जेल जाने का डर या झूठी बीमारी... बिका हुआ कानून और न्याय व्यवस्था...
जेल जाने का डर या झूठी बीमारी...
बिका हुआ कानून और न्याय व्यवस्था...
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| न्यायालय ने आय से अधिक मामले में जे. जयललीता को चार साल सजा सुनाई। |
18 साल पहले किए गुनाह आय से अधिक संपत्ति मामले में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता को कोर्ट ने 4 साल कैद की सजा सुनाई। हमारी न्याय व्यवस्था कितनी मजबूत है और हम कितनी जल्दी न्याय पा रहे है इसी बात से पता चलता है। सिर्फ जयललिता ही नहीं उनकी तरह के कई और मामले है जिसमें कोर्ट में नेताओं के खिलाफ या तो केस पेंडिग है या फिर उनपर करप्शन का दोष सिद्ध हो चुका है। कुछ माह पहले की ही तो बात है बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेलवे मंत्री लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाला सिद्ध हुआ और उन्हें जेल जानी पड़ी। पूर्व टेलिकॉम मिनिस्टर सुखराम और हरियाणा के पूर्व सीएम ओम प्रकाश चौटाला को भी कोर्ट ने दोषी करार दे चुकी है।
समझ नहीं आता एक बात की जब भी किसी बड़ा नेता या सफेद पोश लोगों को न्यायालय से सजा मिलती है तो उनकी तबीयत कैसे बिगड़ जाती। अब तो वक्त आ गया है कि न्यायालय में भी डॉक्टर नियुक्त किया जाए ताकि फैसले से पहले ही आरोपी की पुरी जांच करलें ताकि सजा मिले तो आरोपी जेल जाए न कि हॉस्पिटल। पूर्व में भी कई ऐसे मामले हो चुके हैं जब आरोपी को जेल के बजाय हॉस्पिटल में भर्ती कराया जाता है और फिर वे उपरी न्यायालय से जमानत लेकर आजादी मनाते है। साथ ही जब न्यायलय से आरोप सिद्ध हो जाता है तो फिर जो लोग समर्थक है वे हुल्लड मचाते है मदतमिजी करते हैं और रोड पर आकर अपने बाप की संपती समझ सरकारी संपत्ति और निजी संपती को आग लगाते है तोड़ते है फोड़ते है। ऐसे में कानून को किस तरह निपटना चाहिए यह भी तय होना चाहिए। जैसे शनिवार को जे. जयललिता को सजा मिलने के बाद उनके समर्थकों ने हुल्लड़बाजी की बसों में तोड़ फोड़ किया वो कितना सही है। उनकी देवी माता इतना ही सही थी तो खुद को कोर्ट में पाक साफ क्यों नहीं कर पाई। बात यह भी ऐसे मामले में पुलिस सबसे पहले कहती है कि कौन लोग थे पता नहीं पर परेशानी तो आम लोगों को हो ही गई। ऐसे में प्रशासन को चहिए की जिसे सजा मिली है उसके ऊपर ही इस मामले का अपराध दर्ज किया जाए आखिर उनके ही तो समर्थकों ने इस उल जलूल हरकत को अंजाम दिया है। सभी न्यायलयों में हॉस्पिटल की व्यवस्था हो ताकि वहां से आरोपी सिधे जेल जाए। ऊपरी अदालत को निचली अदालत की इज्जत बढ़ानी होगी की मामले में देखा जाता है कि निचली अदालत ने जो सजा सुनाई है उसे ऊपरी अदालत ने खारिज कर दिया या आरोपी को जमानत दे दिया ऐसी क्या मजबूरी है कि आरोपी को सजा मिलनी चाहिए। बतौर उदाहरण तहलता के संपादक को एक बार जमानत मिली तो वो बार-बार जमानत लेकर अब बाहर है। लालू प्रसाद यादव को सजा मिली फिर जमानत मिल गया अब वे राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। आखिर कब तक चलेगा ऐसा कि निचली अदालत के न्यायाधीशों की अनदेखी की जाएगी। अगर देश के उच्च न्यायालय इतने ही इमानदार हैं तो सारे मामले उलझाकर क्यों रखे है जांच करा कर तुरंत फैसला देकर न्याय दे देते। जो चिज है उसे तो कम से कम किजीए। माना कठिन है पर मुमकिन है नामुमकिन नहीं। आरजेडी प्रमुख लालू यादव को मिला जमानत कितना सही है कितने पुराने मामले में एक तो छोटी सी सजा मिली है करोड़ो का चारा खाने वाले को तो ऐसी सजा मिली जो उम्मीद नहीं की जा सकती फिर ऊपर से जमानत। उसी तरह अब जे. जयललिता का तबियत खराब हो गया तो वे जेल न जाकर हॉस्पिटल में भर्ती हो गई और उनके जमानत के लिए उच्च न्यायलयों के चौखट पर दस्तक उनके वकिलों ने दे दी होगी। क्या व्यवस्था है यह? एक तो जनता के करोड़ों रुपए उन्होंने डकार लिए और सजा कितनी मिली सिर्फ 4 साल चलो वो भी ठिक है पर सजा मिली तो जेल भेजों न इतनी तो मरी नहीं जा रही होगी कि उसे हॉस्पिटलाईज करना पड़ा हो। ठिक है ऐसे लोग अगर मर भी जाते हैं तो क्या फर्क पड़ता है देश के ऊपर धरती के लिए ऐसे लोग बोझ से कम हैं क्या?
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| जे. जयललीता को सजा मिलने के बाद अखबार का समाचार |
आप को कुछ और मामले याद दिलाता हूूं जिसमें आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को रांची की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने करप्शन के मामले में 3 अक्टूबर, 2013 को 5 साल कैद की सजा सुनाई थी। यह मामला अभी रांची हाई कोर्ट में पेंडिंग है। साथ ही पूर्व टेलिकॉम मिनिस्टर सुखराम को दिल्ली की निचली अदालत ने नवंबर 2011 में रिश्वतखोरी मामले में 5 साल कैद की सजा सुनाई थी। इसके अलावा सुखराम को टेलिकॉम से संबंधित उपकरण खरीद घोटाला मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिसंबर 2012 में दोषी करार देते हुए 3 साल कैद की सजा सुनाई थी। जगजाहिर हरियाणा के पूर्व सीएम ओम प्रकाश चौटाला को दिल्ली की निचली अदालत ने इसी साल 22 जनवरी को जेबीटी घोटाले में 10 साल कैद की सजा सुनाई थी। इस मामले में चौटाला व अन्य दोषियों के अपील पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने ऑर्डर रिजर्व कर रखा है।
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| जे. जयललीता ने खाने का स्वाद चखा। |
अब न्यायालयों के ऊपर सवाल तो उठेंगे ही। वक्त है कि न्यायालय भी जबाव दें कि आखिर क्यों चुक हो रही हैं। अब तक सिर्फ न्यायालयों से जवाब मांगे जाते रहे हैं अब वक्त बदल चुका है लोकतंत्र है तो सवाल उठना लाजमी है क्योंकि न्यायालय में बैठने वाले भी इंसान हैं खुदा नहीं हां उन्हें खुदा माना जाता रहा है पर लगातार गलतियां होने से अब वे भी खुदा से इंसान बनने लगे है। साथ ही अंग्रेजी हूकुमत तो है नहीं कि आवाज उठाने पर जुबान काट दिया जाए।



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