ट्रेंड बदला: शादियों से गारी हुई गुम, फिल्मी गानों पर अब घराती थिरकते हैं
शादी में डांस का परफार्मेंस अच्छा हो इसके लिए महंगे इवेंट मैनेजर रखे जा रहे है। डांस का स्टेप व मूवमेंट की तैयारी करते हैं, ड्रेस कोड ने भी अलग पहचान बनाई हुई है।
शादियों का सीजन चल रहा है और ऐसे में शादियों की बात न हो, उनकी प्रथाओं और परंपराओं की बात न हो ऐसा हो नहीं सकता। जब हम किसी शादी विवाह में जाते हैं हमें तो कुछ ना कुछ नए ट्रेंड देखने को मिलता है। अब शादी गांव की हो या शहर की हर जगह की शादी में अब बदलाव देखने को मिल रहा है। हालांकि पुराने जमाने से लेकर नए जमाने की तुलना नहीं हो रही है। लेकिन वास्तव में देखें तो पुरानी शादियों और अब की शादियों के तरीकों में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। याद है मुझे पहले बड़े अदब से ब्याह-शादियां होती थीं, जो अब सब बदल रहा है। खासकर शादियों की गीत-गालियां (गारी) अब गुम हो गई हैं। पहले फिल्मी गानों पर बराती डांस किया करते थे, अब घराती भी थिरकते दिखते हैं। इतना ही नहीं शादी में डांस का परफार्मेंस अच्छा हो इसके लिए महंगे इवेंट मैनेजर तक नियुक्त किए जा रहे हैं। ये मैनेजर डांस के प्रशिक्षक के माध्चयम से दुल्हा और दुल्हन परिवार के लोगों को डांस के सही स्टेप करना सिखाते हैं। इतना ही नहीं अब शादियों में ड्रेस कोड भी लागू की जा रही है, हर दिन के ड्रेस तय किए जा रहे हैं। इसमें जो लोग शादी में शामिल होने जाते हैं, उन्हे किसी दिन कर्ता पायजामा, किसी दिन कोर्ट पैंट तो किसी दिन राजस्थानी ड्रेस पहनते हैं।
हिंदू धर्म में विवाह 14 वां, लेकिन सबसे ज्यादा प्रबल और धूमधाम से मनाया जाने वाला संस्कार है। शादी थे।
मूल परंपराओं में भले ही ज्यादा फर्क न आया हो, लेकिन उन्हें पूरा करने के ढंग में जरूर बदलाव देखने को मिल रहा है।एक समय था जब महिलाएं ही खाना बनाती थी और फिर बारात में आने वाले बारातियों को चौका पानी पूछकर उन्हें आमंत्रित कर, हाथ-पाव धुलाकर, बड़े सम्मान पूर्वक बिठाकर खाना खिलाते थे। समय बदला और बफे सिस्टम शुरू हो गया, अब बाराती हो या घराती को छोड़ दिया जाता है, वे अपनी मर्जी और अपने पसंद के हिसाब से खाना खाते हैं। यह बदलाव खाने में ही नहीं हुआ बल्कि दुल्हा और दुल्हन के कपड़े, उनके वरमाला के समय स्टेज और मंडप में आने के अंदाज में भी हुआ दिखाई देता है। जहां पहले दुल्हनों में अदब रहा करती थी, वह हया में शादी के वक्त शर्माती थी, जो शर्म हया अब गायब हो चुकी है, अब दुल्हनें स्टेज पर मुस्कुराती नजर आती हैं, विदाई के वक्त दुल्हन के साथ जब पूरा परिवार रो दिया करता था, अब टाटा, बाय-बाय करके दुल्हनें पति के साथ विदा हो रही हैं।
