संदेश

जाति संघर्ष को खत्म करने उठाना होगा कदम

देश के विभिन्न हिस्सों से जाति संघर्ष की खबरें मिल रही हैं। यह विचलित करने वाली स्थिति को निर्मित कर रही है। मणिपुर में सांप्रदायिक तनाव का कारण भी जाति संघर्ष है। ऐसा ही संघर्ष छत्तीसगढ़ के बस्तर और जशपुर में भी देखने को मिल रहा है। यहां के मूल आदिवासी ईसाई धर्म को अपनाने वाले आदिवासियों का विरोध कर रहे हैं विरोध इतना ज्यादा बढ़ चुका है की यह अब संघर्ष का रूप धारण कर रहा है। इस बात का फायदा कुछ राजनीति पार्टियां उठा रही हैं और इस तरह के संघर्ष को बढ़ावा दे रही हैं। जबकि इसका समाधान निकलने के दिशा में काम करना चाहिए। हाल के दिनों में जाति संघर्ष का नया और ताजा मामला बिलासपुर जिले के तखतपुर और मस्तूरी में और बलौदा बाजार के लवण में देखने को मिला। प्रशासन ने लवण का मामला तो सुलझा लिया लेकिन बिलासपुर के तखतपुर और मस्तूरी का मामला अब भी पस भरे घाव की तरह लगातार दर्द पहुंचा रहा है। राजनैतिक दल पहले धर्म को आधार बनाकर लोगों के भावनाओं से खिलवाड़ किया और फिर अब जाति संघर्ष में देश को झोंकने का काम कर रहे हैं। राजनैतिक दलों से जुड़े लोगों के बयानबाजी के कारण आज देश के अलग अलग हिस्से में तनाव की...

न्याय व्यवस्था से उठता विश्वास

उत्तरप्रदेश में पिछले एक माह में यह दूसरी घटना है जब पुलिस की मौजूदगी में किसी की निर्मम हत्या कर दी गई हो। इससे पहले पुलिस खुद गाड़ी पलटकर और अपराधी का पीछा कर एनकाउंटर कर रही थी। यह न्याय पाने और न्याय देने का तरीका पुलिस और सरकार ने जो इजाद की हैं यह भविष्य के लिए बहुत ही खतरनाक होते जा रहे हैं। कुछ जगहों से सूचना आ रही है की जेल के भीतर बन कैदियों और बंदियों तक की हत्या कर दी जा रही है। खासकर ऐसे जेलों में जहां गंभीर मामलों के अपराधी बंद हैं जिनका ट्रायल अब भी कोर्ट में लंबित है। आम जनता का पहले ही न्याय व्यवस्था के ऊपर से विश्वास डगमगा गया है, ऐसे में इधर जज के सामने गोली मारकर हुई हत्या ने कानून व्यवस्था के ऊपर से विश्वास उठाने का काम किया है।    न्याय मिलने में हो रही देरी का दुष्परिणाम अब सामने आने लगा है। पीड़ित अब न्याय पाने के लिए बेचैन और उतावले होने लगे हैं। लोगों का कानून व्यवस्था पर से विश्वास कम हो रहा है। वह अपने ढंग से न्याय की खोज करने निकल पड़े हैं। जैसे सन्यासी शांति की खोज के लिए दूरस्थ वनांचल क्षेत्र का चयन कर रहे हैं। उसी तरह से पीड़ित कहे या न्याय...

मुंडेर पर

अब नहीं आते कौए छत की मुंडेर पर कांव कांव कर संदेश भी नहीं देते  मेहमानों के आने की वह कहानी का बढ़ाते प्रदूषण से हो गया है खात्मा  जैसे जंगल में फलदार पेड़ खत्म हो गए हैं भुखमरी में बंदर आ रहे हैं गांव और शहर में मानव के मचाए उत्पात का बदला लेने बंदर  जंगल से बस्तियों में आकर उत्पात मचा रहे हैं  बिछाए तारों के जाल में खुद इंसान घिर गया है इन्हीं तारों में कभी कौआ फंसे अब बंदर उलझ रहे हैं किचन गार्डन से सब्जियां, बगीचे से फल हर दिन की दिनचर्या में कर लिए शामिल अब गांव और शहर के लोग परेशान हो रहे हैं बंदर का उत्पात मानव के मचाए उत्पात से कम है अब भी वक्त है सुधरने का, वर्ना जंगल में हैं शेर, हाथी, भालू जैसे जीव जो मुंडेर पर आ बैठेंगे

