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बातें अखबारों की

#बातेंअखबारोंकी आज बात अखबारों के कार्यालय की करते हैं। आप अखबारों में हमेशा लड़ाई, झगड़ा, मारपीट, लूट, डकैती, हत्या की खबरें पढ़ते होंगे। लेकिन क्या आपको पता है खबरों की हत्या हो जाती है? खबरें मर जाती है?  खबरों को जीवित करने और खबरों को मारने  का भी काम अखबार में होता है। इतना ही नहीं खबरें लड़ जाती हैं उन्हें लड़ने से रोकना होता है। जैसे दो व्यक्ति के बीच में लड़ाई होने पर तीसरा व्यक्ति, या पुलिस लड़ाई को रोकती है वैसे ही खबरें न लड़े इसके लिए भी अखबारों में आदमी होते हैं। आज इन्हीं तमाम बातों पर चर्चा करेंगे। खबरों से बात शुरू करते हैं। खासकर यहां कई ऐसी भी बातें होती हैं, जिन्हें जानकर आपको अखबारों के कार्यालय में अखबारी काम देखने का मन करेगा। आखिर कैसे काम करते हैं अखबार में खबर आने और छपने से लेकर आपके हाथ में पहुंचने तक क्या क्या किया जाता है तमाम सवालों के जवाब मिलेंगे। तो बढ़ते हैं खबरों की तरफ जिसपर भी चर्चा होनी चाहिए। कुछ अंदरूनी बातें आज यहां बता रहा हूं। यह अमूमन हर अखबार में होती है। अखबारों में हर दिन खबर होती ही है। आपका सवाल होगा आती कहां से हैं तो इस...

कश्मीर व्यथा कथा तीन किश्त- कनक तिवारी

लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा पहली किश्त (1)भारतीय नेताओं के कारण सियासत का घाव पक गया है और उसमें मवाद भी है। सियासत की हर सांप्रदायिक खखार के जरिए देश के माहौल में हिंसा का बलगम थूका जा रहा है। यह समय बहुत परेशानदिमागी और चुनौतियों के साथ नागरिक खतरे का भी हो रहा है। हर सच को जिबह कर उसे नारों के गर्भगृह में भ्रूण बना दिया जाता है। यदि किसी घटना, निर्णय या तर्क की तटस्थ, उर्वर, बौद्धिक और देशज जांच की जाए तो उस पर नासमझ समर्थकों द्वारा कायिक, बौद्धिक और मानसिक हमले कराए जाते हैं। इसके बावजूद देश है कि उसे रोशनी की तरफ चलना है। घटाटोप अंधेरा अब उसका नहीं है जिसका सूरज दिन के चौबीस घंटे संसार के किसी मुल्क के ऊपर इतराता रहता था। यह खतरा हिन्दुस्तानी खुद उगा रहे हैं। हर समझदार नागरिक और विशेषकर युवा पीढ़ी को अब सभी विचारधाराओं को दरकिनार करके केवल उस राष्ट्रीय फलसफाई पुस्तक संविधान की इबारत को इस तरह समझने की जरूरत है मानो वह दिए या टाॅर्च की रोशनी बल्कि जुगनू की जगमग तो मान ली जाए जिससे अंधेरा छंटे। जम्मू कश्मीर की सत्यनारायण की कथा का पाठ हर उस पार्टी और नेता की आलोचना भ...

