छत्तीसगढ़ में सरकार बनाना कठीन होगा
बहुत दिनों बाद लौटा हूं... मुद्दा गंभीर है... छत्तीसगढ़ से जुड़ा है। या यूं कहूं कि छत्तीसगढ़ सरकार से जुड़ा है। हाल ही में शिक्षाकर्मियों ने संविलियन के लिए आंदोलन किया। इससे भारत का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों की पढ़ाई कई दिनों तक प्रभावित होती रही। लगातार हड़ताल काम बंद और विरोध के साथ शिक्षाकर्मियों का बड़ा तबका होने के कारण सरकान ने इनका संविलियन करने की घोषणा कर दिया। शिक्षाकर्मी शांत पड़े तो मुद्दा उससे भी गंभीर हो गया। इस बार पुलिस के लोग आंदोलन पर उतर आए। पुलिस वाले खुद तो आंदोलन में शामिल नहीं हुए, लेकिन उनके परिवार के लोग इस आंदोलन को आयोजित किए। बता दें कि छत्तीसगढ़ के कई जिले नक्सल प्रभावित हैं। ऐसे में पुलिस या उनके परिवार के आंदोलन पर जाने का मतलब है हमारी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हुई। दूसरे सरकार ने आदेश दिया पुलिस परिवार के लोगों को गिरफ्तार किया जाए। वहीं पुलिस कर्मी अपने ही परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार करने के लिए मोर्चा संभाले रखा। समझ सकते हैं जब किसी को कहा जाए कि अपने ही परिवार की कुर्बानी दे दो, लेकिन आपकी सैलरी नहीं बढ़ाएंगे, आपको पदोन्नत नहीं करेंगे, आपको विकली ऑफ नहीं देंगे, महीने के 30 दिन 24 घंटे काम लेंगे। इस आंदोलन को दबाने के लिए सरकार ने सभी हथकंडे अपना ली। आंदोलन दबाने कई लोगों के खिलाफ देशद्रोह तो कई के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दायर कर जेल भी भेज दिया गया। यह उस देश में हुआ जहां आंदोलन और शांतिपूर्वक विरोध करना हमारा संवैधानिक अधिकार है। इसके बाद भी पुलिस परिवार और आंदोलन में शामिल पुलिस कर्मियों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा जला वे जेल भेजे गए। इस मुद्दे को दबाने के बाद भले ही सरकार खुद को सुरक्षित मान ले, लेकिन उसकी नींव हिल चुकी है। क्योंकि इसके बाद संविदाकर्मी और दूसरे कर्मचारी संगठन मैदान में उतरे। इस आंदोलन का भी नतीजा कुछ नहीं निकला। कर्मचारी असंतुष्ट हैं। इसका परिणाम भाजपा की सरकार को इस बार इन कर्मचारी परिवारों के तरफ से मिल सकती है। क्योंकि किसी भी आंदोलन का अंत परिणाम के साथ होता है। ऐसे में कर्मचारियों का असंतोष भाजपा सरकार पर भारी पड़ सकता है। क्योंकि चुनावी वर्ष में किए गए आंदोलन का परिणाम निकलता है। ऐसे में जबकि कई ऐसे भी कर्मचारी थे जो 30 साल से संविदा पर हैं।
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