित सार-संभाल आदि और शैक्षिक विकास में मददगार होने के चलते अहम धरोहर का दर्जा दिया जाता रहा है। "फस्ट्र्स" नाम से यहां जो सूचीपत्र बनाया गया, उसकी तुलना आज के पुस्तकालयों के "स्पेशल कलेक्शंस" से की जाती है। इस पुस्तकालय का उद्देश्य महज पुस्तकों का संग्रह ही नहीं रहा, बल्कि ज्ञान-विज्ञान के हर सरोकार से इसका जुड़ाव रहा है। डिजिटल प्रकाशन के मामले में भी इसकी खूब चर्चा होती है। 400 से अधिक डाटाबेस के साथ 30 हजार से अधिक ई-जर्नल्स, करीब 5 हजार न्यूजपेपर्स और मैगजीन्स के साथ ई-बुक्स और रेफरेंस वर्क इसका सहज उदाहरण पेश करते हैं। "लीडन यूनिवर्सिटी डिजिटल रिपॉजिटरी" के जरिए सभी शोध निबंधों को ऑनलाइन उपलब्ध करवाया जाता है। वर्ष 2007 से पुस्तकालय ने सुविधाओं के नवीकरण के लिए विशेष प्रयास किया है। दिसम्बर 2007 से संपूर्ण पुस्तकालय में वायरलैस एक्सेस का लाभ उठाया जा सकता है। मार्च 2008 में पूर्ण नवीकरण के बाद स्पेशल कलेक्शंस रीडिंग रूम की शुरूआत हुई। इस साल मार्च माह में यहां पुस्तक प्रदर्शनी के लिए नए एग्जिबिशन स्पेस का आरंभ हुआ है। लीडन यूनिवर्सिटी पुस्तकालयों में आज के दौर में यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी, सोशल एंड बिहेवियरल साइंसेज लाइब्रेरी, लॉ, मैथमेटिक्स एंड नेचुरल साइंसेज लाइब्रेरी और ईस्ट एशियन लाइब्रेरी को शुमार किया जाता है। योजना के अनुसार वर्ष 2015 में ईस्ट एशियन लाइब्रेरी को इसके वर्तमान स्थान से यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी की शीर्ष मंजिल पर बनने वाले नए फ्लोर पर शिफ्ट किया जाएगा। पुस्तकालय के विशेष संग्रह में पाश्चात्य पांडुलिपियों के साथ बॉडेल निजेन±युइस कलेक्शन अहम है, जिसमें पुराने नक्शों और ड्रॉइंग्स आदि का संग्रह है। एशियाई संग्रह में वर्तमान में करीब 30 हजार पांडुलिपियां और विभिन्न विषयों पर करीब 2 लाख किताबें शामिल हैं। इस क्रम में डच सोसाइटी ऑफ लैटर्स की स्थापना 1766 में हुई, जिसके जरिए भाषायी विषयों के अध्ययन का उद्देश्य रखा गया। सोसाइटी का 1876 में इस पुस्कालय से जुड़ाव हुआ। 1822 में यहां प्रिंट रूम की स्थापना हुई। इसमें 16वीं शताब्दी से वर्तमान तक की कई कलाकृतियों का समावेश है। बड़े पोर्ट्रेट्स, ड्रॉइंग्स और करीब 80 हजार फोटोग्राफ्स आदि यहां की खासियतों में शुमार हैं। गॉल्जियस, विशेर, रैंबे्रंड्ट, ट्रूस्ट, मॉरिस आदि कई चर्चित डच कलाकारों की कलाकृतियों के साथ दुनिया के कई अन्य नामचीन कलाकारों के बेहतरीन आर्ट वर्क को भी यहां देखा जा सकता है। पुस्तकालय में वर्ष 2000 में स्थापित स्केलिजर इंस्टीट्यूट के जरिए लेक्चर्स, सिम्पोजिया और स्पेशल कोर्स आदि की व्यवस्था के साथ कनिष्ठ और वरिष्ठ शोधार्थियों के लिए स्कॉलरशिप का इंतजाम भी किया जाता है। संस्थान की स्थापना लीडन के विद्वान जोसेफस जस्टस स्केलिजर के नाम पर की गई है। पुस्तकालय में पुरातत्व विज्ञान, मानव विज्ञान, कला, खगोल विज्ञान, दर्शन, राजनीति, धर्म व विज्ञान सहित कई विषयों पर बेहतरीन पुस्तकों का संग्रह किया गया है। यहां कुछ व्यक्तिगत संग्रहों के समावेश के साथ संस्थागत संग्रहों का भी उल्लेखनीय योगदान रहा है।