विश्व के 1.6 अरब लोगों को पीने का स्वच्छ जल नहीं मिल पा रहा है

विश्व जल दिवस पर विशेष जानकारी नदी एवं जल विशेषज्ञ डॉ. ओम प्रकाश भारती से जानिए ‘जल है तो कल है।' विश्व जल दिवस यानी जल के महत्व को समझने का दिन।  जल को संरक्षित कर सभी प्राणियों के लिए जल उपलब्ध कराने हेतु संकल्प लेने का दिन। इन्हीं उद्धेश्यों को लक्षित कर संयुक्त राष्ट्र ने 1992 में रियो डि जेनेरियो के अपने अधिवेशन में 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाने का संकल्प लिया, तब से प्रतिवर्ष विश्व समाज जल दिवस मनाता आ रहा है। आज विश्व के 1.6 अरब लोगों को पीने का स्वच्छ जल नहीं मिल पा रहा है। जल के संरक्षण तथा सभी को स्वच्छ जल उपलब्ध कराना आज  की सबसे बड़ी चुनौती  है। राष्ट्रीय जलनीति 1987 के अनुसार, जल प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है। यह मनुष्य की बुनियादी आवश्यकता है और बहुमूल्य संपदा है। प्रकृति ने हवा और जल प्रत्येक जीव के लिए निःशुल्क प्रदान किए हैं। जल सबको चाहिए और इस पर सबका अधिकार  होना चाहिए। लेकिन आज वर्चस्ववादियों ने जल पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया है। आम आदमी गंदा पानी पीने के लिए मजबूर है। जल में आवश्यकता से अधिक खनिज पदार्थ, अनावश्यक लवण, कार्बनिक तथा अक...

सरकारें बना रही पत्रकारिता पर दबाव

सरकारी तंत्र का दुरूपयोग करके पत्रकारिता पर दबाव बनाना सरकारों का अब एक हथकंडा हो चुका है। मुख्य तीन स्तंभ को अपने कब्जे में लेने के बाद अब कथित चौथे स्तंभ को भी मोड़ने की कोशिश की जा रही है। लोकतंत्र के सभी चारो स्तंभ लगभग सरकार के शरणागत हो चुके हैं, जो नहीं हुए उन्हें किसी भी हद तक जाकर गुलाम बनाया जा ‌रहा है। हाल के दिनों में जिस तरह से हाईकोर्ट में जजों की राजनैतिक नियुक्तियां करवाई गयी है, जिस तरह से आईएएस, आईपीएस राजनैतिक विशेष पार्टियों के लिए काम कर रहे हैं, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका पूरी तरह शरणागत हुए से दिखने लगे हैं। बीच बीच में दो‌ चार जजमेंट करके भले ही सुप्रीम कोर्ट और गिने चुने हाईकोर्ट के जज सुर्खियों में आ जाएं, वरन अब तो न्यायालय और न्यायपालिका से लोगों का भरोसा उठने सा लगा है। अपराधियों के लिए सहूलतें बढ़ती जा रही हैं, पीड़ित लगातार प्रताड़ित होते जा रहे हैं। लोक तंत्र से लोक गायब है, जन तंत्र से जन, न्यापालिका‌ से न्याय गायब है, व्यवस्थापिका से व्यवस्था, कार्यपालिका से कार्य गायब है, बची हुई थी मीडिया उससे अब समाचार गायब हो रहे हैं। अगर सरकार ने कह ...

