अयोध्या यात्रा वृतांत: पुर सोभा कछु बरनि न जाई भाग - ।2
दूसरा दिन 18 जनवरी 2024
दूसरे दिन की यात्रा मां महामाया को प्रणाम कर रतनपुर से शुरू हुई। यात्रा अचानकमार टाइगर रिजर्व की घाटी से बढ़ते हुए पेंड्रा पहुंची। यहां पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई, उनके साथ भोजन और फिर वहां से यात्रा गौरेला से आगे बढ़ गई। हमारी मोटर साइकिल दनदनाते हुए वेंकटनगर से मध्यप्रदेश में प्रवेश कर अनूपपुर पहुंच गई। इस दौरान रास्ते में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की सीमा वेंकटनगर में ही बलौदा बाजार से अयोध्या यात्रा के लिए निकले साइकल यात्रियों से मुलाकात हुई। उनके साथ कुछ समय चर्चा करने के बाद हम अनूपपुर पहुंच गए।
अनूपपुर में यात्रा पर अल्प विराम लगा। हम अपने मामा जी के यहां पहुंचे। कुछ समय आराम करने के बाद एक बार फिर यात्रा की शुरुआत हुई। अनूपपुर में ही कुछ और दोस्तों से मुलाकात होने पर उनके साथ कुछ समय बिताने के बाद हम शहडोल के लिए आगे बढ़ गए। अमलाई कागज मिल से होते हुए शहडोल और फिर शहडोल के बायपास में जायसवाल ढाबा में थकान मिटाने और बढ़ती ठंड से बचाव के लिए रुके। यह खुद के भीतर कप में भर भर कर चाय रुपी आग अपने अंदर उड़ेलने के बाद व्योहारी के लिए निकल पड़े।
हमारी इस यात्रा की योजना बलौदा बाजार के कसडोल क्षेत्र में आने वाले तुरतुरीया धाम की न्यूज कवरेज के समय कुश की नगरी कहे जाने वाले कसडोल में बनी थी। मान्यता है कि भगवान राम वनवास काल के समय तुरतुरिया आए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम से जुड़ी छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले की मातागढ़ तुरतुरिया धाम जाम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम होने का दावा किया गया है और यहीं लव और कुश का जन्म हुआ है कहा जाता है। हालांकि यात्रा की योजना ठंड के असर को देखते हुए पहले ही ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था, लेकिन बाद में अचानक इसे मूर्त रूप देते हुए प्रारंभ किया गया। असल में हम उस खूबसूरती को देखने के प्रत्यक्षदर्शी बनने निकले थे जो भगवान राम के वनवास काल से लौटने पर त्रेता युग के लोगों ने देखा था। अपनी आंखों से उस पुर को सजे हुए देखने निकले थे जिसे महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में और गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में उल्लेख किया है।
महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना संस्कृत में की थी और गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधि भाषा में रामचरितमानस लिखी। ये दोनों ही ग्रंथ भगवान श्री राम की भक्ति से ओतप्रोत हैं। हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं कि प्रभु श्री राम के समय में अयोध्या कैसी रही होगी।
अध्योया में बन रहे भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर अयोध्या में रहना है। इसी उद्देश्य के साथ हमारी यात्रा निकली थी। क्योंकि राम मंदिर के बनाने और मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने का सभी देशवासियों को बेसब्री से इंतजार था। महर्षि वाल्मीकी ने रामायण और गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में अयोध्या का को वर्णन मिलता है। उसके मुताबिक महर्षि वाल्मिकी जी ने रामायण के बालकांड के पांचवें सर्ग में अयोध्या का विस्तार से वर्णन किया है। रामायण के अनुसार अयोध्या को मनु ने बसाया था। यह पहले कौशल जनपद की राजधानी थी। वे लिखते हैं -
कोसलो नाम मुदित: स्फीतो जनपदो महान।
निविष्ट: सरयूतीरे प्रभूत धनधान्यवान्।।
