भारत बैंक और हरिशंकत बागला व अन्य
भारत बैंक ऑफ इंडिया - अपीलार्थीगण
बनाम
भारत बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड के कर्मचारीगण - उत्तर्थीगण
संदर्भ - A.I.R. 1950, S.C. 188.
विषय - यह विवाद औध्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 7 एवं 15 पर आधारित है जो यह प्रतिपादित करता है कि ट्रिब्यूनल न्यायिक स्वरूप में कार्य करता है। यद्यपि व न्यायालय नहीं है।
वाद के तथ्य - भारत बैंक लिमिटेड कंपनी की स्थापना कंपनी अधिनियम के अंतर्गत हुई थी। कंपनी के कर्मचारियों ने कंपनी के सम्मुख कुछ मांगे रखी, परंतु कंपनी ने अनसुनी कर दी। मांगे न मानी जाने पर कंनपी के कर्मचारियों ने दबाव डालने के लिए 9 मार्च 1949 ई. को काम करना बंद कर दिया। कंपनी ने अपने कर्मारियों के काम पर आने की सूचना दी, लेकिन वे काम पर वापस नहीं आए। परिणामस्वरूप कंपनी ने 19 मार्च तथा 24 मार्च के मध्य कुछ कर्मचारियों को सेवा-मुक्त कर दिया और यहीं से औद्योगिक विवाद शुरू हो गया। इस औद्योगिक विवाद का निपटारा करने के लिए केंद्रयी सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत तीन व्यक्तियों का ट्रिब्यूनल स्थापित कर दिया। ट्रिब्यूनल को कर्मचारियों की छंटनी एवं बैंक के अद्याचारों का विवाद हल करना था।
ट्रिब्यूनल ने अपनीलार्थी बैंक और उत्तरार्थी कर्मचारियों के मामले को काफी समय तक सुना।
ट्रिब्यूनल - औद्योगिक ट्रिब्यूनल ने अपने पंचाट दिनांक 19 जनवरी, 1950 द्वारा तय किया कि 26 कर्मचारी गलत तरीके से निकाले गए थे, एवं उन्हें नौकरी पर वापस लिया जाए।
सर्वोच्च न्यायलय - इस पंचाट के विरुद्ध अपीलार्थी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील उच्चतम न्यायालय में दायर की।
उत्तरार्थी की ओर से प्रारंभिक एतराज अन्य एतराजों के अलावा अपील में किया गया। उनका कहना था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 जिसके अंतर्गत यह अपील दायर की गई है, अपने में उस अपील को निहित नहीं करता है, जोकि उस औद्योगिक ट्रिब्यूनल के पंचाट के खिलाफ हो जिसका निर्णय न्यायिक निर्णय नहीं है और जो न्यायिक शक्ति नहीं रखता हो। उत्तरार्थियों का कथन था कि औद्योगिक ट्रिब्यूनल एक प्रशासनिक गठन है, जो अर्थ- न्यायिक गठन के रूप में कार्य करत रहा है। और उच्चतम न्यायालय अपीलार्थी न्यायालय के रूप में जो शक्ति इस्तेमाल नहीं कर सकता है। उस औद्योगिक ट्रिब्यूनल के पंचाट के विरुद्ध जोकि वास्तव मे सरकार की प्रशासकीय मशीनरी है।
यह अपील माननीय मुख्य न्यायाधीश केनिया, न्यायाधीश फजल अली महाजन, बीके मखर्जी और पातंजलि शास्त्री द्वारा सुनी गई।
मुख्य न्यायाधीश केनिया - मुख्य न्यायाधीश का मत था कि औद्योगिक प्राधिकरण की शक्तियां एवं कार्य कलाप उस गठन के जोकि न्यायिक कार्य करता है, समतुल्य है तथापि वह न्यायालय नहं है। प्राधिकरण के द्वारा बनए गए नियमों में साक्ष्य की आवश्यकता होती है एवं साक्षियों को परीक्षित, प्रतिपरीक्षित एवं पुन: परीक्षित किया जाता है। जिस अधिनियम के अंतर्गत प्राधिकरण की संरचना की गई है वह यह भी आधिरोपित करता है कि गलत साक्ष्य देने पर साक्षी को दंडित किया जा सके फिर भी कुछ मामलों में यह सामान्य दीवानी न्यायालयों से भिन्न है। सभी बातों के गहन अध्ययन से यह साफ है कि प्राधिकरण सामान्य न्यायालय के समान ही कार्य संपन्न करने वाला गठन है तथापि वह तकनीकी शब्दों में न्यायालय नहीं है।
दूसरा प्रश्न जोकि मुख्य न्यायाधीश के मस्तिष्क में आया, वह यह था कि क्या इस न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उक्त गठन के पंचाट के विरुद्ध अपील को स्वीकार करने का अधिकार है? यह विवादग्रस्त नहीं है कि इन न्यायालय को उत्प्रेषण एवं प्रतिषेधात्मक याचिकाएं जारी करने का अधिकार है। सिर्फ प्रश्न यह है कि क्या अपील का अधिकार है? मुख्य न्यायाधीश के मतानुसार न्यायालय को अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील सुनने का अधिकार है, परंतु न्यायालय को ऐसी अपील सुनने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।
सभी बातों पर विचार करने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने अपील मय खर्चे के खारिज कर दी। उनके मतानुसार गुणावगुण पर कोई बात ऐसी नहीं है जिस पर अपील को स्वीकार किया जाए। दुखित पक्ष अन्य समतुल्य कार्यवाही द्वारा अनुतोष पा सकते हैं।
न्यायाधीश फजल अली - न्यायाधीश अली भी इस मत के थे कि प्राधिकरण के किसी भी आदेश या निर्णय पर जो किसी भी विषय में हो उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है, लेकिन उनके अनुसार अपील के गुणावगुण कोई ऐसी बात नहीं थी कि अपील सुनने के लिए स्वीकार किया जाए। अतः अपील में खर्चे के खारिज होने योग्य है।
