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केजरीवाल की मुहिम को कहीं अपना तो नहीं रहे मोदी

आम आदमी पार्टी (आप) यह नाम तो आप ने सुना हीं होगा। हांजी हां हम बात कर रहे हैं आपकी आम आदमी पार्टी की आम आदमी की जिसने दिल्ली में 49 दिन की सरकार चलाई और अपनी शर्त न मानने पर इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद उसकी खुब छीछा लेदर किया गया और फिर मजाक भी उडाई गई की झाड़ू वाले क्या करेंगे। दरअसल झाड़ू आम आदमी पार्टी की चुनाव चिन्ह है और उसका एजेंडा भी था गंदगी को साफ करेंगे। फिर आप के संयोजक अरविंद केजरीवार जिन्हें एके 49 भी कहा जाता है वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़े और उनके दिल में यह झाड़ू इतना बस गया कि वे केजरीवाल के मुहिम को अपना सा लिए है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत हर जगह झाड़ू लग रहा है। कलेक्टर हो या एसपी मंत्री हो या संत्री सब के सब झाड़ू लगाने में व्यस्त हैं। आखिर प्रधानमंत्री ने जो यह मुहिम चालू करने कहा है। और यह तो भाजपा का राष्ट्रीय मुहिम भी बन गई है। कांग्रेस के लोग भी इसे अपना रहे है कारण महात्मा गांधी जयंती पर नरेंद्र मोदी ने जो यह मुहिम चालू कर रहे हैं। पता चला है कि कर्मचारियों को इस सफाई अभियान के लिए आधे दिन की छुट्‌टी भी इसमें शामिल होने के लिए दी जा रह...

जेल जाने का डर या झूठी बीमारी... बिका हुआ कानून और न्याय व्यवस्था...

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जेल जाने का डर या झूठी बीमारी...  बिका हुआ कानून और न्याय व्यवस्था... न्यायालय ने आय से अधिक मामले में जे. जयललीता को चार साल सजा सुनाई। 18 साल पहले किए गुनाह आय से अधिक संपत्ति मामले में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता को कोर्ट ने 4 साल कैद की सजा सुनाई। हमारी न्याय व्यवस्था कितनी मजबूत है और हम कितनी जल्दी न्याय पा रहे है इसी बात से पता चलता है। सिर्फ जयललिता ही नहीं उनकी तरह के कई और मामले है जिसमें कोर्ट में नेताओं के खिलाफ या तो केस पेंडिग है या फिर उनपर करप्शन का दोष सिद्ध हो चुका है। कुछ माह पहले की ही तो बात है बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेलवे मंत्री लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाला सिद्ध हुआ और उन्हें जेल जानी पड़ी। पूर्व टेलिकॉम मिनिस्टर सुखराम और हरियाणा के पूर्व सीएम ओम प्रकाश चौटाला को भी कोर्ट ने दोषी करार दे चुकी है।                 समझ नहीं आता एक बात की जब भी किसी बड़ा नेता या सफेद पोश लोगों को न्यायालय से सजा मिलती है तो उनकी तबीयत कैसे बिगड़ जाती। अब तो वक्त आ गया है कि न्यायालय में भी डॉक्टर नियुक्त ...

अब सोच बदलने की जरुरत है...

बहुत साल हो गए समाज में अब बदलाव होना चाहिए। लोगों की सोच बदलनी चाहिए। देखने को मिल रहा है लगातार कन्या भ्रूण हत्या की संख्या में इजाफा हुआ है लोगों को अब अपनी इस छोटी मानसिकता को बदलना होगा कि लड़का ही उसका बेड़ा पार करेगा। अगर ऐसा है तो ‌वे शादी हीं न करे। पुरुषों की मानसिकता में अगर लड़का और लड़की को लेकर मतांतर हो तो चलता है क्योंकि वे यह सोच सकते हैं कि वे लड़के को पसंद करते हैं पर अगर महिलाएं भी लड़कियों के जन्म लेने पर विरोध करेंगी तो उनको खुद यह सोचना होगा कि वे क्या हैं। महिलाएं खुलकर सामने आएं और कन्या भ्रूण हत्या कराने से पहले इस पर विचार कर ही कदम उठाए। अगर किसी घर में सास दबाव बनाती है कि कन्या भ्रूण है इसका गर्भपात कराओ तो उसे सिधे जवाब दिया जा सकता है कि अगर उनकी मां भी कन्या भ्रूण होने पर गर्भपात करा ली होती तो आज की स्थिति क्या होता। अगर उस समय उनकी भी कोख में हत्या हो जाती तो आज शायद यह दिन ही नहीं देखना पड़ता। अगर फिर भी दबाव बनाती हैं तो खुलकर पहले उस महिला की हत्या की जाए जो इसके लिए दबाव बना रही है। क्योंकि ऐसे लोग दोषी है और उनकी मृत्यु समाजहित में है। और अगर ऐसी ...

कार्पोरेट जगत के हाथों बिके मीडिया के लिए नेपोलियन बोना पार्ट का कथन कितना सही होगा...

