नदियां हमारी मां है, उसके हम उपभोक्ता नहीं हो सकते, इसलिए नदी तीर्थ‌ शुरू करे सरकार

नदीवेता और पूर्व सांस्कृतिक राजदूत फिजी प्रो. ओमप्रकाश भारती प्रेस क्लब के पहुना कार्यक्रम में पहुंचे। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नदियों को मां का दर्जा प्राप्त है। पहले सरकार ने ब्रिटिश अधिनियम की नकल कर देश की नदी नीति बनाकर समाज से नदियों को छीन ली और अब सरकारें यूरोपीय देशों की नकल कर यहां नदी पर्यटन की बात कह रही हैं। जबकि नदियां हमारी मां है, मां का कोई उपभोक्ता नहीं हो सकता। नदियां मानव के पृथ्वी पर आने से‌ हजारों लाखों साल पहले से पृथ्वी पर मौजूद हैं तभी तो उसले किनारे पर मानव बसा, इसके उदाहरण अब मिल रही सभ्यताएं हैं। उन्होंने बिलासपुर के पत्रकारों को धन्यवाद देते हुए कहा कि  अरपा को लेकर यहां के पत्रकारों ने जितना लिखा है, उतना महत्व गंगा नदी को मध्य भारत के पत्रकारों ने नहीं दिया। आगे कहा कि कुछ समय से नदी पर्यटन को लेकर बात चल रही है, यह अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए नियम लागू किया जाना चाहिए। बल्कि यह कहूंगा कि नदी टूरिज्म की जगह नदी तीर्थ शुरू करें, जिससे समाज की आस्था उस पर रहे।