भारत बैंक और हरिशंकत बागला व अन्य

भारत बैंक ऑफ इंडिया -  अपीलार्थीगण          बनाम भारत बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड के कर्मचारीगण - उत्तर्थीगण संदर्भ - A.I.R. 1950, S.C. 188. विषय - यह विवाद औध्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 7 एवं 15 पर आधारित है जो यह प्रतिपादित करता है कि ट्रिब्यूनल न्यायिक स्वरूप में कार्य करता है। यद्यपि व न्यायालय नहीं है। वाद के तथ्य - भारत बैंक लिमिटेड कंपनी की स्थापना कंपनी अधिनियम के अंतर्गत हुई थी। कंपनी के कर्मचारियों ने कंपनी के सम्मुख कुछ मांगे रखी, परंतु कंपनी ने अनसुनी कर दी। मांगे न मानी जाने पर कंनपी के कर्मचारियों ने दबाव डालने के लिए 9 मार्च 1949 ई. को काम करना बंद कर दिया। कंपनी ने अपने कर्मारियों के काम पर आने की सूचना दी, लेकिन वे काम पर वापस नहीं आए। परिणामस्वरूप कंपनी ने 19 मार्च तथा 24 मार्च के मध्य कुछ कर्मचारियों को सेवा-मुक्त कर दिया और यहीं से औद्योगिक विवाद शुरू हो गया। इस औद्योगिक विवाद का निपटारा करने के लिए केंद्रयी सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत तीन व्यक्तियों का ट्रिब्यूनल स्थापित कर दिया। ट्रिब्यूनल को कर्मचारियों क...

चुनाव में टैक्स के पैसे को बर्बाद और बच्चों को परेशान करते हैं अधिकारी

इन दिनों लोकसभा चुनाव की बयार चारों तरफ है। एक तरफ जहां नेता वोट के लिए गांव गांव गली गली कुत्ते की तरह भटक रहे हैं। वहीं जागरुकता अभियान और रैली के नाम पर दूसरी ओर प्रशासनिक अधिकारी क्रिकेट भी खोल रहे, साईकिल चला रहे और रैली भी निकाल रहे हैं। इन रैलियों साइकल चलाने और क्रिकेट में जनता के टैक्स के पैसे का तो दुरूपयोग किया ही जा रहा है, ये नन्हे बच्चों का कसूर नहीं समझ नहीं आ रहा जिसमें बच्चों का सहारा रैली में भीड़ बढ़ाने ले लिए लिया जा रहा है। जागरुकता के लिए क्या स्कूल के बच्चों का उपयोग किया जाना सही है? जिन बच्चों का उपयोग प्रशासनिक अधिकारी करते हैं वास्तव में वे बच्चे बस स्कूल टीचर के कहने से जाते हैं। उन्हें तो यह भी नहीं मालूम होता कि चुनाव और मतदान में होने वाला क्या है? और मतदान क्यों करना चाहिए? स्कूल के समय से देखता आ रहा हूं रैली करानी है तो स्कूल के बच्चों को बुला लो, मानव श्रृंखला बनानी है तो स्कूल के बच्चों को बुला लो, भीड़ बढ़ानी है स्कूलों से बच्चों को बुला लो। मने सबसे ज्यादा जागरुकता इन बच्चों में है, या इन्हें जागरुक किया जा रहा है समझ से परे है। मतदान की रैली में ...

ठगों से मिले हुए हैं बैंक अधिकारी, तभी तो नहीं पकड़े जाते ठग

दो बातें कहना चाहता हूं। पहला बंदर के हाथ में उस्तरा और दूसरा हर शाखा पर उल्लू बैठा है। यह लेख इसी पर आधारित है।             पहले विषय पर आता हूं। बंदर के हाथ में उस्तरा यहां मैं बंदर बैंक के उन तमाम ओहदेदारों को कह रहा हूं जो नोटबंदी के दौरान जमकर माल पीटे। उसके बाद ये माल पीटने के गुरू बन गये। संगठन बना लिया ताकि सरकार इनकी कलयी न खोल सके। सरकारों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया ताकि इनके यहां छापा न पड़े। इसके बाद भी कईयिओं के यहां छापा पड़ा और खूब माल भी मिला। यह नोटबंदी के दौरान मैनेजर से लेकर कैशियर यहां तक कि चपरासियों ने भी माल सोटा। ये वे लोग(बंदर) थे जिन्हें सरकार ने उस्तरा पकड़ा दी। उस्तरा मिलते ही ये लोग व्यापारियों और आम जनता को गंजा कर दिया। इससे भी जी नहीं भरा तो नाक कान भी काट लिया। आंखे निकाल ली। पूरी गाढ़ी कमाई को कालाधन बताते हुए अनाप-शनाप तरीके से बैंक में जमा कर लिया।                 दूसरी बात बैंक के हर शाखा में उल्लू बैठा मिलेगा। यहां लोग अपने मेहनत का पैसा जमा करने और निकालने आते हैं। यहां के हर...