न्यायाधीश महाजन - माननीय न्यायाधीश ने इस मामले की काफी चर्चा की एवं वह भी सहमत थे कि उच्चतम न्यायालय में अपील हो सकती है। अपील के गुणावगुण पर उन्होंने प्राधिकरण के निर्णय को गलत बताया और प्राधिकरण को आदेशित किया जोकि तब ही कार्यरत था कि वह संदर्भ के आइटम नंबर 18 को फिर से तय करें एवं तभी अपने पंचाट को सरकार के सम्मुख प्रस्तुत करें। उन्होंने खर्चे के संबंध में किसी भी पक्ष के लिए कोई आदेश नहीं दिया एवं उपरोक्त सीमा तक अपील को स्वीकार किया।
न्यायाधीश बीके मुखर्जी - माननीय न्यायाधीश का मत था कि प्राधिकरण के किसी आदेश के विरुद्ध अपील इस न्यायालय में चलने योग्य नहीं है, फिर भी यह मानते हुए कि अपील हो सकती है या इस न्यायालय को अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील सुनने का अधिकार है, यह सही विवाद नहीं था जिसमें कि यह न्यायालय हस्तक्षेप करे। न्यायाधीश ने प्राथमिक एतराज को स्वीकार किया और अपील मय खर्चे के खारिज की।
न्यायाधीश पातंजलि - माननीय न्यायाधीश न्यायाधीश मुखर्जी के निर्णय से पूर्णरूपेण सहमति व्यक्त की।
निर्णय- बहुमत के निर्णय के अनुसार अपील मय खर्चे के खारिज की गई।
अपील अस्वीकार की गयी।
प्रतिपादित विधि के सिद्धांत
1. औद्योगिक प्राधिकरण जोकि अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत गठित किया गया है न्यायालय के समान ही है। यह तथ्य कि सरकार को धारा 15 (2) के अनुरूप घोषणा करनी होती है, प्राधिकरण के निर्णय के बाद किसी भी रूप में उस मतानुसार प्राधिकरण न्यायिक रूप से कार्य करता है, प्रतिकूल नहीं है।
2. औद्योगिक प्राधिकरण के आधार एवं कर्तव्य करीब-करीब न्यायालय के समान है जोकि न्यायिक कार्य करता है फिर भी न्यायालय नहीं है, प्राधिकरण यद्यपि न्यायिक कार्य करता है फिर भी विशुद्ध न्यायालय नहीं है।
3. संविधान के अनुच्छेद 136 में कुछ शब्द काफी महत्व के हैं अनुच्छेद के क्षेत्र को बढ़ाते हैं। वे यह दर्शाते हैं कि प्राधिकरण के किसी भी आदेश एवं निर्णय के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है.
4. मुख्य न्यायाधीश केनिया के अनुसार उच्चतम न्यायालय प्राधिकरण के किसी भी निर्णय या आदेश के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार रखता है तथापि इस अधिकार को किन्ही खास मामलों में प्रयोग करना चाहिए।
5. न्यायाधीश महाजन के अनुसार बिरले एवं अपवादस्वरूप मामलों में ही यह अधिकार का खास सिद्धांतों पर स्वीकार करना चाहिए।
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हरिशंकर बागला व अन्य
बनाम
मध्य प्रदेश राज्य
संदर्भ - A.I.R. 1954, S.C. 465.
विषय - इस मामले में Cotton Textiles (control of movement) order, 1948 के खंड 3 व 4 तथा Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 व 4 एव 6 व 7 की व्याख्या की गई है। तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) (f) व (g) द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार के संदर्भ में Cotton Textiles (control of movement) order, 1948 के खंड 3 की वैधानिकता पर प्रकाश डाला गया है।
वाद के तथ्य - अपीलकर्ता हरिशंकर बागला एवं उनकी पत्नी श्रीमती गोमती बागला मुंबई से कानपुर के लिए करीब 6 मन नया सूती कपड़ा लेकर जा रहे थे परंतु उनके पास इसे ले जाने का अपेक्षित परमिट नहीं था, इसलिए उन्हें इटारसी रेलवे स्टेशन पर रेलवे पुलिस द्वारा Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 7 सहपठित Cotton Textiles (control of movement) order, 1948 के खंड 3 के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया। काफी उलट- फेर के बाद चालान पास किया गया तथा मामला न्यायालय में भेज दिया गया, परंतु मामले को उच्च न्यायालय ने सुनवाई हेतु अपने पास मंगा लिया क्योंकि उसमें कुछ विधि संबंधित प्रश्न निहित थे।
उच्च न्यायालय - उच्च न्यायालय ने इस मामले को सुनने के उपरांत अवधारित किया कि Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 व 4 असंवैधानिक हैं। उच्च न्यायालय ने इस अधिनियम की धारा 6 को भी रेलवे अधिनियम से असंगत अवधारित किया परंतु यह भी कहा कि इसकी असंगतता का कोई भी प्रभाव इस वाद के अभियोजन पर नहीं पड़ेगा। अत: उच्च न्यायालय ने निर्देशित किया कि अभियोजन पक्ष विधि के अनुसार परीक्षण न्यायालय में कार्यवाही करेगा तथा मामले के अभिलेखों को परीक्षण न्यायालय के लिए भेज दिया। उच्च न्यायलय ने अपीलार्थीगण एवं उत्तरदाता दोनों को ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 132 एवं 134 के अंतर्गत प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए।
उच्चतम न्यायालय - उच्च न्यायालय द्वारा प्रदान किए गए प्रमाण पत्रों के आधार पर अपीलकर्ता ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष विद्वान अधिवक्ता श्री उमरीगर के माध्यम से अपील प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु उठाएं-