प्रो. भारती ने आगे कहा कि नदी पर सबसे ज्यादा अधिकार समाज का है, लेकिन कार्पोरेट इसका सबसे ज्यादा दोहन कर रहे हैं। फैक्ट्री को निशुल्क पानी दिया जा रहा, फैक्ट्री नदियों से पानी लेकर उसमें गंदगी डाल रहे हैं। जबकि उनको अपने दायित्व का पालन करते हुए नदियों में फिल्टर लगाना था और फिल्टर करके अपना अपशिष्ट पदार्थ डालना था। उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटिश सरकार की 1837 में बने अधिनियम ने देश की‌ नदियों को सरकार के अधिन कर दिया, वरना पहले यह समाज की हुआ करती थी। सरकार ने समाज को नदी का उपभोक्ता बना दिया इसके कारण असज नदियों का बुरा हाल है। यह भी कहा कि ब्रिटिश अधिनियम का ही पालन कर भारत की सरकार ने 1991 से लेकर 2012 तक सभी नियम बनाए हैं। इसके मुताबिक नदियां हमारी मां न होकर सरकार की हो गई, समाज को लालच देकर सरकार ने नदियों का अधिग्रहण कर लिया। समाज को उपभोक्ता बना दिया। जबकि पानी पर पहला हक समाज का होना चाहिए था, लेकिन सरकार ने पानी का व्यवसायीकरण कर दिया। आज दुनिया की दस बड़ी कंपनियां पानी बेच रही हैं। जबकि पानी उन्हें प्रकृति से मिली है, उसे बेचने का अधिकार किसी को नहीं है, लेकिन सरकारों ने दिया है। यह भी कहा कि पृथ्वी पर मौजूद पानी में से 97 फीसदी पानी खारा, 3 फीसदी पानी पीने के लायक है, लेकिन इन 3 फीसदी में से भी 99 फीसदी पानी बड़े देशों की झीलों में है। बड़े देश नदी का मार्ग अवरुद्ध करके नदियों पर बड़े बांध बना लिए हैं। इस पर करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। उन्होंने नदी से नदी जोड़ो योजना पर कहा कि जहां दो नदियां मिलती हैं वहां अलग तरह की एनर्जी होती है, संगम वाले जगह के मानव और जीव के व्यवहार अलग होते हैं। यह भी कहा कि नदी से नदी जोड़मे पर बहुत खर्च आएगा और ऐसा करना  लोकतांत्रिक देश के लिए नुकसानदायक है क्योंकि लोकतांत्रिक देश में यह खर्च आम जनता से वहन किए जाते हैं। जबकि नदी अगर अपने प्रवाह में बहे तो बहुत फायदा हो। उन्होंने बाढ़ को बढ़ोतरी का प्रतिक बताया, कहा कि बाढ़ चाहे बुद्धि की हो, धन की हो या नदी की सब फायदा पहुंचाते हैं। नदी के बाढ़ से जमीन के विषैले पदार्थों को समुद्र में ले जाती है, बांध बनाने से नदी अपना प्रकृतिक दायित्व नहीं निभा पा रही है, इससे जमीन में अले जा रहे किटनाशक और खाद पानी‌में खुलकर भूजल में जा रहे हैं। इससे उन उद्योगों को फायदा हो रहा है जो पानी बेचने का कारोबार कर रहे हैं। यह भी कहा कि नदी में बाढ़ आना चाहिए, जिस नदी में बाढ़ नहीं आती वह बांझ कहलाती हैं। उन्होंने नदी पर्यटन को यूरोपीय देशों की नकल बताते हुए कहा कि सरकार को इसके लिए मापदंड तय करना चाहिए, रिवर फ्रेंडली पर्यटन विकसित करना चाहिए। नदियां हमारी माता हैं इसलिए पहले समाज नदी तीर्थ करते थे, पर्यटन के लिए तीर्थ पर जाते थे, आस्था के साथ नदी की परिक्रमा करते थे, लेकिन अब नेचर व एडवेंचर के लिए जाते हैं, नदी के प्रति आस्था नहीं रहती कारपोरेट कंपनियों के लगाए कैंप में रहकर गंदगी फैलाते हैं और शराब की बोतलें नदियों के किनारे फेंककर आते हैं। जबकि तीर्थ में जाने वाले लोग फूल, बेलपत्र और दूसरे पदार्थ नदी में डालते हैं जो पानी में सड़कर घुलनशील होते हैं। तीर्थ से फैली गंदगी नदियों को उतना नुकसान नहीं पहुंचाती जितना पर्यटन कैंप से निकलने वाले शराब की कांच और प्लास्टिक की बोतलें नुकसान पहुंचाती हैं। तीर्थ और पर्यटन में एडवेंचर के लिए जाने दो अलग-अलग वर्ग हैं। दोनों वर्ग अलग हैं तीर्थ जाने वाले आस्था से जाते हैं, जबकि टूरिज्म कार्पोरेट वर्ग कर रहा है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा पर भी बात रखी। कई सवालों के जवाब देते हुए नदी के विषय में जानकारी दी।

चीन के खिलाफ आवाज उठानी होगी

प्रो. भारती ने कहा कि चीन तिब्बत पर कब्जा कर वहां के पठार से निकलने वाली 86 नदियों पर लगातार बांध बना रहा है। हिमालय की नदियों पर हाई बांध बनाकर नदियों को निगल रहा है। यह हमारे लिए बड़ी चुनौती है। क्योंकि चीन युद्ध में बांध का इस्तेमाल करता है। इतना ही नहीं हिमालय सेंसेटिव क्षेत्र है, वहां हमेशा भूकंप आते रहता है, दुनिय भर में आंतकवाद बढ़ा हुआ है उनके कारण अगर हाई बांध को कुछ हुआ तो उत्तरी राज्य बिहार, बंगाल और बंगलादेश 20 फीट गहरे पानी में डूब जाएंगे। इसलिए चीन के नदी नीति का विरोध करना होगा, आवाज उठानी होगी। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वकील बनने के लिए इस परीक्षा की नोटिफिकेशन हुई घोषित, जानिए तारीख

पुस्तकालयों की घटती संख्या और हम

छत्तीसगढ़ की मिट्‌टी