पुस्तकालय वह स्थान है जहाँ विविध प्रकार के ज्ञान, सूचनाओं, स्रोतों, सेवाओं आदि का संग्रह रहता है। पुस्तकालय शब्द अंग्रेजी के लाइब्रेरी शब्द का हिंदी रूपांतर है। लाइबेरी शब्द की उत्पत्ति लेतिन शब्द ' लाइवर ' से हुई है, जिसका अर्थ है पुस्तक। पुस्तकालय का इतिहास लेखन प्रणाली पुस्तकों और दस्तावेज के स्वरूप को संरक्षित रखने की पद्धतियों और प्रणालियों से जुड़ा है।
पुस्तकालय यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- पुस्तक + आलय। जिसमें लेखक के भाव संगृहीत हों, उसे पुस्तक कहा जाता है और आलय स्थान या घर को कहते हैं। इस प्रकार पुस्तकालय उस स्थान को कहते हैं जहाँ पर अध्ययन सामग्री (पुस्तकें, फिल्म, पत्रपत्रिकाएँ, मानचित्र, हस्तलिखित ग्रंथ, ग्रामोफोन रेकार्ड एव अन्य पठनीय सामग्री) संगृहीत रहती है और इस सामग्री की सुरक्षा की जाती है। पुस्तकों से भरी अलमारी अथवा पुस्तक विक्रेता के पास पुस्तकों का संग्रह पुस्तकालय नहीं कहलाता क्योंकि वहाँ पर पुस्तकें व्यावसायिक दृष्टि से रखी जाती हैं। विभिन्न पुस्तकालयों का अपना क्षेत्र और उद्देश्य अलग अलग होता है और वह अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनुकूल रूप धारण करते हैं। इसी के आधार पर इसके अनेक भेद हो जाते हैं जैसे- राष्ट्रीय पुस्तकालय, सार्वजनिक पुस्तकालय, व्यावसायिक पुस्तकालय, सरकारी पुस्तकालय, चिकित्सा पुस्तकालय और विश्वविद्यालय तथा शिक्षण संस्थाओं के पुस्तकालय आदि।
राष्ट्रीय पुस्तकालय
जिस पुस्तकालय का उद्देश्य संपूर्ण राष्ट्र की सेवा करना होता है उसे राष्ट्रीय पुस्तकालय कहते हैं। वहाँ पर हर प्रकार के पाठकों के आवश्यकतानुसार पठनसामग्री का संकलन किया जाता है। अर्नोल्ड इस्डैल के मतानुसार 'राष्ट्रीय पुस्तकालय का प्रमुख कर्तव्य संपूर्ण राष्ट्र के प्रगतिशील विद्यार्थियों को इतिहास और साहित्य की सामग्री सुलभ करना, अध्यापकों, लेखकों एवं शिक्षितों को शिक्षित करना है'। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय पुस्तकालय के निम्नलिखित कर्तव्य होते हैं:
1. राष्ट्रीय ग्रंथसूची के प्रकाशित कराने का दायित्व।
2. इस पुस्तकालय से संबद्ध पुस्तकालयों की एक संघीय सूची का संपदान करना।
3. पुस्तकालयों में संदर्भ सेवा की पूर्ण व्यवस्था करना और पुस्तकों कें अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान की सुविधा दिलाना।
4. अंतर्राष्ट्रीय ग्रंथसूची के कार्य के साथ समन्वय स्थापित करना और इय संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी रखना।
5. संपूर्ण राष्ट्र में स्थापित महत्वपूर्ण संदर्भकेंद्रों की सूची तैयार करना।
प्रसिद्ध भारतीय विद्वान डाक्टर रंगनाथन के अनुसार देश की सांस्कृतिक अध्ययनसामग्री की सुरक्षा राष्ट्रीय पुस्तकालय का मुख्य कार्य है। साथ ही देश के प्रत्येक नागरिक को ज्ञानार्जन की समान सुविधा प्रदान करना और जनता की शिक्षा में सहायता देने के विविध क्रियाकलापों द्वारा ऐसी भावना भरना कि लोग देश के प्राकृतिक साधनों का उपयोग कर सकें। यह निश्चय है कि यदि देश के प्रत्येक व्यक्ति का मस्तिष्क सृजनशील नहीं होगा तो राष्ट्र का सर्वांगीण विकास तीव्र गति से नहीं हो सकेगा।