1. यह कि Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 व 4 तथा Cotton Cloth Control Order का खंड (3) भारतीय संविधान द्वारा अनुच्छेद 19(1) (f) व (g) के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकार का हनन करता है।
2. यह कि Cotton cloth control orders के अंतर्गत textile Commissioner को परमिट देने का इंकार करने की अनियंत्रित एवं निरंकुश विवेकाधिकार की शक्ति प्रदान की गई है।
3. यह कि Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 के अंतर्गत स्वीकार्य सीमा से बाहर विधायन की शक्तियों को प्रत्यायोजित कर दिया गया है।
4. यह कि cloth control orders के प्रावधान भारतीय रेल अधिनियम की धाराओं, 27, 28 एव 41 के विरोधी हैं, इसलिए वे गैर-कानूनी हैं।
5. यह कि चूंकि उच्च न्यायालय द्वारा धारा 6 को असंगत एवं अविधिमान्य घोषित कर दिया गया है, इसलिए इसके प्रभाव से धारा 3 भी अविधिमान्य एवं गैर-कानूनी घोषित की जाए।
उच्चतम न्यायालय ने प्रथम प्रश्न के संबंध में विचार व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (f) व (g) भारत के नागरिकों को अपनी संपत्ति के अंतरण एवं व्यापार करने का अधिकार देता है। परमिट प्राप्त करने की अपेक्षा यद्यपि व्यापार पर कुछ प्रतिबंध अवश्य लगाती है, लेकिन सूती वस्त्र एवं इसी प्रकार की अन्य आवश्यक वस्तुओं पर आपत्तिकाल में इसके उत्पादन, आपूर्ति एवं वितरण पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक था इसी कारण Essential Supplies ( Temporary Powers) Act पारित किया गया जिसमें केंद्र सरकार को आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति एव वितरण को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर आदेश पारित करने के लिए अधिकृत किया गया है। cotton cloth control order का खंड 3 किसी नागरिक को व्यापार करने या संपत्ति अंतरित करने से वंचित नहीं करता है, बल्कि इसके द्वारा व्यापारी को टेक्सटाइल आयुक्त से एक परमिट प्राप्त करने की अपेक्षा की गई है। इस प्रतिबंध को अनुच्छेद 19 (1) (f) व (g) के परिपेक्ष में अनुचित नहीं माना जा सकता है। अतः उच्चतम न्यायालय ने इस संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा निकाले गए निष्कर्ष को उचित ठहराया।
द्वितीय प्रश्न के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा आधारित किया गया कि चूंकि अपीलकर्तागण ने न कोई परमिट प्राप्त ही किया है और न उसे प्राप्त करने के लिए उनके द्वारा कोई आवेदन पत्र ही दिया गया इसलिए प्रथम तो उन्हें इस प्रश्न को उठाने का अधिकार ही नहीं है। यदि उन्होंने परमिट लेने के लिए प्रयत्न किया होता तथा आयुक्त द्वारा उनके आवेदन पत्र को निरंकुशतापूर्वक एवं अनियंत्रित तरीके से अस्वीकार कर दिया जाता तो उन्हें इस संबंध में कुछ कहने का हक था तथा वे तब इस कानून को चुनौती दे सकते थे कि कमिश्नर द्वारा किए गए किसी भी कार्य से उनकी कोई हानि याहकतलफी हुई है। इस संबंध में अपीलकर्ता की ओर से यह भी कहा गया है कि जिस प्रकार इस न्यायालय ने द्वारिका प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर 1954 एस सी 224 (ए) यूपी coal control order की धारा 4(3) को अवधिमान्य घोषित किया था, उसी प्रकार कंट्रोल ऑर्डर की धारा 3 को भी अमान्य घोषित कर दें। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया कि द्वारिका प्रसाद के मामले के तथ्य इस मामले के तथ्य से मेल नहीं खाते हैं इसलिए अपीलकर्ता के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता ।
Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 के अंतर्गत स्वीकार्य सीमाओं से बाहर जाकर किए गए विधाई शक्तियों के प्रत्यायोजन एवं धारा 4 के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा शक्तियों के प्रत्यायोजन के तृतीय प्रश्न के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा अवधारित किया गया कि इस संबंध में भारत का संविधान एवं दिल्ली विधि अधिनियम, 1972 आदि के मामले एआईआर 1951 में इस न्यायालय द्वारा बहुमत से निर्णीत किया जा चुका है कि विधायिका आवश्यक शक्तियों को प्रत्यायोजित कर सकती है। चूंकि इस तर्क के संबंध में अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने अत्यधिक गंभीर रूप भी नहीं अपनाया इसलिए उच्चतम न्यायालय ने भी इस बिंदु पर विस्तार में जाना उचित नहीं समझा। इस प्रकार धारा 4 के अंतर्गत केंद्र सरकार अपनी शक्तियों को धारा 3 के अंतर्गत आते पारित करने के लिए प्रत्यायोजित कर सकती है। धारा 4 ऐसे अधिकारियों को वर्णित करती है जिन्हें शक्तियों का प्रत्यायोजन किया जा सकता है। अतः इस स्थिति में धारा 4 को भी अविधिमान्य घोषित नहीं किया जा सकता है।