नदियां हमारी मां है, उसके हम उपभोक्ता नहीं हो सकते, इसलिए नदी तीर्थ‌ शुरू करे सरकार

नदीवेता और पूर्व सांस्कृतिक राजदूत फिजी प्रो. ओमप्रकाश भारती प्रेस क्लब के पहुना कार्यक्रम में पहुंचे। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नदियों को मां का दर्जा प्राप्त है। पहले सरकार ने ब्रिटिश अधिनियम की नकल कर देश की नदी नीति बनाकर समाज से नदियों को छीन ली और अब सरकारें यूरोपीय देशों की नकल कर यहां नदी पर्यटन की बात कह रही हैं। जबकि नदियां हमारी मां है, मां का कोई उपभोक्ता नहीं हो सकता। नदियां मानव के पृथ्वी पर आने से‌ हजारों लाखों साल पहले से पृथ्वी पर मौजूद हैं तभी तो उसले किनारे पर मानव बसा, इसके उदाहरण अब मिल रही सभ्यताएं हैं। उन्होंने बिलासपुर के पत्रकारों को धन्यवाद देते हुए कहा कि  अरपा को लेकर यहां के पत्रकारों ने जितना लिखा है, उतना महत्व गंगा नदी को मध्य भारत के पत्रकारों ने नहीं दिया। आगे कहा कि कुछ समय से नदी पर्यटन को लेकर बात चल रही है, यह अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए नियम लागू किया जाना चाहिए। बल्कि यह कहूंगा कि नदी टूरिज्म की जगह नदी तीर्थ शुरू करें, जिससे समाज की आस्था उस पर रहे। प्रो. भारती ने आगे कहा कि नदी पर सबसे ज्यादा अधिकार समाज का है, लेकिन कार्पोरेट इसका...

ट्रेंड बदला: शादियों से गारी हुई गुम, फिल्मी गानों पर अब घराती थिरकते हैं

शादी में डांस का परफार्मेंस अच्छा हो इसके लिए महंगे इवेंट मैनेजर रखे जा रहे है। डां स का स्टेप व मूवमेंट की तैयारी करते हैं , ड्रेस कोड ने भी अलग पहचान  बनाई हुई है। शादियों का सीजन चल रहा है और ऐसे में शादियों की बात न हो, उनकी प्रथाओं और परंपराओं की बात न हो ऐसा हो नहीं सकता। जब हम किसी शादी विवाह में जाते हैं हमें तो कुछ ना कुछ नए ट्रेंड देखने को मिलता है। अब शादी गांव की हो या शहर की हर जगह की शादी में अब बदलाव देखने को मिल रहा है। हालांकि पुराने जमाने से लेकर नए जमाने की तुलना नहीं हो रही है। लेकिन वास्‍तव में देखें तो पुरानी शादियों और अब की शादियों के तरीकों में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। याद है मुझे पहले बड़े अदब से ब्‍याह-शादियां होती थीं, जो अब सब बदल रहा है। खासकर शादियों की गीत-गालियां (गारी) अब गुम हो गई हैं। पहले फिल्मी गानों पर बराती डांस किया करते थे, अब घराती भी थिरकते दिखते हैं। इतना ही नहीं शादी में डांस का परफार्मेंस अच्छा हो इसके लिए महंगे इवेंट मैनेजर तक नियुक्त किए जा रहे हैं। ये मैनेजर डांस के प्रशिक्षक के माध्चयम से दुल्हा और दुल्हन परिवार के लोगों को ...

सुपर सीएम की प्रथा छत्तीसगढ़ में जारी है

 छत्तीसगढ़ में सुपर सीएम की एक बार फिर बात निकलकर आ रही है। छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़िया का यह दुर्भाग्य ही कहेंगे की निर्वाचन में जनता अपने लिए जन प्रतिनिधि का चुनाव करती है और यही जन प्रतिनिधि सत्ता में आने के बाद अधिकारियों को सुपर सीएम बना लेते हैं। अजीत जोगी के समय से चली आ रही व्यवस्था को डाॅ. रमन के समय अमन सिंह को और अब भूपेश बघेल के समय सौम्या चौरसिया को कथित सुपर सीएम घोषित किया जाना राज्य की जनता के वोट पर करारा प्रहार होने के साथ ही लोकतांत्रिक गणराज्य को मजाक बना दिया गया है। इधर ईडी ने छत्तीसगढ़ की कथित सुपर सीएम को कथित भ्रष्टाचार के मामले में हिरासत में ली है। राज्य मेंववैसे आई तो झारखंड पुलिस भी है भाजपा के नेता और भानुप्रतापपुर के प्रत्याशी को गिरफ्तार करने पर लगता है हौंसला नहीं कर पा रही या फिर राज्य की सरकार सहयोग नहीं कर पा रही। चाचा कह रहे थे बात जो भी हो चोर चोर मौसेरा भाई होते हैं, डाॅ. रमन के समय हुए कथित घोटालों में अब वर्तमान की कांग्रेस सरकार की संलिप्त होना उजागर हुआ है। जो भी हो जनता के धन का सरकार में कोई भी रहे जमकर दुरुपयोग हो रहा है।