वोट की वास्तविक कीमत क्या? शराब, पैसा या भविष्य

छत्तीसगढ़ में चुनाव नजदीक है। मतदान होने में अब कुछ दिन ही बाकी हैं। कई क्षेत्रों में नामांकन की प्रक्रिया हो चुकी है। कुछ क्षेत्रों में 26 से नामांकन होंगे। इस सब के बीच चुनाव आयोग लगातार लोगों को मतदान करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। क्योंकि हर एक वोट जरूरी होता... लेकिन यह एक वोट कितने का होता है। एक पवा शराब, दो बोटी मांस, दो पांच सौ रुपए, कंबल-चद्दर या भविष्य। वैसे हर एक वोट जरूरी होता है का दावा करने वाले चुनाव आयोग ने कभी यह नहीं तय किया कि जनता के बीच का प्रतिनिधि हो न राजनैतिक दल के बीच का। आज जो भी प्रतिनिधि चुनावी मैदान में है वे जन प्रतिनिधि न होकर पार्टी प्रतिनिधि है। यही कारण है कि जनता के प्रतिनिधि नहीं होने के कारण ये प्रतिनिधि पहले पार्टी से टिकट पाने के लिए करोड़ों रूपए खर्च करते हैं, और फिर वोट पाने के लिए मतदाताओं को लुभाते हैं। जीतने के बाद यही वजह है कि ये प्रतिनिधि वापस जनता के बीच नहीं आते क्योंकि उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने पूर्व में खर्च किए पैसे की भरपाई करनी होती है। वे कैसे पैसे की भरपाई होगी उसकी पूरी जुगत में लगे रहते हैं। विभागों के ठेके दिलाने, ट्रांसफ...

छत्तीसगढ़ की राजनीति में तीसरी शक्ति का झूठ

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इधर चुनाव से डेढ साल पहले ही कांग्रेस से अलग होकर  पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने नई पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जकांछ) का गठन कर लिया। इधर बहुजन सामाज पार्टी से गठबंधन कर लिए। उससे पहले उन्होंने वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के खिलाफ चुनने की घोषणा कर दी। लोगों ने उनकी बात को सच मान लिया। ऐसी ही एक घोषणा दो दिन पहले उन्होंने किया कहा अब चुनाव नहीं लड़ेंगे। फिर एक बयान आया कि चुनाव लड़ेंगे, लेकिन मरवाही से। फिर 24 अक्टूबर को राजनांदगांव से मुख्यमंत्री ने नामांकन दाखिल किया। उनके खिलाफ जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने एक पार्षद को मैदान में उतारा है। न यहां से खुद जोगी मैदान में आए और न ही उनके परिवार से कोई सदस्य। यह झूठ क्यों इसका मतलब तो आप समझ ही गए होंगे....