चौथे प्रशन के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा मत व्यक्त किया गया कि control order की धारा 3 व 4 भारतीय रेलवे अधिनियम की धाराओं 27, 28 एव 41 की विरोधी नहीं है। धारा 3 व 4 रेलवे अधिनियम की धाराओं को अतिष्ठित नहीं करती है और न ही रेलवे प्रशासन को किसी अयोग्यता से ही ग्रसित करती है। Control order की धारा 3 में एक परमिट प्राप्त करने की अपेक्षा की गई है जिसे कमिश्नर धारा 4 के अंतर्गत प्रदान करता है। इन दोनों धाराओं का कोई भी प्रत्यक्ष संबंध रेलवे अधिनियम की धाराओं 27, 28 या 41 से नहीं है।
अंतिम प्रशन धारा 6 को उच्च न्यायालय द्वारा अविधिमान्य घोषित करने के संबंध में है, जिसके संबंध में अपिलकर्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि धारा 3 भी धारा 6 से मिश्रित है इस कारण से इसे भी अविधिमान्य घोषित किया जाना चाहिए। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा अवधारित किया गया कि धारा 6 कि व्याख्या करने कमें उच्च न्यायलय ने भूल की है। धारा 6 न तो प्रत्यक्ष रूप से और न विवक्षित रूप से किसी पहल से अस्थित्व वाली विधि को निरसित करती है और न उन्हे हटाती है। जहां तक statute book पर है। धारा 6 का तात्पर्य उस कानू के प्रावधानं कनिरसित करना या हटाना नहीं है, बल्कि जहां तक उन अधिनियमों के प्रावधान Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 के प्रावधानों से असंगत है, तो उस सीमा तक उन्हें सामान्य रूप से बाई पास करना है। दूसरे शब्दों में इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं, कि यदि किसी आवश्यक वस्तु के संबंध में तत्समय प्रवर्त किसी अन्य अधिनियम के अंतर्गत पारित किए गए एवं धारा 3 के अंतर्गत पारित किए गए आदेश में कोई असंगति है तो उस वस्तुओं के संबंध में उस सीमा तक उस विधि के अंतर्गत पारित किए गए आदेश लागू नहीं होंगे। कतिपय विधियों को बाई पास करना निश्चित रूप से निरसन के अंतर्गत या हटाने के अंतर्गत नहीं आता है। वह विधि अनिरसित रहती है, परंतु धारा 3 के अंतर्गत पारित किए गए किसी आदेश के लागू रहने तक वह प्रभाव में नहीं रहती है।
उच्चतम न्यायलय द्वारा इस संबंध में आगे विचार व्यक्त करते हुए कहा गया कि यदि हम तर्क हेतु यह मान भी ले कि धारा 3 के अंतर्गत एव किसी वर्तमान विधि के प्रावधानों के अंतर्गत पारित किए गए आदेशों में असंगततता के संबंध में असंगतता की सीमा तक वरत्मान विधि के प्रावधान विवक्षित रूप से निरसित माने जाएंगें, परंतु यह कारय कोई ऐसा कार्य नहीं है जोकि किसी प्रत्यायोजक द्वारा किया गया हो, बल्कि यह कार्य संसद ने स्वय के कार्य द्वारा किया है। धारा 6 को अधिनियमित करके संसद ने स्वयं ही यह घोषित कर दिया है कि धारा 3 के अंदर्गत पारित किया गया आदेश इसअधिनियम के अलावा किसी अन्य विधि के अंदर्गत पारित किए गए आदेश में किसी असंगतता के होने के बावजूद भी प्रभाव में रहेगा। इस प्रकार की घोषणा किसी प्रत्यायोजक द्वारा नहीं की गई है, बल्कि विधायिका ने धारा 6 के माध्यम से अपना यह आशय व्यक्त किया है। प्त्यायोजक की शक्ति केवल धारा 3 के अंतर्गत आदेश पारित करने की है तथा धारा 6 बाद में आती है। यदि विधायिका का किसी विधि को निरसित करने या हटाने का होता तो वह स्पष्ट रूप से ऐसा कर सकतीथी। अत: उच्चतम न्यायलय द्वार अवधारित किया गया है कि धार 6 के अंदर्ग किया गया कोई भी कार्य प्रत्यायोजक का नहीं है। इसलिए इस आधार पर इसे असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता है।
अत: उच्चतम न्यायलय द्वारा अवधारित किया गया कि Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धाराएं 3, 4 एव 6 संवैधानिक हैं तथा उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश भी संवैधानिक है। अपील अस्वीकार की गई तथा परीक्षण न्यायालय के विधि के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया।
प्रतिपादित विधि के सिद्धांत -
1. किसी विधि के किन्हीं प्रावधानों को किसी समय बाई-पास करने का तात्पर्य निश्चित रूप से उसे विवक्षित: निरसित करना या हटाना नहीं माना जा सकता है।
2. किसी व्यापार के संबंध में किसी परमिट को प्राप्त करना मात्र अनुच्छेद 19 (1)(f) व (g) में मिले मूल अधिकार का हनन नहीं माना जा सकता है।
3. Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धाराएं 3, 4 एवं 6 पूर्ण रूप से संवैधानिक हैं। वे रेलवे अधिनियम की धाराओं 27, 28 एवं 41 की प्रतिपूर्ति करती हैं, तथा इन दोनों में कोई संघर्ष नहीं है।
बनाम
भारत बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड के कर्मचारीगण - उत्तर्थीगण
संदर्भ - A.I.R. 1950, S.C. 188.
