कार्पोरेट जगत के हाथों बिके मीडिया के लिए नेपोलियन बोना पार्ट का कथन कितना सही होगा...
महान विचारक नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा है कि हजार छूरों की तुलना में चार विरोधी अख़बारों से अधिक डरना चाहिए। आज जब मीडिया कार्पोरेट घराना हो गया है और कार्पोरेट में तब्दिल होकर बिक चुका है तो उनका यह कथन कितना सही होगा। नेपोलियन ने यह भी कहा था कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है यह वाकई सही है पर आज अखबारों और टीवी चैनलों पर जैसी तस्वीर छापी और दिखाई जाती हैं वह कितने शब्दों के बराबर हैं। अर्ध नग्न अभिनेत्रियों की वे तस्वीरें सुबह देखकर कोई युवा तो युवा बुजुर्ग का भी मन मचल जाएगा। क्या इस पर सरकार रोक लगा पाएगी, या यह उसी प्रकार कह दिया जाएगा। सेंसर बोर्ड की आज शख्त जरुरत है चाहे वह मीडिया हो या फिल्म उद्योग। अब यह बहाना नहीं चलना चाहिए कि जनता की जो मांग है जो जनता देखना चाहती है वह हम दिखा रहें है। क्या वाकई आम जन यही देखना चाहते है अगर उन्हें यह न दिखाया जाए तो वे समाचार नहीं पढ़ेगें, टीवी पर समाचार नहीं देखेंगे, फिल्म देखना बंद कर देंगे। यह सरासर गलत है तब भी लोग यह करेंगे और तब भी लोग यह करते थे। यह एक कोरा बकवास है जिसे लोग यह कह रहे हैं कि देखने वालों कि यह मांग हैं इसलिए परोसा जा रहा है. लोग नहीं चाहते कि वे सुबह अर्ध नग्न तस्वीर देखे, लोग नहीं चाहते कि उन्हें हर समय टीवी पर नंगापन परोसा जाए वे चैन से कुछ समय अच्छे समाचार देखना चाहते हैं पढ़ना चाहते हैं। आज न तो चार अख़बार ऐसे है जो सच्चे हैं और न हीं उनमें वह सच्चाई जिससे लोग डरें। आज कोई ऐसी तस्वीर नहीं है जिसको हजार शब्दों से समझाया जाए। बस यही कहूंगा कि अब बदलाव आना जरुरी है। क्योंकि अब वक्त ब्रेक का नहीं बदलाव का है।
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