कापीराइट की सुविधा से राष्ट्रीय पुस्तकालयों के विकास में वृद्धि हुई है। वास्तव में पुस्तकालय आंदोलन के इतिहास में यह क्रांतिकारी कदम है। ब्रिटेन के राष्ट्रीय पुस्तकालय, ब्रिटिश म्यूजियम को 1709 में यह सुविधा प्रदान की गई। इसी प्रकार फ्रांस बिब्लियोथेक नैशनल पेरिस को 1556 और बर्लिन लाइब्रेरी को 1699 ई. में एवं स्विस नैशनल लाइब्रेरी को 1950 ई. में वहाँ के प्रकाशन नि:शुल्क प्राप्त होने लगे। कापीराइट की यह महत्वपूर्ण सुविधा भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय को सन्‌ 1954 ई. में प्रदान की गई। डिलीवरी आंव बुक्स सन्‌ 1954 के कानून के द्वारा प्रत्येक प्रकाशन की कुछ प्रतियाँ राष्ट्रीय पुस्तकालय को भेजना प्रकाशकों के लिए कानून द्वारा अनिवार्य कर दिया गया है।
सार्वजनिक पुस्तकालय
आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालयों का विकास वास्तव में प्रजातंत्र की महान्‌ देन है। शिक्षा का प्रसारण एवं जनसामान्य को सुशिक्षित करना प्रत्येक राष्ट्र का कर्तव्य है। जो लोग स्कूलों या कालेजों में नहीं पढ़ते, जो साधारण पढ़े लिखे हैं, अपना निजी व्यवसाय करते हैं अथवा जिनकी पढ़ने की अभिलाषा है और पुस्तकें नहीं खरीद सकते तथा अपनी रुचि का साहित्य पढ़ना चाहते हैं, ऐसे वर्गों की रुचि को ध्यान में रखकर जनसाधारण की पुस्तकों की माँग सार्वजनिक पुस्तकालय ही पूरी कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त प्रदर्शनी, वादविवाद, शिक्षाप्रद चलचित्र प्रदर्शन, महत्वपूर्ण विषयों पर भाषण आदि का भी प्रबंध सार्वजनिक पुस्तकालय करते हैं। इस दिशा में यूनैसको जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन ने बड़ा महत्वपूर्ण योगदान किया है। प्रत्येक प्रगतिशील देश में जन पुस्तकालय निरंतर प्रगति कर रहे हैं और साक्षरता का प्रसार कर रहे हैं। वास्तव में लोक पुस्तकालय जनता के विश्वविद्यालय हैं, जो बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक के उपयोग के लिए खुले रहते है।
अनुसंधान पुस्तकालय
उस संस्था को कहते हैं जो ऐसे लोगों की सहायता एवं मार्गदर्शन करती है जो ज्ञान की सीमाओं को विकसित करने में कार्यरत हैं। ज्ञान की विभिन्न शाखाएँ हैं और उनकी पूर्ति विभिन्न प्रकार के संग्रहों से ही संभव हो सकती है, जैसे कृषि से संबंधित किसी विषय पर अनुसंधानात्मक लेख लिखने के लिए कृषि विश्वविद्यालय या कृषिकार्यों से संबंधित किसी संस्था का ही पुस्तकालय अधिक उपयोगी सिद्ध होगा। ऐसे पुस्तकालयों की कार्यपद्धति अन्य पुस्तकालयों से भिन्न होती है। यहाँ कार्य करनेवाले कार्मिकों का अत्यंत दक्ष एवं अपने विषय का पंडित होना अनिवार्य है, नहीं तो अनुसंधानकर्ताओं को ठीक मार्गदर्शन उपलब्ध न हो सकेगा। संग्रह की दृष्टि से भी यहाँ पर बहुत सतर्कतापूर्वक सामग्री क चुनाव करना चाहिए। संदर्भ संबंधी प्रश्नों का तत्काल उत्तर देने के लिए पुस्तकालय में विशेष उपादानों का होना और उनका रखरखाव भी ऐसा चाहिए कि अल्प समय में ही आवश्यक जानकारी सुलभ हो से। विभिन्न प्रकार की रिपोर्टे और विषय से संबंधि मुख्य-मुख्य पत्रिकाएँ, ग्रंथसूचियाँ, विश्वकोश, कोश और पत्रिकाओं की फाइलें संगृहीत की जानी चाहिए।