विषय - यह विवाद औध्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 7 एवं 15 पर आधारित है जो यह प्रतिपादित करता है कि ट्रिब्यूनल न्यायिक स्वरूप में कार्य करता है। यद्यपि व न्यायालय नहीं है।
वाद के तथ्य - भारत बैंक लिमिटेड कंपनी की स्थापना कंपनी अधिनियम के अंतर्गत हुई थी। कंपनी के कर्मचारियों ने कंपनी के सम्मुख कुछ मांगे रखी, परंतु कंपनी ने अनसुनी कर दी। मांगे न मानी जाने पर कंनपी के कर्मचारियों ने दबाव डालने के लिए 9 मार्च 1949 ई. को काम करना बंद कर दिया। कंपनी ने अपने कर्मारियों के काम पर आने की सूचना दी, लेकिन वे काम पर वापस नहीं आए। परिणामस्वरूप कंपनी ने 19 मार्च तथा 24 मार्च के मध्य कुछ कर्मचारियों को सेवा-मुक्त कर दिया और यहीं से औद्योगिक विवाद शुरू हो गया। इस औद्योगिक विवाद का निपटारा करने के लिए केंद्रयी सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत तीन व्यक्तियों का ट्रिब्यूनल स्थापित कर दिया। ट्रिब्यूनल को कर्मचारियों की छंटनी एवं बैंक के अद्याचारों का विवाद हल करना था।
ट्रिब्यूनल ने अपनीलार्थी बैंक और उत्तरार्थी कर्मचारियों के मामले को काफी समय तक सुना।
ट्रिब्यूनल - औद्योगिक ट्रिब्यूनल ने अपने पंचाट दिनांक 19 जनवरी, 1950 द्वारा तय किया कि 26 कर्मचारी गलत तरीके से निकाले गए थे, एवं उन्हें नौकरी पर वापस लिया जाए।
सर्वोच्च न्यायलय - इस पंचाट के विरुद्ध अपीलार्थी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील उच्चतम न्यायालय में दायर की।
उत्तरार्थी की ओर से प्रारंभिक एतराज अन्य एतराजों के अलावा अपील में किया गया। उनका कहना था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 जिसके अंतर्गत यह अपील दायर की गई है, अपने में उस अपील को निहित नहीं करता है, जोकि उस औद्योगिक ट्रिब्यूनल के पंचाट के खिलाफ हो जिसका निर्णय न्यायिक निर्णय नहीं है और जो न्यायिक शक्ति नहीं रखता हो। उत्तरार्थियों का कथन था कि औद्योगिक ट्रिब्यूनल एक प्रशासनिक गठन है, जो अर्थ- न्यायिक गठन के रूप में कार्य करत रहा है। और उच्चतम न्यायालय अपीलार्थी न्यायालय के रूप में जो शक्ति इस्तेमाल नहीं कर सकता है। उस औद्योगिक ट्रिब्यूनल के पंचाट के विरुद्ध जोकि वास्तव मे सरकार की प्रशासकीय मशीनरी है।
यह अपील माननीय मुख्य न्यायाधीश केनिया, न्यायाधीश फजल अली महाजन, बीके मखर्जी और पातंजलि शास्त्री द्वारा सुनी गई।
मुख्य न्यायाधीश केनिया - मुख्य न्यायाधीश का मत था कि औद्योगिक प्राधिकरण की शक्तियां एवं कार्य कलाप उस गठन के जोकि न्यायिक कार्य करता है, समतुल्य है तथापि वह न्यायालय नहं है। प्राधिकरण के द्वारा बनए गए नियमों में साक्ष्य की आवश्यकता होती है एवं साक्षियों को परीक्षित, प्रतिपरीक्षित एवं पुन: परीक्षित किया जाता है। जिस अधिनियम के अंतर्गत प्राधिकरण की संरचना की गई है वह यह भी आधिरोपित करता है कि गलत साक्ष्य देने पर साक्षी को दंडित किया जा सके फिर भी कुछ मामलों में यह सामान्य दीवानी न्यायालयों से भिन्न है। सभी बातों के गहन अध्ययन से यह साफ है कि प्राधिकरण सामान्य न्यायालय के समान ही कार्य संपन्न करने वाला गठन है तथापि वह तकनीकी शब्दों में न्यायालय नहीं है।
दूसरा प्रश्न जोकि मुख्य न्यायाधीश के मस्तिष्क में आया, वह यह था कि क्या इस न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उक्त गठन के पंचाट के विरुद्ध अपील को स्वीकार करने का अधिकार है? यह विवादग्रस्त नहीं है कि इन न्यायालय को उत्प्रेषण एवं प्रतिषेधात्मक याचिकाएं जारी करने का अधिकार है। सिर्फ प्रश्न यह है कि क्या अपील का अधिकार है? मुख्य न्यायाधीश के मतानुसार न्यायालय को अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील सुनने का अधिकार है, परंतु न्यायालय को ऐसी अपील सुनने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।
सभी बातों पर विचार करने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने अपील मय खर्चे के खारिज कर दी। उनके मतानुसार गुणावगुण पर कोई बात ऐसी नहीं है जिस पर अपील को स्वीकार किया जाए। दुखित पक्ष अन्य समतुल्य कार्यवाही द्वारा अनुतोष पा सकते हैं।
न्यायाधीश फजल अली - न्यायाधीश अली भी इस मत के थे कि प्राधिकरण के किसी भी आदेश या निर्णय पर जो किसी भी विषय में हो उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है, लेकिन उनके अनुसार अपील के गुणावगुण कोई ऐसी बात नहीं थी कि अपील सुनने के लिए स्वीकार किया जाए। अतः अपील में खर्चे के खारिज होने योग्य है।