सरकार नहीं निभा पा रही जिम्मेदारी

 इसी ठंड के महीने की बात थी 2014 में बिलासपुर में नया नया आया था, कुछ माह ही बीते थे, रायपुर में तीन साल रहने के बाद यहां मौका मिला था, चुनौती थी सबकुछ समझने की। अब तब अखबारों से रिपोर्टर की खबर टाइप करने के लिए लगाए गये कंप्यूटर टाइपिस्ट हटा दिए गये थे। ऐसे में लंबी लंबी खबर लिखने पर हर दिन समझाइश दी जाती और कभी कभार सीनियर से डांट भी पड़ती थी। हालांकि वक्त का पहिया चलता जा रहा था, मुद्दे की बात यह है कि ऐसे ही ठंड के समय में कानन पेंडारी के पास कैंसर के इलाज के लिए एक परिवार द्वारा दान की गयी जमीन और अस्पताल में महिला नसबंदी शिविर लगाई गयी।   जहां बड़ी संख्या में आस-पास की‌ महिलाओं की नसबंदी की गयी। साथ ही कयी दवाइयों के साथ जहरीली सीप्रोसिन 500 दवा भी विपरीत कर दी गयी। यह दवाइयां  सरकार ने सप्लाई की गयी थी। इसे खाने के बाद एक एक कर महिलाओं की तबीयत बिगड़ने लगी और फिर एक के बाद एक महिलाओं की मौत होने लगी। इस घटना के बाद प्रदेश के स्वास्थ्य का सच सामने आया और मीडिया के माध्यम से एक के बाद एक पोल खुलता चला गया। इसके कयी साल बाद सिम्स में एक घटना घटी जिसमें पता चला कि...

प्राचार्य के भाषण का डर

 प्राचार्य के हाथ में माइक देखकर प्रोफेसर डाल लेते हैं कान में रूई यह पढ़कर आश्चर्य में मत पड़िए यह हकीकत बिलासपुर में एक कॉलेज की प्राचार्य के भाषण का है। वैसे तो बिलासपुर में सौ से ज्यादा कॉलेज हैं लेकिन इस काॅलेज की बात ही कुछ अलग है। यहां के छात्र से लेकर प्रोफेसर तक में भाषण को लेकर दहशत महसूस किया गया है। कोई छात्र हो या प्रोफेसर मैडम का भाषण शुरू होने वाला है इतना सुनकर ही भयभीत हो जाते हैं यह भय इतना है कि वे इस बारे में बात तक नहीं करते। भय का माहौल ऐसा है कि मैडम प्राचार्य के हाथ में माइक देखकर ही प्रोफेसर कान में रूई डाल लेते हैं। वहीं प्राचार्य मैडम एक बार भाषण देना शुरू कर दीं तो फिर किसी की मजाल नहीं है कि उन्हें कोई टोक दे। भाषण देने से रोक ले ऐसा हिम्मत किसी में नहीं है। इतना ही नहीं कॉलेज में कोई कार्यक्रम होने वाला है इस बात की जानकारी होने और प्राचार्य का भाषण होगा इतनी सी जानकारी मात्र से कॉलेज के प्रोफेसर अपने जेब में रुई डालकर लाते हैं और भाषण के समय कान से खून न निकल जाए इससे पहले ही वे अपने कान में डाल लेते हैं। इतना ही नहीं बच्चे कार्यक्रम छोड़कर गायब हो जात...