कश्मीर व्यथा कथा तीन किश्त- कनक तिवारी
लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा
पहली किश्त
(1)भारतीय नेताओं के कारण सियासत का घाव पक गया है और उसमें मवाद भी है। सियासत की हर सांप्रदायिक खखार के जरिए देश के माहौल में हिंसा का बलगम थूका जा रहा है। यह समय बहुत परेशानदिमागी और चुनौतियों के साथ नागरिक खतरे का भी हो रहा है। हर सच को जिबह कर उसे नारों के गर्भगृह में भ्रूण बना दिया जाता है। यदि किसी घटना, निर्णय या तर्क की तटस्थ, उर्वर, बौद्धिक और देशज जांच की जाए तो उस पर नासमझ समर्थकों द्वारा कायिक, बौद्धिक और मानसिक हमले कराए जाते हैं। इसके बावजूद देश है कि उसे रोशनी की तरफ चलना है। घटाटोप अंधेरा अब उसका नहीं है जिसका सूरज दिन के चौबीस घंटे संसार के किसी मुल्क के ऊपर इतराता रहता था। यह खतरा हिन्दुस्तानी खुद उगा रहे हैं। हर समझदार नागरिक और विशेषकर युवा पीढ़ी को अब सभी विचारधाराओं को दरकिनार करके केवल उस राष्ट्रीय फलसफाई पुस्तक संविधान की इबारत को इस तरह समझने की जरूरत है मानो वह दिए या टाॅर्च की रोशनी बल्कि जुगनू की जगमग तो मान ली जाए जिससे अंधेरा छंटे। जम्मू कश्मीर की सत्यनारायण की कथा का पाठ हर उस पार्टी और नेता की आलोचना भी करेगा जिनके हाथ में सत्ता रही है। उनके साथ जिस तरह की मुश्किलें रही हैं उन्हें भी सहानुभूति की समझ के साथ देखना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हिंसा, हुड़दंग, हिकारत और हत्याएं राष्ट्रीय उपलब्धियों की तरह इतिहास की छाती पर टांक दी जाएंगी।
(2)संविधान के अनुच्छेद 370 को भाजपा की केन्द्र सरकार ने संवैधानिक भाषा में आंशिक रूप से खत्म किया है। उसका आधा हिस्सा अर्थात् अनुच्छेद (2) तथा (3) काटकर फेंकने से अनुच्छेद लहूलुहान हो गया है। केन्द्र सरकार का फैसला इतना गोपनीय, आक्रामक और यक-ब-यक हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। ऐसा नहीं भी है क्योंकि जनसंघ के जमाने से भाजपा अपने चुनाव घोषणापत्रों में साफ ऐलान करती रही है कि केन्द्र में उसकी सत्ता होने पर धारा 370 का खात्मा करेगी क्योंकि इसके कारण जम्मू कश्मीर भारत से एक तरह के भावनात्मक अलगाव में रहता आया है। यह तर्क विचित्र और जटिल होने के साथ साथ खारिज नहीं भी कहा जा सकता। मौजूदा लोकसभा में अपने अकेले दम पर आ चुकी भाजपा राष्ट्रीय जनतांत्रिक जमावड़े के लगभग दो तिहाई बहुमत के साथ अपनी पुरानी घोषणा को अमल में लाने का वायदा पूरा नहीं करती तो इतिहास में उसकी जगह सम्मानजनक नहीं बन पाएगी। यह भी है कि सरकार ने संविधान की मर्यादाओं को ताक में रखकर सभी स्टेक होल्डर्स से बात तक नहीं की। संभवतः संघ परिवार के अंतःपुर में फैसला किया गया होगा। राजग के घटक दलों से भी या तो परामर्श नहीं हुआ या इतना गुपचुप और गोपनीय हुआ कि उनमें से कुछ घटकों पर पहले से भाजपा को अविश्वास रहा होगा। कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां तो केवल कुछ सूंघती ही रहीं। उनके नेताओं को पहले घर पर नजरबंद किया गया और बाद में गिरफ्तार भी।