न्यायाधीश महाजन - माननीय न्यायाधीश ने इस मामले की काफी चर्चा की एवं वह भी सहमत थे कि उच्चतम न्यायालय में अपील हो सकती है। अपील के गुणावगुण पर उन्होंने प्राधिकरण के निर्णय को गलत बताया और प्राधिकरण को आदेशित किया जोकि तब ही कार्यरत था कि वह संदर्भ के आइटम नंबर 18 को फिर से तय करें एवं तभी अपने पंचाट को सरकार के सम्मुख प्रस्तुत करें। उन्होंने खर्चे के संबंध में किसी भी पक्ष के लिए कोई आदेश नहीं दिया एवं उपरोक्त सीमा तक अपील को स्वीकार किया।
न्यायाधीश बीके मुखर्जी - माननीय न्यायाधीश का मत था कि प्राधिकरण के किसी आदेश के विरुद्ध अपील इस न्यायालय में चलने योग्य नहीं है, फिर भी यह मानते हुए कि अपील हो सकती है या इस न्यायालय को अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील सुनने का अधिकार है, यह सही विवाद नहीं था जिसमें कि यह न्यायालय हस्तक्षेप करे। न्यायाधीश ने प्राथमिक एतराज को स्वीकार किया और अपील मय खर्चे के खारिज की।
न्यायाधीश पातंजलि - माननीय न्यायाधीश न्यायाधीश मुखर्जी के निर्णय से पूर्णरूपेण सहमति व्यक्त की।
निर्णय- बहुमत के निर्णय के अनुसार अपील मय खर्चे के खारिज की गई।
अपील अस्वीकार की गयी।
प्रतिपादित विधि के सिद्धांत
1. औद्योगिक प्राधिकरण जोकि अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत गठित किया गया है न्यायालय के समान ही है। यह तथ्य कि सरकार को धारा 15 (2) के अनुरूप घोषणा करनी होती है, प्राधिकरण के निर्णय के बाद किसी भी रूप में उस मतानुसार प्राधिकरण न्यायिक रूप से कार्य करता है, प्रतिकूल नहीं है।
2. औद्योगिक प्राधिकरण के आधार एवं कर्तव्य करीब-करीब न्यायालय के समान है जोकि न्यायिक कार्य करता है फिर भी न्यायालय नहीं है, प्राधिकरण यद्यपि न्यायिक कार्य करता है फिर भी विशुद्ध न्यायालय नहीं है।
3. संविधान के अनुच्छेद 136 में कुछ शब्द काफी महत्व के हैं अनुच्छेद के क्षेत्र को बढ़ाते हैं। वे यह दर्शाते हैं कि प्राधिकरण के किसी भी आदेश एवं निर्णय के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है.
4. मुख्य न्यायाधीश केनिया के अनुसार उच्चतम न्यायालय प्राधिकरण के किसी भी निर्णय या आदेश के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार रखता है तथापि इस अधिकार को किन्ही खास मामलों में प्रयोग करना चाहिए।
5. न्यायाधीश महाजन के अनुसार बिरले एवं अपवादस्वरूप मामलों में ही यह अधिकार का खास सिद्धांतों पर स्वीकार करना चाहिए।
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हरिशंकर बागला व अन्य
बनाम
मध्य प्रदेश राज्य
संदर्भ - A.I.R. 1954, S.C. 465.
विषय - इस मामले में Cotton Textiles (control of movement) order, 1948 के खंड 3 व 4 तथा Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 व 4 एव 6 व 7 की व्याख्या की गई है। तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) (f) व (g) द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार के संदर्भ में Cotton Textiles (control of movement) order, 1948 के खंड 3 की वैधानिकता पर प्रकाश डाला गया है।
वाद के तथ्य - अपीलकर्ता हरिशंकर बागला एवं उनकी पत्नी श्रीमती गोमती बागला मुंबई से कानपुर के लिए करीब 6 मन नया सूती कपड़ा लेकर जा रहे थे परंतु उनके पास इसे ले जाने का अपेक्षित परमिट नहीं था, इसलिए उन्हें इटारसी रेलवे स्टेशन पर रेलवे पुलिस द्वारा Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 7 सहपठित Cotton Textiles (control of movement) order, 1948 के खंड 3 के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया। काफी उलट- फेर के बाद चालान पास किया गया तथा मामला न्यायालय में भेज दिया गया, परंतु मामले को उच्च न्यायालय ने सुनवाई हेतु अपने पास मंगा लिया क्योंकि उसमें कुछ विधि संबंधित प्रश्न निहित थे।
उच्च न्यायालय - उच्च न्यायालय ने इस मामले को सुनने के उपरांत अवधारित किया कि Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 व 4 असंवैधानिक हैं। उच्च न्यायालय ने इस अधिनियम की धारा 6 को भी रेलवे अधिनियम से असंगत अवधारित किया परंतु यह भी कहा कि इसकी असंगतता का कोई भी प्रभाव इस वाद के अभियोजन पर नहीं पड़ेगा। अत: उच्च न्यायालय ने निर्देशित किया कि अभियोजन पक्ष विधि के अनुसार परीक्षण न्यायालय में कार्यवाही करेगा तथा मामले के अभिलेखों को परीक्षण न्यायालय के लिए भेज दिया। उच्च न्यायलय ने अपीलार्थीगण एवं उत्तरदाता दोनों को ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 132 एवं 134 के अंतर्गत प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए।
उच्चतम न्यायालय - उच्च न्यायालय द्वारा प्रदान किए गए प्रमाण पत्रों के आधार पर अपीलकर्ता ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष विद्वान अधिवक्ता श्री उमरीगर के माध्यम से अपील प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु उठाएं-