इतना ही नहीं यह समय भी अब निकल चुका है, बदलते ट्रेंड में अब लड़कियां बारात लेकर लड़के पक्ष के यहां आने लगी हैं, वे दुल्हा विदा करा ले रहीं है, जबकि अब तक लड़के ही बारात लेकर जाते दिखाई देते हैं। हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हुई एक शादी में लड़की उत्तराखंड से बरात लेकर यहां पहुंची, इस बारात में बड़ी संख्या में सेलीब्रिटी शामिल हुए। इतना ही नहीं वक्त के साथ अब एक नया बदलाव यह है कि शादियों में गाए जाने वाले गीतों का ट्रेंड भी खत्म हो गया है। इनकी जगह फिल्मी गानों ने ले लिया है। हाल के दिनों में देखने को मिल रहा है कि परिवार के सदस्य शादी को धूमधाम से मनाने के लिए इवेंट मैनेजर रख रहे हैं, जो परंपरा के अनुसार एक पारिवारिक कार्यक्रम और रस्म समझकर नहीं बल्कि शादी को करतब समझकर जल्द से जल्द निपटा दे की उधेड़ बून में लगे रहते हैं।
मुझे याद है पहले केंद्र में परिवार हुआ करते थे, लेकिन अब लड़का और लड़की पर ही सभी का फोकस है।
पहले शादियां सादगी से होती थीं, लड़के वालों के आवभगत की जिम्मेदारी बहुत ज्यादा होती थी। लड़के की नौकरी का कोई वजूद नहीं था, घर की संपन्नता के आधार पर ही रिश्ते पक्के हो जाते थे। लड़का और लड़की वालों का सूत्रधार पंडित और नाई हुआ करते थे। इस दौरान लड़का-लड़की के गोत्र, कुंडली और गुण मिलान का भी ध्यान रखा जाता था। इसे गलत नहीं कह सकते, लेकिन पहले की शादियों में दो परिवारों का मिलन होता था, परिवार को केंद्र में रखा जाता था, जबकि अब दो लोगों को जीवन जीना है बोलकर लड़का और लड़की के मिलन पर फोकस हो गया है।
मेट्रिमोनियल साइट के बढ़े चलन ने रिश्तेदारों के महत्व को कम सा कर दिया है।वो दौर चला गया है जब लोग रिश्तेदारों से विवाह योग्य लड़कों के नाम-पता पूछते थे। इसकी जगह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म मेट्रिमोनियल साइट्स ने ले ली हैं। अखबारों में वर, वधु के लिए विज्ञापन के साथ ही दुनियाभर के सोशल मीडिया साइट्स पर लोग अब जुड़े हुए हैं, ऐसे में वे वहीं एक दूसरे को पसंद कर शादी के लिए तैयार हो जा रहे हैं।
हाल के दिनों में प्री वेडिंग शूट का चलन बढ़ा है। शादी में अब लड़का और लड़की प्री वेडिंग शूट करा रहे हैं। इसे एक दूसरे को समझने के लिए अच्छा अवसर कहा जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह उस रोमांच को भी खत्म कर रहा है जब स्टेज पर दुल्हन के सामने आने पर दीदार के लिए दुल्हे इंतजार करते थे। पिछले कुछ साल से प्री वेडिंग शूट का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है। फोटो शूट के लिए न सिर्फ स्टूडियो बल्कि दोनों पक्ष के लोग बाहर तक भेज रहे हैं। इतना ही नहीं अब लाल जोड़े की बंदिश भी खत्म हो गई है। अब नीला, गुलाबी, पीला, हरा कई रंगों के ड्रेस दुल्हन पहन रही हैं। साथ ही लहंगा का प्रथा भी बढ़ा है।