(3)फैसले की सोची समझी प्रचारित अनुकूल धमक पूरे देश में है। जनता तो क्या कानून के कई विद्यार्थियों और वकीलों को भी कश्मीर संबंधी प्रावधानों की संवैधानिकता, ऐतिहासिकता सामाजिकता और सामासिकता की ठीक ठीक जानकारी नहीं है। अंगरेजी फिल्में देखती अधपकी समझ के भारतीय सिनेमाई दर्शक बीच बीच में तालियां बजाने लगते हैं या हंसने लगते हैं। उसी तरह नागरिक संचार माध्यमों से लेकर सड़कों तक, गोष्ठियों से लेकर सभाओं तक इस फैसले की लोकप्रिय पीठ थपथपा रहे होंगे। जम्मू कश्मीर समस्या देश से एक कठिन जिरह मांगती रही है। अंतहीन बहस का सिलसिला अभी भी कायम रहेगा। यह यात्रा कवि धूमिल को याद करते उलटबांसी में संसद से सड़क की ओर चल पड़ी है। कोई इस मामले को गंभीर तटस्थता से समझना चाहेगा तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और इस्लामी कठमुल्लापन की तरफ से उसके लिए देशद्रोही या तनखैया का नकाब उनकी फैक्ट्री में पहले से तैयार रहता है। इसके साथ साथ जम्मू कश्मीर पर हमला करने वाले पाकिस्तानी कबाइली आतंकवादियों से लेकर आज तक उस प्रदेश के हिंसक अलगाववादियों और पाक-परस्तों को भी कोई सच्चा भारतीय क्यों बख्शे? अनुच्छेद 370 उनके नापाक इरादों और हिन्दुस्तान के खिलाफ नफरत, हिंसा, खूंरेजी, संदिग्ध मुसलमानियत और जम्मू कश्मीर की जनता की भावना के साथ क्षेत्रीय, हिंसक, जातीय और सांप्रदायिक हरकतों के कारण संदेहजनक तो रहा है।
(4)जम्मू कश्मीर से संबंधित संववैधानिक प्रावधान शामिल करने की कवायद में भारत के विभाजन की दर्दनाक पृष्ठभूमि की अनदेखी नहीं की जा सकती। तफसील या तथ्यपरकता के चोचले में जाए बिना मोटे तौर पर यह तय है कि मुस्लिमपरस्ती और हिन्दूपरस्ती की भावनाओं के अतिरिक्त स्वतंत्रता संग्राम से उत्पन्न भारतीय राष्ट्रवाद और देसी राजाओं की अपनी निजी आजादी और स्वायत्तता के दलदल में अंगरेज ने कूटनीतिक चालों के अपने मोहरे चले। मुस्लिम बहुल इलाके पाकिस्तान में चले गए। गुजरात के जूनागढ़ का इलाका जनमत संग्रह तथा नेहरू, पटेल, वीपी मेनन वगैरह के कारण बचा। लगभग साढ़े पांच सौ देसी रियासतें इन्हीं नेताओं के कारण भारत संघ में शामिल होने के लिए स्वेच्छा या अनमने ढंग से ही सही तैयार हो गईं।
(5)भाजपा की एक और सायास तुरुप चाल है। वह भारत के इतिहास में स्वतंत्र भारत के नंबर 2 बेताज बादशाह सरदार पटेल को एकमात्र, सबसे बड़ा और अपराजेय नायक बनाने पर तुली रहती है। पटेल को एकछत्र नेता स्वीकार करते नेहरू की भत्सना करना जनसंघ के दिनों से भाजपा का जिद्दी एजेंडा चला आ रहा है। इतिहास का सच है कि सरदार पटेल ने शुरुआत में ऐसी अपुष्ट इच्छा व्यक्त की थी कि झगड़े का अंत करने कश्मीर का कुछ हिस्सा पाकिस्तान को दे दिया जाए। यह उनका राजनीतिक फलसफा नहीं था। इतिहास में वैकल्पिक, कामचलाऊ और समझौतापरक कच्चे उल्लेख नेता करते