व्यावसायिक पुस्तकालय
इन पुस्तकालयों का उद्देश्य किसी विशेष व्यावसायिक संस्था अथवा वहाँ के कर्मचारियों की सेवा करना होता है। इनके आवश्यकतानुसार विशेष पठनसामग्री का इन पुस्तकालयों में संग्रह किया जाता है, जैसे व्यवसाय से संबंधित डायरेक्टरोज, व्यावसायिक पत्रिकाएँ, समयसारणियाँ, महत्वपूर्ण सरकारी प्रकाशन, मानचित्र, व्यवसाय से संबंधित पाठ्य एवं संदर्भग्रंथ, विधि साहित्य इत्यादि।
सरकारी पुस्तकालय
वैसे तो सरकार अनेक पुस्तकालयों को वित्तीय सहायता देती है, परंतु जिन पुस्तकालयों का संपूर्ण व्यय सरकार वहन करती है उन्हें सरकारी पुस्तकालय कहते हैं, जैसे राष्ट्रीय पुस्तकालय, विभागतीय पुस्तकालय, विभिन्न मंत्रालयों के पुस्तकालय, प्रांतीय पुस्तकालय। संसद और विधानभवनों के पुस्तकालय भी सरकारी पुस्तकालय की श्रेणी में आते हैं।
चिकित्सा पुस्तकालय
यह पुस्तकालय किसी चिकित्सा संबंधी संस्था, विद्यालय, अनुसंधान केंद्र अथवा चिकित्सालय से संबद्ध होते हैं। चिकित्सा संबंधी पुस्तकों का संग्रह इनमें रहता है और इनका रूप सार्वजनिक न होकर विशेष वर्ग की सेवा मात्र तक ही सीमित होता है।
शिक्षण संस्थाओं के पुस्तकालय
शिक्षण संस्थाओं के पुस्तकालयों को इस प्रकार विभाजित किया जा सकता है, जैसे विश्वविद्यालय पुस्तकालय, विद्यालय पुस्तकालय, माध्यमिक शाला पुस्तकालय, बेसिक शाला पुस्तकालय एवं प्रयोगशालाओं, अनुसंधान संस्थाओं और खोज संस्थाओं के निजी पुस्तकालय आदि। हर विश्वविद्यालय के साथ एक विशाल पुस्तकालय का होना प्राय: अनिवार्य ही है। बेसिक शालाओं एवं जूनियर हाई स्कूलों में तो अभी पुस्तकालयों का विकास नहीं हुआ है, परंतु माध्यमिक शालाओं एवं विद्यालयों के पुस्तकालयों का सर्वांगीण विकास हो रहा है।
इसके अतिरिक्त पुस्तकालयों के और भी अनेक भेद हैं जैसे ध्वनि पुस्तकालय, जिसमें ग्रामोफोन रेकार्डों और फिल्मों आदि का संग्रह रहता है, कानून पुस्तकालय, समाचारपत्र पुस्तकालय, जेल पुस्तकालय, अन्धों का पुस्तकालय, संगीत पुस्तकालय, बाल पुस्तकालय एवं सचल पुस्तकालय आदि।
सेना पुस्तकालय
ये पुस्तकालय विशिष्ट प्रकार के होते हैं और संग्रह की दृष्टि से तो इनका रूप प्राय: अन्य पुस्तकालयों से भिन्न होता है। प्रथम विश्वयुद्ध के समय ऐसे पुस्तकालयों की आवश्यकता की ओर ध्यान दिया गया था और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय तो सेना के अधिकारियों को पठन-पाठन की सुविधा देने हेतु मित्र-राष्ट्रों ने अनेकानेक पुस्तकालय स्थापित किए। अकेले अमरीका में नभ सेना के लिए 1600 पुस्तकालय हैं जिनमें नभ सेना के उपयोग के लिए नई से नई सामग्री का संग्रह किया जाता है। ये पुस्तकालय बहुत से जलपोतों और सैनिक छावनियों के साथ स्थापित किए गए है। इसी प्रकार वायुसेना और स्थल सेना के भी अनेक पुस्तकालय विश्व के अनेक देशों में हैं। अमेरिकन पेंटागेन में सेना का एक विशाल पुस्तकालय है। भारत में रक्षा मंत्रालय, सेना प्रधान कार्यालय एवं डिफेंस साइंस ऑर्गनाइज़ेंशन के विशाल पुस्तकालय हैं।
दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी
यूनेस्को और भारत सरकार के संयुक्त प्रयास से स्थापित दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी का उद्घाटन स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू ने 27 अक्टूबर 1951 को किया। 15 वर्ष की इस अल्प अवधि में इस पुस्तकालय ने अभूतपूर्व उन्नति की है। इसमें ग्रंथों की संख्या लगभग चार लाख है। नगर के विभिन्न भागों में इसकी शाखाएँ खोल दी गई है। इसके अतिरिक्त प्रारंभ से ही चलता-फिरता पुस्तकालय भी इसने शुरू किया। पुस्तकालय के संदर्भ और सूचना विभाग में नवीनतम विश्वकोश, गजट, शब्दकोश और संदर्भ साहित्य का अच्छा संग्रह है। बच्चों के लिए बाल पुस्तकालय विभाग है। पुस्तकों के अतिरिक्त इस विभाग में तरह-तरह के खिलौने, लकड़ी के अक्षर, सुंदर चित्र आदि भी हैं।
सामाजिक शिक्षा विभाग समय समय पर फिल्म प्रदर्शनी, व्याख्यान, नाटक, वादविवाद प्रतियोगिता का आयोजन करता है। इसके अतिरिक्त इस विभाग के पास आधुनिकतम दृश्यश्रव्य उपकरण भी हैं। इस पुस्तकालय के सदस्यों की संख्या लगभग एक लाख है।
राष्ट्रीय पुस्तकालय, कलकत्ता
इस पुस्तकालय की स्थापना श्री जे. एच. स्टाकलर के प्रयत्न से 1836 ई. में कलकत्ता में हुई। इसे अनेक उदार व्यक्तियों से एवं तत्कालीन फोर्ट विलियम कालेज से अनेक ग्रंथ उपलब्ध हुए। प्रारंभ में पुस्तकालय एक निजी मकान में था, परंतु 1841 ई. में फोर्ट विलियम कालेज में इसे रखा गया। सन्‌ 1844 ई. में इसका स्थानांतरण मेटकाफ भवन में कर दिया गया। सन्‌ 1890 ई. में कलकत्ता नगरपालिका ने इस पुस्तकालय का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया। बाद में तत्कालीन बंगाल सरकार ने इसे वित्तीय सहायता दी। 1891 ई. में इंपीयिल लाइब्रेरी की स्थापना की गई और लार्ड कर्जन के प्रयत्न से कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी तथा इंपीरियल लाइब्रेरी को 1902 ई. में एक में मिला दिया गया। उदार व्यक्तियों ने इसे बहुमूल्य ग्रंथों का निजी संग्रह भेंट स्वरूप दिया।
सन्‌ 1926 ई. में रिचे सीमित ने इस पुस्तकालय के विकास के संबंध में भारत सरकार को अपना प्रतिवेदन दिया। सितंबर, 1948 में यह पुस्तकालय नए भवन में लाया गया और इसकी रजत जयंती 1 फ़रवरी 1953 ई. को मनाई गई। स्वतंत्रता के पश्चात्‌ इसका नाम बदलकर 'राष्ट्रीय पुस्तकालय' कर दिया गया। इसमें ग्रंथों की संख्या लगभग 12 लाख है। 'डिलीवरी ऑव बुक्स ऐक्ट 1954' के अनुसार प्रत्येक प्रकाशन की एक प्रति इस पुस्तकालय को प्राप्त होती है। वर्ष 1964-65 में इस योजना के अतंर्गत 18642 पुस्तकें इसे प्राप्त हुई एवं भेंट स्वरूप 7000 से अधिक ग्रंथ मिले।
