हरिवंश राय बच्चन की काव्य मधुशाला...
हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला...
वाकई एक कवि कितना गहरा पैठ रखा है। वह एक-एक शब्द के लिए उस गोता लगाने वाले जैसा ही व्यवहार करता है जो सागर में मोती के लिए गोता लगातें हैं। कवि उनके जैसा ही मोती रुपी एक-एक शब्द को जोड़ता है और फिर वह कविता की रचना करता है। कविता को पढ़कर समझकर हम जितना कुछ पा जाते हैं वह बड़ी ही आसानी से मिल जाता है पर इसे तैयार करने में कवि की कितनी मेहनत लगती है यह समझना बहुत कठिन है। हरिवंश राय बच्चन जी की कव्य रचना मधुशाला को मैं पढ़ा। इसे समझने में, पढ़कर इसका सिर्फ स्वाद लेने में ही मुझे नशा सा हो गया। पिछले कुछ दिनों से इस काव्य संग्रह पढ़ रहा हूं पर न मन की प्यास खत्म हो रही है और न यह संग्रह। यह वाकई मधुशाला हो गया है और मैं पीने वाला साकी। इसके प्याले का जाम का आदी सा हो गया हूं मैं। बच्चन जी की इस काव्य रचना को मैं पिछले 4 सालों से पढ़ने के लिए प्रयासरत था जो अब मिल पाई और वाकई किसी वस्तु की खोज पुरी होने और उसे पा लेने के बाद उसमें डुबकर गोता लगाने का अपना ही मजा है।
क्या खुब लिखा है उन्होंने...
सजे न मस्जिद और नमाज़ी कहलाता अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से।
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।
नजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानों इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को।
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला।।
मुसलमान औ' हिंदू दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला।।
कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूं कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला।।
और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।
आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई,
फिर जहां अभी है मन्दिर मस्जिद वहां बनेगी मधुशाला।।
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