रहते हैं। चट्टानी दृढ़ता के सरदार पटेल ने ही अपने नेतृत्व के कारण देसी रियासतों का भारत संघ में विलीनीकरण कराया। नेहरू-पटेल युति ने आपसी विचार विमर्श के बाद कश्मीर पर एक राय कायम की। उसके बाद वह संविधान सभा के अनुच्छेद 306 (ख) (बाद में 370) के अनुसार सर्वसम्मति से दर्ज हुआ। बहुत महत्वपूर्ण है कि संविधान सभा में डाॅ. अंबेडकर, जनसंघ के बाद में हुए संस्थापक हिन्दू महासभा के डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी और बाद में हुए अध्यक्ष आचार्य रघुवीर भी बिना विरोध किए बैठे थे।
(6)संक्षेप में किस्सा यह है। 1947 में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के डोगरा राजा हरिसिंह के सामने पाकिस्तान या हिन्दुस्तान में शामिल हो जाने या आजाद बने रहने के विकल्प थे। अधिकांश देसी रियासतों की तरह हरिसिंह के मन में भी आजाद बने रहने की खामखयाली के प्रमाण मिलते हैं। कुछ उग्र तथा इस्लामी कट्टरता के समर्थक पाकिस्तान के साथ मिलना चाहते रहे होंगे। हिन्दू और कई राष्ट्रवादी मुसलमान, जिनमें शेख अब्दुल्ला का भी नेतृत्व प्राप्त रहा होगा, भारत संघ में शामिल होने के पक्षधर बताए जाते हैं। दोनों के बीच राजा हरिसिंह की जम्मू कश्मीर को आजाद रखने की कुलबुलाहट इतिहास का मरा हुआ सच नहीं है। उन्होंने इस संबंध में 12 अगस्त 1947 के लिखे पत्र में भी यही इरादा बताया था। अचानक 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान की तरफ से आए कबाइली आदिवासियों वगैरह ने कश्मीर घाटी पर घातक हमला किया। कुछ हिस्सा उनके कब्जे में चला गया (जो आज तक है) उसे पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है। महाराजा के सेना प्रमुख ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह कुछ सैकड़ा वफादार सैनिकों के साथ हमलावरों से चार दिनों तक जूझते रहे। उनकी शहादत के कारण उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा
दूसरी किश्त
लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा
दूसरी किश्त
(7) गवर्नर जनरल को अपने पत्र दिनांक 26/10/1947 द्वारा महाराजा हरिसिंह ने भारत संघ में शामिल होने का प्रस्ताव भेजा। गवर्नर जनरल ने उसे दूसरे ही दिन कुछ शर्तों के साथ स्वीकार कर लिया। 23 अक्टूबर 1947 से 26 अक्टूबर तक चार दिनों की ऊहापोह में महाराजा हरिसिंह को यही इकलौता सम्मानजनक विकल्प सूझा कि भारत से तत्काल सैनिक सहायता मांगें। भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत यह तब संभव था, जब जम्मू कश्मीर से उसका रिश्ता विधिपूर्ण हो। हड़बड़ी में एक विलेख का प्रारूप तैयार किया गया जिसे अधिमिलन विलेख या Istrument of Accession कहा गया। पहले से कुछ हिस्सा चीन तथा कुछ पाकिस्तान के कब्जे में होने और कुछ को भारत ले जाते सोचते हरिसिंह के पास वक्त नहीं था। लिहाजा तय हुआ प्रतिरक्षा, संचार और विदेशी मामलों के लिए भारत संघ की संवैधानिक जिम्मेदार होगी। बाकी केंद्रीय सरकार के अधिकार जम्मू कश्मीर की हुकूमत के हवाले होंगे। 5 मार्च 1948 को महाराजा ने उत्तरदायी मंत्रिपरिषद स्थापित करते हुए उसे जिम्मेदारी सौंपी कि वह राष्ट्रीय असेम्बली का गठन कर जम्मू कश्मीर के लिए वयस्क मताधिकार के आधार पर राज्य का संविधान बनाए।
