झुलसना तय है निजीकरण की आग में
हाल के दिनों में निजीकरण की चर्चा अपने चरम पर है। जहां कुछ वर्ग इसका विरोध तो कुछ वर्ग इसके समर्थन में दिख रहे हैं। इन सबसे इत्तर अगर बात करें तो किसी भी चीज का उपाय निजीकरण नहीं हो सकता। एक तरफ जहां केंद्र की सरकार ने निजीकरण की आग लगाकर हाथ सेंक रही है, वहीं दूसरी तरफ केंद्र की देखा देखी राज्य की सरकारों ने भी सरकारी संस्थाओं को निजीकरण की आग में झोंक दिए हैं। हर तरफ फैली निजीकरण की आग में झुलसना मानों तय है। लेकिन एक बात देखने को मिल रही है कि निजीकरण के समर्थन में निजी कंपनियों में काम करने वाले लोग भी हैं। यह वे लोग हैं जो अपनी संस्था के फैसले पर मालिकों को कोसते हैं, लेकिन सरकार के फैसले का समर्थन इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिली और जिनको मिली है उनकी नजर में वे कामचोर हैं। अपनी कमजोरियों का खिझ वे उन सरकारी कर्मचारियों पर निकाल रहे हैं जो मेहनत करके रात-दिन की तैयारी करके सैकड़ों बार परीक्षा, साक्षात्कार में बैठकर उपलब्धि हांसिल किए हुए होते हैं। इन नाकारत्मक सोच में सबसे ऊपर पत्रकार हैं। मैं भी एक पत्रकार हूं और मुझे भी लगाता है कि सरकारी कर्मचारी कामचोर होते हैं, लेकिन सच यह भी है कि ज्यादातर पत्रकार प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारी हैं। उन्हें यह भी सोचना होगा कि क्या वे सही हैं। हाल फिलहाल में केंद्र सरकार ने जिन सरकारी कंपनियों को निजीकरण की आग में ढकेल दिया उनमें महत्वपूर्ण नाम रेलवे के साथ ही एयर इंडिया, शिपिंग कॉर्पोरेशन, बीईएमएल, बीपीसीएल हैं। जिन पर फैसले की प्रक्रिया जारी है उनमें प्रोजेक्ट एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड, इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट (इंडिया) लिमिटेड, ब्रिज और रूफ कंपनी इंडिया लिमिटेड, सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड(सेल), बीईएमएल लिमिटेड, फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (सब्सिडियरी), नगरनार स्टील प्लांट ऑफ एनएमडीसी लिमिटेड, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया की यूनिट्स (एलॉय स्टील प्लांट, दुर्गापुर स्टील प्लांट, सालेम स्टील प्लांट, भद्रावती स्टील प्लांट), पवन हंस लिमिटेड, एयर इंडिया और इसकी 5 सब्सिडियरी कंपनियां, एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड, इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड, द शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, नीलांचल इस्पात निगम लिमिटेड, राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड, आईडीबीआई बैंक हैं। वहीं एडमिनिस्ट्रेटिव मंत्रालयों ने जिन कंपनियों के लिए निजीकरण के ट्रांजेक्शन का प्रोसेस कर दिया है उनमें इंडिया टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपरेशन लिमिटेड की तमाम यूनिट, हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड, बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड हैं। कुछ कंपनियों के निजीकरण का ट्रांजेक्शन याचिकाओं के कारण रुका हुआ है। उनमें हिंदुस्तान न्यूजप्रिंट लिमिटेड (सब्सिडियरी), कर्नाटक एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड, हिंदुस्तान फ्लोरोकार्बन्स लिमिटेड (सब्सिडियरी), स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड, हिंदुस्तान प्रीफैब लिमिटेड, सीमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की यूनिट्स हैं। वहीं जिन कंपनियों के निजीकरण का ट्रांजेक्शन पूरा हो गया है। उनमें हिंदुस्तान पेट्रोलियन कॉरपोरेशन लिमिटेड, 30- रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड, एचएससीसी (इंडिया) लिमिटेड, नेशनल प्रोजेक्ट्स कंसट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटेड, ड्रेजिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड, नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड, कमरजार पोर्ट लिमिटेड हैं। यह तो हुई केंद्र सरकार की बातें। अब बात करते हैं छत्तीसगढ़ सरकार की जो केंद्र सरकार के रवैया को अपनाकर छत्तीसगढ़ की सरकारी कंपनियों और संस्थाओं को निजीकरण की आग में ढकेल दी है। इनमें सबसे पहला नाम है रेडी टू ईट फूड वितरण का। जिसे बीज निगम के शेयर के साथ प्राइवेट कंपनी पीवीएस को सौंपने का आदेश जारी किया गया है, इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। वहीं दूसरा नाम है सरकारी स्कूलों का जिसके संचालन की जिम्मेदारी स्वामी आत्मानंद ट्रस्ट को सौंप दिया गया है। पहले हिंदी माध्यम सरकारी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम के नाम पर और अब हिंदी माध्यम स्वामी आत्मानंद के नाम पर निजी ट्रस्ट को सौंपने की घोषणा की गई है। इसके अलावा वन द्वारा संचालित हो रही अब तक संजीवनी केंद्र को भी प्राइवेट कर दिया गया है। हर जिले में एक निश्चित जगह पर धनवंतरी नाम से दवा दुकानों के लिए धनवंतरी डिस्ट्रिब्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को जमीन व दुकान सरकारी खर्च पर उपलब्ध करवाई गई है। इन सब स्थितियों को देखकर यह समझ आता है कि आम आदमी का हर तरफ झुलसना तय है क्योंकि निजीकरण का सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी को होना है। जहां सुविधाओं के नाम पर समानों का दाम बढ़ेगा और उसका कोई शिकायत भी सुनने वाला नहीं है। सरकारें अपने चहेती कंपनियों को निजीकरण का फायदा दे रही हैं। ऐसे में अब विचार आने लगा है कि जिन पार्टियों को हम मतदान करके जीता रहे हैं वह जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता का शासन न होकर निजी कंपनियों का, निजी कंपनियों के द्वारा, निजी कंपनियों के लिए शासन हो गई हैं।
© दीपेंद्र शुक्ल की 🖊से
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