बारात के आगमन से विदाई तक अलग-अलग गीत गाए जाते थे। शादी में आने वाले बारात से लेकर लड़की की विदाई तक में अलग-अलग मौके पर गीत-गालियां गाई जाती थी। अकेले छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के ज्यादातर क्षेत्र में गारी गाने की परंपरा थी, इस बारातियों खासकर लड़के के पिता, चाचा, फूफा, जीजा, बहनोई को लक्ष्य करके महिलाएं गारी गाती थीं। अलग-अलग मौके पर गीत भी गाने का रिवाज था जो अब बदल गया है। शादी में बारात के पहुंचने पर स्वागत गीत से लेकर लड़की के विदा होने पर विदाई गीत भी गाए जाते है। हलांकि यह गीत गायन का कार्यक्रम शादी वाले घरों में मंडप वाले दिन से ही शुरू हो जाते, जिसमें दुल्हा या दुल्हन के घर में आने वाले उनके फूफा, जीजा, बुआ, दीदी, भाभी के लिए गारी गाते थे।
देवतला स्थानीय देवी देवताओं को आमंत्रित करने के लिए सुआसिन पर्रा में हल्दी चावल लेकर जाती थी।
हरदिआही परिवार के लोग दुल्हन और वर को हल्दी लगाते हैं। इसी समय चिकट परंपरा निभाते थे। अब यह परंपरा गिफ्ट ने ले लिया है।
इस लेख में छत्तीसगढ़ की बात कर रहे है तो यहां के डिड़वा नाच की पुरानी परंपरा का जिक्र भी आता है। यह बारात निकलने के बाद दुल्हे के घर-परिवार की महिलाएं रात को पुरुषों का वेश धारण कर नाच गाना करती थी। इसे डिड़वा नाच कहते हैं। इसमें महिलाएं डाढ़ी-मूंछ भी लगाती हैं। यह नाटक-नौटंकी भी अब देखने को नहीं मिलता।
राती भाजी की परंपरा भी नहीं निभाई जा रही है। जबकि
बारात लेकर वधु के घर पहुंचने पर दुल्हे को वधु पक्ष के तरफ से लड़कियां राती भाजी खिलाती हैं, इसमें कई तरह की भाजियां होती हैं। जिसे दुल्हे को प्रतिकात्मक रूप से खिलाया जाता है। इसमें मजाक की परंपरा भी होती है, जो गुम होते जा रही है।
तीन और पांच तेलिया की परंपरा थी, छत्तीसगढ़ में शादी तीन और पांच दिन का होती थी। जो लोग तीन तेलिया होते हैं वे तीन दिन तक तेल हल्दी चढ़ाते हैं, और जो पांच तेलिया होते हैं वे पांच दिन तक इस प्रक्रिया को अपनाते हैं। अब मेहमानों के पास समय की कमी और उनकी व्यस्तता के कारण पूरा काम एक दिन में ही किया जा है।
सुआसिन असल में दुल्हे की बुआ और शादी शुदा बहनों को कहा जाता है। तेल हल्दी चढ़वाने से लेकर बारात भेजने और आगमन तक इनकी भूमिका प्रमुख होती है। इसी तरह फूफा और जीजा सुआसा का काम करते हैं। शादी के दौरान दुल्हा-दुल्हन का पूरा खयाल यही लोग रखते हैं।
चुलमाटी की परंपरा में सुआसा (फूफा, जीजा) सब्बल से मिट्टी खोदते थे, उसे सुआसिन (बुआ, शादीशुदा बहनें) अपने आंचल में लेकर आती हैं। उसी मिट्टी से मंडपाछादन होता था। इसी समय बढ़ई के यहां से मंगरोहन लेकर आते थे।
सिंदूरदान और कनकन की परंपरा रजक समाज की महिलाएं सिंदुर दान की परंपरा निभाती थी। साड़ी से ढंककर यह परंपर निभाती हैं। शादी दुल्हा के घर कनकन छुड़ाने की परंपरा है।
बैना की परंपरा विवाह के बाद बैना बांटने की परंपरा थी, इनकी जगह गिफ्ट ने ले लिया है।
इनमें से कयी परंपरा निभाए जा रहे हैं, लेकिन उसमें रौनक कम दिखाई देता है।
©Deependra Shukla
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