चुनाव में टैक्स के पैसे को बर्बाद और बच्चों को परेशान करते हैं अधिकारी

इन दिनों लोकसभा चुनाव की बयार चारों तरफ है। एक तरफ जहां नेता वोट के लिए गांव गांव गली गली कुत्ते की तरह भटक रहे हैं। वहीं जागरुकता अभियान और रैली के नाम पर दूसरी ओर प्रशासनिक अधिकारी क्रिकेट भी खोल रहे, साईकिल चला रहे और रैली भी निकाल रहे हैं। इन रैलियों साइकल चलाने और क्रिकेट में जनता के टैक्स के पैसे का तो दुरूपयोग किया ही जा रहा है, ये नन्हे बच्चों का कसूर नहीं समझ नहीं आ रहा जिसमें बच्चों का सहारा रैली में भीड़ बढ़ाने ले लिए लिया जा रहा है। जागरुकता के लिए क्या स्कूल के बच्चों का उपयोग किया जाना सही है? जिन बच्चों का उपयोग प्रशासनिक अधिकारी करते हैं वास्तव में वे बच्चे बस स्कूल टीचर के कहने से जाते हैं। उन्हें तो यह भी नहीं मालूम होता कि चुनाव और मतदान में होने वाला क्या है? और मतदान क्यों करना चाहिए? स्कूल के समय से देखता आ रहा हूं रैली करानी है तो स्कूल के बच्चों को बुला लो, मानव श्रृंखला बनानी है तो स्कूल के बच्चों को बुला लो, भीड़ बढ़ानी है स्कूलों से बच्चों को बुला लो। मने सबसे ज्यादा जागरुकता इन बच्चों में है, या इन्हें जागरुक किया जा रहा है समझ से परे है। मतदान की रैली में कायदे से काॅलेज स्टूडेंट्स को शामिल करना चाहिए, जिससे वे खुद वोट करेंगे और लोगों को भी जागरूक करने में सफल होंगे। लेकिन भीड़ बढ़ानी है तो स्कूल के बच्चों का उपयोग किया जा रहा है, क्योंकि दूसरा कातण यह है कि काॅलेज के स्टूडेंट्स इन रैलियों में शामिल नहीं होंगे। क्योंकि उन्हें पता है कि उनके नाम पर प्रशासनिक अधिकारी लाखों रुपए डकार जाते हैं। स्कूल के छात्रों को ₹5 का बिस्किट और एक बोतल पानी या लीची का 1 पाउच देकर खुश कर दिया जाता है जबकि वे काम लाखों करोड़ों रुपए का कर जाते हैं। अगर इनकी मेहनत की बात की जाए तो यह बच्चे भी उन जूनियर आर्टिस्ट की तरह ही काम करते हैं लेकिन का मेहनताना ₹5 का बिस्किट और पानी बोतल वाली की बोतल तक ही सीमित रखता है। 

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