डॉलर डे... हम कहां और तुम कहां
अमेरिका आज डॉलर डे मना रहा है। डॉलर का जन्म आज के ही दिन 8 अगस्त 1786 को हुआ था। आपको बता दे कि जब भारत आजाद हुआ था तब भारतीय मुद्रा और अमेरिकी डॉलर की वैल्यू बराबर थी। आजादी के बाद भारत की मुद्रा का दर गिरा और अमेरिका के मुद्रा का दाम बढ़ता गया आज की स्थिति में अमेरिका के एक डॉलर बराबर 61 भारतीय रुपए हो गया है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका के डॉलर हमारे लिए कितना महत्व रखता है।
आज के दिन अमेरिका में अवकाश रहता है। दुनिया का सबसे पसंदीदा मुद्रा डॉलर को माना जाता है। अमेरिका में आज नेशनल डॉलर डे मनाया जा रहा है। 8 अगस्त 1786 के दिन कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने अमेरिका मैद्रिक प्रणाली स्थापित की थी। साथ ही 76 साल बाद 1862 में एक डॉलर का पहला नोट छपा।
आप को बता दें कि डॉलर कॉटन और लिनन के 75:25 से बनता है। दुनिया में 100 अमेरिकी डॉलर सबसे अधिक पसंद किया जाता है। दुनिया भर में इसकी संख्या 9 अरब है। जो पुरे अमेरिकी डॉलर का 7 प्रतिशत है।
यह एक मात्र संयोग ही हैं कि अमेरिका और भारत के मुद्रा 1947 से पहले तक बराबर थे और जब से भारत आजाद हुआ उसकी मुद्रा की किमत घटती गई और आज अमेरिका का 1 डॉलर के बराबर हमारे यहां लोगों को एक दिन कमाने के लिए 8 घंटे कड़ी मेहनत करना पड़ता है। यहां तक कि .50 डॉलर से भी कम में भारत के लोगों के खर्च करने पर भारत सरकार उसे गरीब नहीं मानती। लोग भारत को विकासशील देश मानते है अगर यही विकास है और इसके लिए ही हम आज़ाद हुए थे तो इससे बेहतर हम कुछ और ही होते तो बेहतर था। आज भारत के अमीर लोग अमीर होते जा रहा है और गरीब इतना गरीब हो चुका है कि उसे खाने तक के लाले पड़े है। दिन भर में अगर कोई भर पेट खाना खा ले तो वह खरीब नहीं हो सकता। आज घटिया से घटिया होटल में 50 रुपये थाली खाना मिल रहा है। दिल्ली के एसी रुम में बैठे लोग न जाने किस होटल का खाना खाते हैं जो उन्हे 10 और 20 रुपये में खाना खिलाता है। अगर वे लोग अपने इस गोपनीय राज को खोल दें और आम लोगों का उस होटल में आने जाने की आजादी दे-दें तो पता चल जाए की हकिकत क्या है। पर ऐसा होगा नहीं क्योंकि ये लोग अमेरिका से 20 डॉलर के का खाना खाते हैं और उन्हें लगता है कि वे भारतीय 20 रुपल्ली का खाना खा रहें है।
सिर्फ गलती उन लोगों कि नहीं है हम भी उतना हीं जिम्मेदार है। हम उन्हें पिछले इतने सालों से पूज रहे है जो सिर्फ पत्थर है कभी उनसे भगवान तो कबके मर चुके है। अब लोगों को इस ओर ध्यान देना होगा अपने अंधविश्वास को तोड़ना होगा उन्हें यह जानना होगा कि जिन्हें वे भगवान समझकर पूज रहें हैं वे भगवान नहीं शैतान है शैतान तो उस दिन से उनकी भी सोच हमारे प्रति बदल जाएगी। सिर्फ भक्त नही शख्त भी बनने की जरुरत है। अगर ये लोग चाहते तो हमारे बेरोजगार इंजीनियर अमेरिका के नासा में काम नहीं करते बल्कि हमारे देश के रिसर्च सेंटर में होते और जो वे उपलब्धि वहां हांसिल कर रहे हैं यहां कि तरक्कि हो जाती।
आज के दिन अमेरिका में अवकाश रहता है। दुनिया का सबसे पसंदीदा मुद्रा डॉलर को माना जाता है। अमेरिका में आज नेशनल डॉलर डे मनाया जा रहा है। 8 अगस्त 1786 के दिन कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने अमेरिका मैद्रिक प्रणाली स्थापित की थी। साथ ही 76 साल बाद 1862 में एक डॉलर का पहला नोट छपा।
आप को बता दें कि डॉलर कॉटन और लिनन के 75:25 से बनता है। दुनिया में 100 अमेरिकी डॉलर सबसे अधिक पसंद किया जाता है। दुनिया भर में इसकी संख्या 9 अरब है। जो पुरे अमेरिकी डॉलर का 7 प्रतिशत है।
यह एक मात्र संयोग ही हैं कि अमेरिका और भारत के मुद्रा 1947 से पहले तक बराबर थे और जब से भारत आजाद हुआ उसकी मुद्रा की किमत घटती गई और आज अमेरिका का 1 डॉलर के बराबर हमारे यहां लोगों को एक दिन कमाने के लिए 8 घंटे कड़ी मेहनत करना पड़ता है। यहां तक कि .50 डॉलर से भी कम में भारत के लोगों के खर्च करने पर भारत सरकार उसे गरीब नहीं मानती। लोग भारत को विकासशील देश मानते है अगर यही विकास है और इसके लिए ही हम आज़ाद हुए थे तो इससे बेहतर हम कुछ और ही होते तो बेहतर था। आज भारत के अमीर लोग अमीर होते जा रहा है और गरीब इतना गरीब हो चुका है कि उसे खाने तक के लाले पड़े है। दिन भर में अगर कोई भर पेट खाना खा ले तो वह खरीब नहीं हो सकता। आज घटिया से घटिया होटल में 50 रुपये थाली खाना मिल रहा है। दिल्ली के एसी रुम में बैठे लोग न जाने किस होटल का खाना खाते हैं जो उन्हे 10 और 20 रुपये में खाना खिलाता है। अगर वे लोग अपने इस गोपनीय राज को खोल दें और आम लोगों का उस होटल में आने जाने की आजादी दे-दें तो पता चल जाए की हकिकत क्या है। पर ऐसा होगा नहीं क्योंकि ये लोग अमेरिका से 20 डॉलर के का खाना खाते हैं और उन्हें लगता है कि वे भारतीय 20 रुपल्ली का खाना खा रहें है।
सिर्फ गलती उन लोगों कि नहीं है हम भी उतना हीं जिम्मेदार है। हम उन्हें पिछले इतने सालों से पूज रहे है जो सिर्फ पत्थर है कभी उनसे भगवान तो कबके मर चुके है। अब लोगों को इस ओर ध्यान देना होगा अपने अंधविश्वास को तोड़ना होगा उन्हें यह जानना होगा कि जिन्हें वे भगवान समझकर पूज रहें हैं वे भगवान नहीं शैतान है शैतान तो उस दिन से उनकी भी सोच हमारे प्रति बदल जाएगी। सिर्फ भक्त नही शख्त भी बनने की जरुरत है। अगर ये लोग चाहते तो हमारे बेरोजगार इंजीनियर अमेरिका के नासा में काम नहीं करते बल्कि हमारे देश के रिसर्च सेंटर में होते और जो वे उपलब्धि वहां हांसिल कर रहे हैं यहां कि तरक्कि हो जाती।
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