केंद्रीय संदर्भ पुस्तकालय ने राष्ट्रीय ग्रंथसूची की नौ जिल्दें प्रकाशित की एवं राज्य सरकारों ने तमिल, मलयालम तथा गुजराती की ग्रंथसूचियाँ प्रकाशित कीं।
आधुनिक भारत में पुस्तकालयों का विकास बड़ी धीमी गति से हुआ है। हमारा देश परतंत्र था और विदेशी शासन के कारण शिक्षा एवं पुस्तकालयों की ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया। इसी से पुस्तकालय आंदोलन का स्वरूप राष्ट्रीय नहीं था और न इस आंदोलन को कोई कानूनी सहायता ही प्राप्त थीं। बड़ौदा राज्य का योगदान इस दिशा में प्रशंसनीय रहा है। यहाँ पर 1910 ई. में पुस्तकालय आंदोलन प्रारंभ किया गया। राज्य में एक पुस्तकालय विभाग खोला गया और पुस्तकालयों चार श्रेणियों में विभक्त किया गया- जिला पुस्तकालय, तहसील पुस्तकालय, नगर पुस्तकालय, एवं ग्राम पुस्तकालय आदि। पूरे राज्य में इनका जाल बिछा दिया गया था। भारत में सर्वप्रथम चल पुस्तकालय की स्थापना भी बड़ौदा राज्य में ही हुई। श्री डब्ल्यू. ए. बोर्डन पुस्तकालय विभाग के अध्यक्ष थे।
इस समय बड़ौदा राज्य के और मुख्यत: बोर्डन महोदय के प्रयत्न से बड़ौदा राज्य पुस्तकालय संघ की स्थापना हुई। बड़ौदा शहर में एक केंद्रीय पुस्तकालय स्थापित किया गया जिसे राज्य के शासक से 20,000 पुस्तकें प्राप्त हुई। बाद में बोर्डन महोदय ने यहाँ पर पुस्तकालयविज्ञान की शिक्षा का भी प्रबंध किया और बहुत से पुस्तकाध्यक्षों को शिक्षा दी गई।
मद्रास राज्य में सन्‌ 1927 ई. में अखिल भारतीय सार्वजनिक पुस्तकालय संघ का अधिवेशन हुआ। अगले वर्ष मद्रास राज्य पुस्तकालय संघ की स्थापना की गई। डॉ॰ एस. आर. रंगनाथन के प्रयत्न से सन्‌ 1933 ई. में 'लाइब्रेरी ऐक्ट' विधानसभा द्वारा पारित किया गया। पुस्तकालय संघ ने पुस्तकालय विज्ञान के 20 ग्रंथों का प्रकाशन किया जिनमें मुख्यत: डॉ॰ रंगनाथन के ग्रंथ थे।
संघ ने 1929 ई. में एक 'ग्रीष्मकालीन स्कूल' प्रारंभ किया जिसका उद्देश्य पुस्तकालयविज्ञान में प्रशिक्षण देना था। बाद में इसी संघ की प्रेरणा से मद्रास विश्वविद्यालय ने पुस्तकालय विज्ञान में डिप्लोमा कोर्स का श्रीगणेश किया।
बंबई राज्य में पुस्तकालय आंदोलन का प्रारंभ सन्‌ 1882 में हुआ, जब धारबार में नेटिव सैंट्रल लाइब्रेरी की स्थापना की गई। रानेवेन्नूर में एक पुस्तकालय की स्थापना 1873 ई. में हुई। सन्‌ 1890 ई. में कर्नाटक विद्यावर्धक संघ की स्थापना की गई, जिससे पुस्तकालय आंदोलन को बड़ी सहायता मिली। इस संघ ने अनेक पुस्तकें बंबई राज्य के पुस्तकालयों को नि:शुल्क दीं। सन्‌ 1924 में आल इंडिया लाइब्रेरी कफ्रौंस बेलगाँव में हुई और 1929 में श्री वेंकट नारायण शास्त्री के सभापतित्व में बंबई कर्नाटक राज्य लाइब्रेरी कफ्रौंस धारदार में हुई। इस अवसर पर समाचारपत्रों, पत्रिकाओं की प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया।
बंबई राज्य में सन्‌ 1939 में पुस्तकालय विकास समिति बनाई गई जिसने 1940 ई. में अपनी रिपोर्ट सरकार को दी; परंतु स्वतंत्रताप्राप्ति के पश्चात्‌ ही समिति की रिपोर्ट पर कार्यवाही संभव हो सकी। इस राज्य में केंद्रीय पुस्तकालय और अनेक विकसित पुस्तकालय स्थापित हो चुके हैं। बंबई विश्वविद्यालय में पुस्तकालयविज्ञान की शिक्षा भी दी जाती है।