महान विचारक नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा है कि हजार छूरों की तुलना में चार विरोधी अख़बारों से अधिक डरना चाहिए। आज जब मीडिया कार्पोरेट घराना हो गया है और कार्पोरेट में तब्दिल होकर बिक चुका है तो उनका यह कथन कितना सही होगा। नेपोलियन ने यह भी कहा था कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है यह वाकई सही है पर आज अखबारों और टीवी चैनलों पर जैसी तस्वीर छापी और दिखाई जाती हैं वह कितने शब्दों के बराबर हैं। अर्ध नग्न अभिनेत्रियों की वे तस्वीरें सुबह देखकर कोई युवा तो युवा बुजुर्ग का भी मन मचल जाएगा। क्या इस पर सरकार रोक लगा पाएगी, या यह उसी प्रकार कह दिया जाएगा। सेंसर बोर्ड की आज शख्त जरुरत है चाहे वह मीडिया हो या फिल्म उद्योग। अब यह बहाना नहीं चलना चाहिए कि जनता की जो मांग है जो जनता देखना चाहती है वह हम दिखा रहें है। क्या वाकई आम जन यही देखना चाहते है अगर उन्हें यह न दिखाया जाए तो वे समाचार नहीं पढ़ेगें, टीवी पर समाचार नहीं देखेंगे, फिल्म देखना बंद कर देंगे। यह सरासर गलत है तब भी लोग यह करेंगे और तब भी लोग यह करते थे। यह एक कोरा बकवास है जिसे लोग यह कह रहे हैं कि देखने वालों कि यह मांग ...

हरिवंश राय बच्चन की काव्य मधुशाला...

ह रिवंश राय बच्चन की मधुशाला... वाकई एक कवि कितना गहरा पैठ रखा है। वह एक-एक शब्द के लिए उस गोता लगाने वाले जैसा ही व्यवहार करता है जो सागर में मोती के लिए गोता लगातें हैं। कवि उनके जैसा ही मोती रुपी एक-एक शब्द को जोड़ता है और फिर वह कविता की रचना करता है। कविता को पढ़कर समझकर हम जितना कुछ पा जाते हैं वह बड़ी ही आसानी से मिल जाता है पर इसे तैयार करने में कवि की कितनी मेहनत लगती है यह समझना बहुत कठिन है। हरिवंश राय बच्चन जी की कव्य रचना मधुशाला को मैं पढ़ा।  इसे समझने में, पढ़कर इसका सिर्फ स्वाद लेने में ही मुझे नशा सा हो गया। पिछले कुछ दिनों से इस काव्य संग्रह पढ़ रहा हूं पर न मन की प्यास खत्म हो रही है और न यह संग्रह। यह वाकई मधुशाला हो गया है और मैं पीने वाला साकी। इसके प्याले का जाम का आदी सा हो गया हूं मैं। बच्चन जी की इस काव्य रचना को मैं पिछले 4 सालों से पढ़ने के लिए प्रयासरत था जो अब मिल पाई और वाकई किसी वस्तु की खोज पुरी होने और उसे पा लेने के बाद उसमें डुबकर गोता लगाने का अपना ही मजा है। क्या खुब लिखा है उन्होंने... सजे न मस्जिद और नमाज़ी कहलाता अल्लाताला, सजधजकर, ...

...रक्षाबंधन के मायने क्या

आज रक्षाबंधन है। बहनें अपने भाईयों को राखी बांधेगी। क्या यह रक्षा का बंधन कारगर है जबकी आज हर जगह पर बहनों के साथ शोषण हो रहा है अत्यचार हो रहा है। सोचिए उन लोगों पर क्या गुजरती होगी। वे उन बहनों के बारे में क्या सोचती होंगी जिनके हाथों उनकी अस्मत लुटी जाती होगी। ये उन बहनों के उस समय को सोचती होगी जब वे बहने उन भाईयों के हाथों पर राखी बांधी होगी। रक्षा के लिए अपने रक्षा के लिए समाज के रक्षा के लिए। उसी तरह जिस प्रकार किसी की बहन न होने पर भाई के दिल पर आज जो गुजरेगी। हालांकि आजकल जिनकी बहने होती हैं वे ज्यादा अपराध को अंजाम दे रहे है। ऐसे में इस रक्षा बंधन क्या है...

डॉलर डे... हम कहां और तुम कहां

अ मेरिका आज डॉलर डे मना रहा है। डॉलर का जन्म आज के ही दिन 8 अगस्त 1786 को हुआ था। आपको बता दे कि जब भारत आजाद हुआ था तब भारतीय मुद्रा और अमेरिकी डॉलर की वैल्यू बराबर थी। आजादी के बाद भारत की मुद्रा का दर गिरा और अमेरिका के मुद्रा का दाम बढ़ता गया आज की स्थिति में अमेरिका के एक डॉलर बराबर 61 भारतीय रुपए हो गया है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका के डॉलर हमारे लिए कितना महत्व रखता है।                आज के दिन अमेरिका में अवकाश रहता है। दुनिया का सबसे पसंदीदा मुद्रा डॉलर को माना जाता है। अमेरिका में आज नेशनल डॉलर डे मनाया जा रहा है। 8 अगस्त 1786 के दिन कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने अमेरिका मैद्रिक प्रणाली स्थापित की थी। साथ ही 76 साल बाद 1862 में एक डॉलर का पहला नोट छपा।                आप को बता दें कि डॉलर कॉटन और लिनन के 75:25 से बनता है। दुनिया में 100 अमेरिकी डॉलर सबसे अधिक पसंद किया जाता है। दुनिया भर में इसकी संख्या 9 अरब है। जो पुरे अमेरिकी डॉलर का 7 प्रतिशत है।         ...