1. यह कि Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 व 4 तथा Cotton Cloth Control Order का खंड (3) भारतीय संविधान द्वारा अनुच्छेद 19(1) (f) व (g) के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकार का हनन करता है।
2. यह कि Cotton cloth control orders के अंतर्गत textile Commissioner को परमिट देने का इंकार करने की अनियंत्रित एवं निरंकुश विवेकाधिकार की शक्ति प्रदान की गई है।
3. यह कि Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 के अंतर्गत स्वीकार्य सीमा से बाहर विधायन की शक्तियों को प्रत्यायोजित कर दिया गया है।
4. यह कि cloth control orders के प्रावधान भारतीय रेल अधिनियम की धाराओं, 27, 28 एव 41 के विरोधी हैं, इसलिए वे गैर-कानूनी हैं।
5. यह कि चूंकि उच्च न्यायालय द्वारा धारा 6 को असंगत एवं अविधिमान्य घोषित कर दिया गया है, इसलिए इसके प्रभाव से धारा 3 भी अविधिमान्य एवं गैर-कानूनी घोषित की जाए।
उच्चतम न्यायालय ने प्रथम प्रश्न के संबंध में विचार व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (f) व (g) भारत के नागरिकों को अपनी संपत्ति के अंतरण एवं व्यापार करने का अधिकार देता है। परमिट प्राप्त करने की अपेक्षा यद्यपि व्यापार पर कुछ प्रतिबंध अवश्य लगाती है, लेकिन सूती वस्त्र एवं इसी प्रकार की अन्य आवश्यक वस्तुओं पर आपत्तिकाल में इसके उत्पादन, आपूर्ति एवं वितरण पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक था इसी कारण Essential Supplies ( Temporary Powers) Act पारित किया गया जिसमें केंद्र सरकार को आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति एव वितरण को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर आदेश पारित करने के लिए अधिकृत किया गया है। cotton cloth control order का खंड 3 किसी नागरिक को व्यापार करने या संपत्ति अंतरित करने से वंचित नहीं करता है, बल्कि इसके द्वारा व्यापारी को टेक्सटाइल आयुक्त से एक परमिट प्राप्त करने की अपेक्षा की गई है। इस प्रतिबंध को अनुच्छेद 19 (1) (f) व (g) के परिपेक्ष में अनुचित नहीं माना जा सकता है। अतः उच्चतम न्यायालय ने इस संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा निकाले गए निष्कर्ष को उचित ठहराया।
द्वितीय प्रश्न के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा आधारित किया गया कि चूंकि अपीलकर्तागण ने न कोई परमिट प्राप्त ही किया है और न उसे प्राप्त करने के लिए उनके द्वारा कोई आवेदन पत्र ही दिया गया इसलिए प्रथम तो उन्हें इस प्रश्न को उठाने का अधिकार ही नहीं है। यदि उन्होंने परमिट लेने के लिए प्रयत्न किया होता तथा आयुक्त द्वारा उनके आवेदन पत्र को निरंकुशतापूर्वक एवं अनियंत्रित तरीके से अस्वीकार कर दिया जाता तो उन्हें इस संबंध में कुछ कहने का हक था तथा वे तब इस कानून को चुनौती दे सकते थे कि कमिश्नर द्वारा किए गए किसी भी कार्य से उनकी कोई हानि याहकतलफी हुई है। इस संबंध में अपीलकर्ता की ओर से यह भी कहा गया है कि जिस प्रकार इस न्यायालय ने द्वारिका प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर 1954 एस सी 224 (ए) यूपी coal control order की धारा 4(3) को अवधिमान्य घोषित किया था, उसी प्रकार कंट्रोल ऑर्डर की धारा 3 को भी अमान्य घोषित कर दें। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया कि द्वारिका प्रसाद के मामले के तथ्य इस मामले के तथ्य से मेल नहीं खाते हैं इसलिए अपीलकर्ता के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता ।
Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धारा 3 के अंतर्गत स्वीकार्य सीमाओं से बाहर जाकर किए गए विधाई शक्तियों के प्रत्यायोजन एवं धारा 4 के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा शक्तियों के प्रत्यायोजन के तृतीय प्रश्न के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा अवधारित किया गया कि इस संबंध में भारत का संविधान एवं दिल्ली विधि अधिनियम, 1972 आदि के मामले एआईआर 1951 में इस न्यायालय द्वारा बहुमत से निर्णीत किया जा चुका है कि विधायिका आवश्यक शक्तियों को प्रत्यायोजित कर सकती है। चूंकि इस तर्क के संबंध में अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने अत्यधिक गंभीर रूप भी नहीं अपनाया इसलिए उच्चतम न्यायालय ने भी इस बिंदु पर विस्तार में जाना उचित नहीं समझा। इस प्रकार धारा 4 के अंतर्गत केंद्र सरकार अपनी शक्तियों को धारा 3 के अंतर्गत आते पारित करने के लिए प्रत्यायोजित कर सकती है। धारा 4 ऐसे अधिकारियों को वर्णित करती है जिन्हें शक्तियों का प्रत्यायोजन किया जा सकता है। अतः इस स्थिति में धारा 4 को भी अविधिमान्य घोषित नहीं किया जा सकता है।