छत्तीसगढ़ में सरकार बनाना कठीन होगा

बहुत दिनों बाद लौटा हूं... मुद्दा गंभीर है... छत्तीसगढ़ से जुड़ा है। या यूं कहूं कि छत्तीसगढ़ सरकार से जुड़ा है। हाल ही में शिक्षाकर्मियों ने संविलियन के लिए आंदोलन किया। इससे भारत का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों की पढ़ाई कई दिनों तक प्रभावित होती रही। लगातार हड़ताल काम बंद और विरोध के साथ शिक्षाकर्मियों का बड़ा तबका होने  के कारण सरकान ने इनका संविलियन करने की घोषणा कर दिया। शिक्षाकर्मी शांत पड़े तो  मुद्दा उससे  भी गंभीर हो गया। इस बार पुलिस के लोग आंदोलन पर उतर आए। पुलिस वाले खुद तो आंदोलन में शामिल नहीं हुए, लेकिन उनके परिवार के लोग इस आंदोलन को आयोजित किए। बता दें कि छत्तीसगढ़ के कई जिले नक्सल प्रभावित हैं। ऐसे में पुलिस या उनके परिवार के आंदोलन पर जाने का मतलब है हमारी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हुई। दूसरे सरकार ने आदेश दिया पुलिस परिवार के लोगों को गिरफ्तार किया जाए। वहीं पुलिस कर्मी अपने ही परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार करने के लिए मोर्चा संभाले रखा। समझ सकते हैं जब किसी को कहा जाए कि अपने ही परिवार की कुर्बानी दे दो, लेकिन आपकी सैलरी नहीं बढ़ाएंगे, आपको पदोन्नत नहीं करेंगे, आ...

जागो मतदाता जागो अपनी कीमत पहचानो

वोटर और गधा एक नेता जी वोट मांगने के लिए एक बूढ़े आदमी के पास गए  और उनको 1000/- रुपये पकड़ाते हुए कहा, "बाबा जी, इस बार वोट मुझे दें।" बाबा जी ने कहा, बेटा मुझे पैसे नहीं चाहिए। वोट चाहिए तो एक गधा खरीद के ला दो! नेता को वोट चाहिए था, वो गधा ढूंढने निकला। मगर कहीं भी 20,000/- से कम क़ीमत पर कोई गधा नही मिला। तो वापस आकर बाबा जी से बोले, मुनासिब क़ीमत पर कोई गधा नहीं मिला। कम से कम 20,000/-  का एक गधा है। इसलिए मैं आपको गधा तो नहीं दे सकता। बाबा जी ने कहा,  "बेटा, वोट मांग कर शर्मिंदा ना करो!" "तुम्हारी नज़र में मेरी कीमत गधे से भी सस्ती हैं! जब गधा 20,000/- से कम में नही बिका तो मैं तो इंसान हूँ 1000/- में कैसे बिक सकता हूं ?  😄😄😄🤔🤔😇😇 जागो मतदाता जागो अपनी कीमत पहचानो ।

नकली और असली में अटककर रह गई तथाकथित मूणत की सीडी

कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ की राजनीति को उत्तेजीत करके रखने वाली सीडी मूणत के विषय से हटकर अब असली और नकली में अटककर रह गई है। अगर सीडी नकली है तो पत्रकार की गिरफ्तारी क्यों? और अगर असली है तो मंत्री पद पर रह गए और पत्रकार का शोषण करने जेल भेज दिया गया? सवाल कई है। पहला कि जिस दिन सीडी आई उसी दिन कुछ घंटे के भीतर छोटे जोगी ने उसे नकली करार दे दिया...जोगी सेना ने कांग्रेस पर हमला किया जबकि जोगी की पार्टी खुद को विपक्ष में होना बताती है। दूसरा खुद मूणत, भाजपा के प्रवक्ता और कई लोग सामने आकर सीडी में मूणत के खुद के नहीं होने की बात कह दी।  क्योंकि सीडी किसी के पास नहीं थी तो फिर इनके पास कहां से आई? सवाल इसलिए क्योंकि यह वीडियो क्लिप इनके पास थी तभी तो इन लोगों ने देखा होगा। जांच का विषय तो यह भी है कि इन्हें यह सीडी और क्लिप कहां से मिली। इन्हे क्लिप भेजा कौन? क्या वाकई में मुख्यमंत्री सीबीआई से जांच कराने वाले हैं... क्योंकि उससे पहले चैनल ने खुलासा क्यों किया? अगर पत्रकार विनोद वर्मा दोषी है तो पूरी अश्लिल फिल्म चलाने के कारण प्रसारण मंत्रालय को तो उस चैनल पर भी कार्रवाई करनी चाहिए।