वाल्मिकी जी ने अयोध्यापुरी के वैभव और भव्यता का चित्रण करते हुए बताया है, कि सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धनधान्य से भरा-पूरा कोसल नामक एक बड़ा देश था। साथ ही रामायण में यह भी उल्लेख मिलता है, कि अयोध्या 12 योजन-लम्बी और 3 योजन चौड़ी थी। इसकी सड़कों पर रोजाना जल छिड़का जाता था और फूल बिछाए जाते थे। इस पुरी में बड़े-बड़े तोरण द्वार, बाजार, नगरी की रक्षा के लिए सभी प्रकार के शस्त्र और यंत्र मौजूद थे। नगरी में दुर्गम किले और खाई थी, जिस कारण कोई भी शत्रु इन्हें छू भी नहीं सकता था। नगरी में जगह-जगह उद्यान निर्मित हैं। साथ ही वाल्मिकी जी यह भी वर्णन करते हैं कि अयोध्या नगरी के कुओं का जल में जल इस प्रकार भरा हुआ था जैसे गन्ने का रस भरा हो। पूरी नगरी में कोई भी धनहीन नहीं था। सभी नगरवासियों के पास धन-धान्य, पशुधन आदि की कोई कमी नहीं थी। महर्षि वाल्मिकी के अनुसार, अयोध्या एक समृद्ध नगरी है।
अयोध्या की भव्यता का वर्णन तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में बड़ी ही भव्यता के साथ किया है। तुलसीदास जी ने जिस प्रकार की अयोध्या का वर्णन अपने ग्रंथ में किया है, वह भक्ति भावना से भरी हुई है।
राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि॥
चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजें तनु नहिं संसारा॥
बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि राम की अयोध्या परमधाम देने वाली और मोक्षदायिनी है। जो जीव अयोध्या में अपना शरीर छोड़ते हैं, उन्हें फिर से इस संसार में आने की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही तुलसीदास सरयू नदी के बारे में लिखते हैं कि सरयू में केवल स्नान से ही नहीं बल्कि इसके स्पर्श और दर्शनमात्र से भी व्यक्ति के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥
उत्तरकांड में राम जी के वनवास के वापिस लौटने के बाद भी अयोध्या का वर्णन किया है। तुलसीदास जी लिखते हैं कि अयोध्यावासियों को घर स्वर्ण और रत्नों से जड़े हुए हैं। घरों की अटारी से लेकर खंबे और फर्श तक अनेक रंग-बिरंगी मणियों से ढले हुए हैं। सरयू नदी के किनारे-किनारे ऋषि-मुनियों ने तुलसी के साथ-साथ बहुत-से पेड़ लगा रखे हैं। अयोध्या, जहां के राजा स्वयं प्रभु राम हैं, वहां की जनता समस्त सुखों से परिपूर्ण हैं।
ब्रह्मांड की हर वस्तु भगवान की है, इसे साइंस को भी मानना पड़ा है कि कण कण में भगवान हैं। इस यात्रा वृत्तान्त में हमारी यात्रा एक ऐसे शहर की ओर निकली है जिसका संबंध भगवान राम से है। हमारी यात्रा अयोध्या धाम की है। अब यात्रा पर एक बार फिर लौटता हूं।
दूसरे दिन की यात्रा भगवान राम का नाम लेकर शुरू हुई इस यात्रा में हम जब व्योहरी के लिए शहडोल के ढाबा से आगे बढ़े तब तक ठंड अपने पूरे शबाब पर पहुंच चुकी थी। कोहरा भी धीरे धीरे राह रोकने लगा था। रात के अंधेरे को मोटर साइकिल के हेड लाइट की रोशनी भले ही चीर पाने में सफल हो रही थी, लेकिन कोहरा पग पग पर चुनौती बन कर तैयार हो रहा था। उद्देश्य व्योहारी पहुंचने का लेकर निकले थे, लेकिन रास्ता साफ दिखाई नहीं दे रहा था। घना कोहरा पूरे सड़क को घेरे हुए था। रात तीन बजे हम व्योहारी से महज बारह किलोमीटर पहले ही एक बार फिर एक ढाबा में कोहरा छटने का इंतजार करते हुए रुक गए। यह इंतजार बची हुई रात के गुजर जाने तक करना पड़ा। इस तरह से उसी ढाबे में हमारी रात और दूसरे दिन की यात्रा गुजर गई।
यात्रा में दूसरे दिन से मजा आने लगा था, वजह नए नए लोगों से मुलाकात, नई नई चुनौतियां और मोटर साइकिल का सफर जो हर दिन नई सीमा तय करने के लिए हमें ललचा रही थी। असल ठंड का मजा और यात्रा का आनंद यह यात्रा दिला रही थी। पग पग में चुनौतियां खड़ी हो रही थी। यात्रा में सर्वाधिक खलल कोहरे ने डाल रखा था। रात में सड़क वाहनों से तो खाली मिलती, लेकिन कोहरा से भरी हुई सड़कें न आगे कुछ देख सकते थे न दाएं बाएं। दूसरे दिन की यात्रा खत्म होने के बाद तीसरे दिन की यात्रा का रूट प्लान तैयार कर लिया गया था। रीवा में रुकने का प्लान रद्द कर दिया गया। सीधे प्रयागराज पहुंचने का उद्देश्य रखा गया, जो इतना आसान नहीं था। आप यहां तक पहुंच गए हैं तो आपको हमारी यात्रा कैसी लग रही है कमेंट कर जरूर बताएं। जिससे हम अपने आगामी यात्रा वृतांत में शामिल कर यात्रा को और रोमांचकारी बना सकें।
आपका दिल से धन्यवाद।
क्रमश:
©® दीपेंद्र शुक्ला
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