महान कार्टूनिस्ट चाचा चौधरी की मौत

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हम तूमको ना भूल पाएंगे प्राण ज गजीत सिंह की बचपन पर आधारित गजल  वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी  को शायद हीं किसी ने न सुना हो... और चाचा चौधरी कॉमिक्स शायद ही कोई भूल पाए... हम सभी को चाचा चौधरी जैसा कैरेक्टर देने वाले प्राण का निधन हो गया है। आप को हमारी और से श्रद्धाजंलि है प्राण... वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी ये दौलत भी ले लो, ये शौहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी... मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी, वो बुढिया जिसे बच्चे कहते थे नानी, वो नानी की बातों में परियों का डेरा, वो चेहरे की झुरियों में सदियों का फेरा, भुलाए नहीं भूल सकता है कोई, वो छोटी सी रातें वो लंबी कहानी...  कड़ी धूप में अपने घर से निकलना, वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना, वो गुड़िया की शादी पे लड़ना झगड़ना, वो झूलों से गिरना वो गिर के संभलना, वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफे, वो टूटी हुई चूडियों की निशानी... वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी... इसी तरह कोई ऐसा नहीं होगा जिसने चाचा चौधरी की कहानी न...

योजनाओं के साथ पहल जरुरी है

योजनाओं के साथ पहल जरुरी है केन्द्र सरकार कई प्रोजेक्ट चलाकर नदियों को साफ करवा रही है। गंगा, यमुना में गंदगी का अंबार लग गया है। कोई माने या न माने पर नदी कभी मर नही सकती यह तय है। यमुना दिल्ली के बाद कई जगहों पर हलांकि सुख जरुर गई है पर उसमें गंदगी ड़ालने और नाले में तब्दिल करने की लोगों की साजिश कभी रुकी नहीं है। लगातार जारी है जैसे नदी कभी शांत नही हो सकती उसी तरह उसके किनारे बसे शहर कभी शांत नही हो सकते। हाल में कोशी में बाढ़ का मंजर है। बिहार के ज्यादा तर शहर इसके चपेट में आएंगे। तबाही तो होगी ही। पहाड़ी नदी है। बिहार का शोक इसे कहा जाता है। जन हानी को सरकार रोकने के लिए प्रयासरत है पर क्या माल हानी को भी रोका जा सकता है। नहीं क्योंकि बनाए हुए घर को कहीं ले जाया नही जा सकता। और वैसे भी यह नदी पहड़ी नदी है नेपाल से निकलती है तो इसका प्रवाह तेज होना लाजमी है। पर हमेसा इस नदी में उतना ही पानी आता होगा जितना 10 साल पहले आता था यह कहना कठिन है। पहले हो सकता है ज्यादा पानी आता हो या यह भी हो सकता है कि अब जबकि हर जगह क्रांकिटीकरण हो गया है तो पानी कहीं नहीं ठहरता और नदी में ज्यादा ...

चौथा स्तंभ गिरवी है

चौथा स्तंभ गिरवी है भारत के संविधान में चार स्तंभ है जिनका अलग-अलग काम है। पहला व्यवस्थापिका, दूसरा कार्यपालिका, तीसरा न्यायपालिका और चौथा स्तंभ है मीडिया। कई बार सवाल उठे कि इस चौथे स्तंभ का काम क्या है ? कुछ बुद्धिजीवी ने यह कहा कि बाकि तीनों स्तंभ की देखरेख करने का काम ही मीडिया का है। पर सच क्या है? भारत की व्यवस्थापिका व्यवस्था तो कर रही है और कार्यपालिका 100 रुपए के काम में से 10 रुपए तक को करा ही रहा है। न्यायपालिका अपने काम में कितना कुछ कर रही है यह सबको पता है। लोकिन मीडिया काम इनकी देख रेख करना था तो वह क्या कर रही है। कहीं ऐसा तो नही कि भारत के तीन स्तंभ को पहले ही गिरवी रख दिया गया था। उम्मीद चौथे स्तंभ से था जिसे अधिकार था कुछ करने और तीनों स्तंभ की देख रेख करने का पर ऐसा हो नहीं पाया। आज चौथे स्तंभ पर खतरे का बादल मंडरा रहा है। हमारा चौथा स्तंभ गिरवी की गिरफ्त में जकड़ता जा रहा है। यह गिरवी हो रही है कार्पोरेट की और ना जाने किनका किनका पर उसे इसका हिसाब भी चुकाना होगा। आज नहीं तो कल मीडीया घराने को जवाब तो देना होगा।