चौथे प्रशन के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा मत व्यक्त किया गया कि control order की धारा 3 व 4 भारतीय रेलवे अधिनियम की धाराओं 27, 28 एव 41 की विरोधी नहीं है। धारा 3 व 4 रेलवे अधिनियम की धाराओं को अतिष्ठित नहीं करती है और न ही रेलवे प्रशासन को किसी अयोग्यता से ही ग्रसित करती है। Control order की धारा 3 में एक परमिट प्राप्त करने की अपेक्षा की गई है जिसे कमिश्नर धारा 4 के अंतर्गत प्रदान करता है। इन दोनों धाराओं का कोई भी प्रत्यक्ष संबंध रेलवे अधिनियम की धाराओं 27, 28 या 41 से नहीं है।
अंतिम प्रशन धारा 6 को उच्च न्यायालय द्वारा अविधिमान्य घोषित करने के संबंध में है, जिसके संबंध में अपिलकर्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि धारा 3 भी धारा 6 से मिश्रित है इस कारण से इसे भी अविधिमान्य घोषित किया जाना चाहिए। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा अवधारित किया गया कि धारा 6 कि व्याख्या करने कमें उच्च न्यायलय ने भूल की है। धारा 6 न तो प्रत्यक्ष रूप से और न विवक्षित रूप से किसी पहल से अस्थित्व वाली विधि को निरसित करती है और न उन्हे हटाती है। जहां तक statute book पर है। धारा 6 का तात्पर्य उस कानू के प्रावधानं कनिरसित करना या हटाना नहीं है, बल्कि जहां तक उन अधिनियमों के प्रावधान Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 के प्रावधानों से असंगत है, तो उस सीमा तक उन्हें सामान्य रूप से बाई पास करना है। दूसरे शब्दों में इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं, कि यदि किसी आवश्यक वस्तु के संबंध में तत्समय प्रवर्त किसी अन्य अधिनियम के अंतर्गत पारित किए गए एवं धारा 3 के अंतर्गत पारित किए गए आदेश में कोई असंगति है तो उस वस्तुओं के संबंध में उस सीमा तक उस विधि के अंतर्गत पारित किए गए आदेश लागू नहीं होंगे। कतिपय विधियों को बाई पास करना निश्चित रूप से निरसन के अंतर्गत या हटाने के अंतर्गत नहीं आता है। वह विधि अनिरसित रहती है, परंतु धारा 3 के अंतर्गत पारित किए गए किसी आदेश के लागू रहने तक वह प्रभाव में नहीं रहती है।
उच्चतम न्यायलय द्वारा इस संबंध में आगे विचार व्यक्त करते हुए कहा गया कि यदि हम तर्क हेतु यह मान भी ले कि धारा 3 के अंतर्गत एव किसी वर्तमान विधि के प्रावधानों के अंतर्गत पारित किए गए आदेशों में असंगततता के संबंध में असंगतता की सीमा तक वरत्मान विधि के प्रावधान विवक्षित रूप से निरसित माने जाएंगें, परंतु यह कारय कोई ऐसा कार्य नहीं है जोकि किसी प्रत्यायोजक द्वारा किया गया हो, बल्कि यह कार्य संसद ने स्वय के कार्य द्वारा किया है। धारा 6 को अधिनियमित करके संसद ने स्वयं ही यह घोषित कर दिया है कि धारा 3 के अंदर्गत पारित किया गया आदेश इसअधिनियम के अलावा किसी अन्य विधि के अंदर्गत पारित किए गए आदेश में किसी असंगतता के होने के बावजूद भी प्रभाव में रहेगा। इस प्रकार की घोषणा किसी प्रत्यायोजक द्वारा नहीं की गई है, बल्कि विधायिका ने धारा 6 के माध्यम से अपना यह आशय व्यक्त किया है। प्त्यायोजक की शक्ति केवल धारा 3 के अंतर्गत आदेश पारित करने की है तथा धारा 6 बाद में आती है। यदि विधायिका का किसी विधि को निरसित करने या हटाने का होता तो वह स्पष्ट रूप से ऐसा कर सकतीथी। अत: उच्चतम न्यायलय द्वार अवधारित किया गया है कि धार 6 के अंदर्ग किया गया कोई भी कार्य प्रत्यायोजक का नहीं है। इसलिए इस आधार पर इसे असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता है।
अत: उच्चतम न्यायलय द्वारा अवधारित किया गया कि Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धाराएं 3, 4 एव 6 संवैधानिक हैं तथा उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश भी संवैधानिक है। अपील अस्वीकार की गई तथा परीक्षण न्यायालय के विधि के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया।
प्रतिपादित विधि के सिद्धांत -
1. किसी विधि के किन्हीं प्रावधानों को किसी समय बाई-पास करने का तात्पर्य निश्चित रूप से उसे विवक्षित: निरसित करना या हटाना नहीं माना जा सकता है।
2. किसी व्यापार के संबंध में किसी परमिट को प्राप्त करना मात्र अनुच्छेद 19 (1)(f) व (g) में मिले मूल अधिकार का हनन नहीं माना जा सकता है।
3. Essential Supplies ( Temporary Powers) Act, 1946 की धाराएं 3, 4 एवं 6 पूर्ण रूप से संवैधानिक हैं। वे रेलवे अधिनियम की धाराओं 27, 28 एवं 41 की प्रतिपूर्ति करती हैं, तथा इन दोनों में कोई संघर्ष नहीं है।
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