बिहार राज्य में पुस्तकालय आंदोलन थोड़ा देर से प्रारंभ हुआ। खुदाबक्श पुस्तकालय 1891 ई. में पटना में स्थापित किया गया। इसमें आठ हजार से अधिक हस्तलिखित ग्रंथ और दुर्लभ प्राचीन चित्रों का बहुत सुंदर संग्रह किया गया। सन्‌ 1915 ई. में पटना विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की तथा 1924 ई. में सिन्हा पुस्तकालय की स्थापना पटना में की गई। सन्‌ 1937 में बिहार पुस्तकालय संघ की स्थापना हुई।
उत्तर प्रदेश में पुस्तकालयों का विकास आधुनिक काल में समुचित ढंग से हुआ है। यहाँ के सभी विश्वविद्यालयों के साथ पुस्तकालय खोले गए, जिनमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का गायकवाड़ पुस्तकालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का पुस्तकालय और लखनऊ तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालयों के पूर्ण विकसित पुस्तकालय हैं। नागरीप्रचारणी सभा, काशी का आर्यभाषा पुस्तकालय हिंदी साहित्य संमेलन, इलाहाबाद का हिंदी संग्रहालय, लखनऊ की अमीनुद्दौला पब्लिक लाइब्रेरी आदि पुस्तकालय इस प्रदेश के प्रमुख पुस्तकालय हैं। 1941 ई. में इलाहाबाद में चिंतामणि मैमोरियल लाइब्रेरी की स्थापना अखिल भारतीय सेवा समिति के प्रयत्नों से हुई। यह पुस्तकालय समाजसेवा संबंधी साहित्य का अद्वितीय संग्रह है। उत्तर प्रदेश के पुस्तकालय संघ द्वारा 1737 ई. में प्रांत भर के पुस्तकालयों की एक डाइरेक्टरी प्रस्तुत की गई। 1941 ई. में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पुस्तकालय विज्ञान की शिक्षा का श्रीगणेश हुआ।
1915 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर का पुस्तकालय श्री ए. डी. डिकन्सन के प्रयत्न से विकसित किया गया। पंजाब पुस्तकालय संघ की स्थापना 1929 ई. में हुई और 1945 ई. में लाहौर से इंडियन लाइब्रेरियन नामक पत्रिका प्रकाशित की गई एवं मॉडर्न लाइब्रेरियन नामक त्रैमासिक पत्रिका भी निकाली गई।
बंगाल पुस्तकालय संघ की स्थापना 1931 ई. में हुई। इसकी ओर से 1938 में एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। संघ ने पुस्तकालय विज्ञान की दिशा में भी प्रशंसनीय कार्य किया। 1931 ई. में इंपीरियल लाइब्रेरी (राष्ट्रीय पुस्तकालय) में पुस्तकालय विज्ञान की कक्षाएँ खोली गई और इसके पश्चात्‌ 1945 ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने इस विषय से संबंधित विभाग की स्थापना की।
इसी प्रकार असम और उड़ीसा में भी पुस्तकालय संघों की स्थापना की गई। 1945 ई. में पूना पुस्तकालय संघ और 1946 में दिल्ली पुस्तकालय संघ का गठन किया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय में पुस्तकालय विज्ञान में स्नातक स्तर की पढ़ाई प्रारंभ की गई और स्नातकोत्तर कक्षाओं की पढ़ाई का भी प्रबंध किया गया। पुस्तकालय विज्ञान में अनुसंधान करने की दिशा में दिल्ली विश्वविद्यालय ने ही मार्गदर्शन प्रदान किया।


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