(8) अनुच्छेद 370 के इतिहास को सही संदर्भों में समझना बहुत आवश्यक है। कश्मीर का भारत में होने जा रहा विलय एक पेचीदा प्रश्न था। 26 अक्टूबर 1947 को भारत की संविधान सभा कार्यरत थी। इसके साथ साथ आजाद भारत का मंत्रिमंडल भी गठित हो चुका था। संविधान सभा की कार्यवाही में डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्षता करते थे। मंत्रिपरिषद के कार्यसंचालन में प्रधानमंत्री नेहरू के तहत वे कृषि मंत्री रहे थे। जम्मू कश्मीर के मसले को भारी ऊहापोह, अनिश्चय, मतभेद और फिर अंततः संयुक्त जिम्मेदारी के तहत मुकाम पर पहुंचाया गया। यह कार्यवाहियों में मौजूद है कि प्रधानमंत्री नेहरू के साथ डाॅ. अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल और श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी अन्य सदस्यों के अतिरिक्त समय समय पर गुफ्तगू में शामिल रहे।
कई कारणों से आखिरकार एक महत्वपूर्ण सदस्य एन. गोपालस्वामी आयंगर को अनुच्छेद 370 का प्रारूप संविधान सभा में पेश करने के लिए राजी किया गया। आज कहने में उत्तेजक लगता है मानो सब कुछ जवाहरलाल नेहरू ने किया। लेकिन जिस तरह मतभेदों के बावजूद स्वस्थ प्रजातांत्रिक प्रक्रिया अपनाते हुए हमारे कालजयी संविधान निर्माताओं ने मतभेद और सहमति के बीच बार बार और लगातार स्पेस ढूंढ़ा वह आज की संसद में कहां है? इतिहास के किसी कालखंड में क्यों और कैसा निर्णय हुआ उसकी बारीकियों, विवशताओं और शंकाओं को समझे बिना बाद की पीढ़ी फतवा दे सकती है। लेकिन आत्मावलोकन नहीं करती कि उससे कुछ भी करते धरते कितना बन रहा है।
कश्मीर जैसा महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान बिना किसी खास बहस के सदस्यों की सर्वसम्मति से (जिनमें हिन्दू महासभा के सदस्य भी शामिल थे) केवल सदस्य एन0 गोपालस्वामी आयंगार ने लंबा भाषण देकर सदस्यों को जम्मू कश्मीर की अजीबोगरीब परिस्थितियों से वाकिफ और आश्वस्त करते हुए अनुच्छेद 370 (तब 306 (क) पारित करा लिया।
उनके भाषण के कुछ मुख्य अंशों को समझना बहुत आवश्यक हैः-
‘‘यह राज्य भारत संघ में आ गया है। प्रवेश 26 अक्तूबर 1947 को हुआ। उस वक्त से राज्य का उतार चढ़ाव वाला इतिहास रहा है। इस अधिमिलन का अर्थ है कि अब वह राज्य फेडरल राज्य अर्थात् भारत डोमिनियन की इकाई है। भारत गणतंत्र में परिवर्तित होने जा रहा है जिसका उद्घाटन 26 जनवरी 1950 को होगा। इसलिए जम्मू और कश्मीर राज्य को भारत गणराज्य की इकाई होना ही है।‘‘
‘‘इस वर्ष के शुरू में युद्ध बन्द करना तय हो चुका था और युद्ध अभी तक बन्द है। लेकिन अभी भी राज्य की हालत असामान्य तथा उथलपुथल की लगती है। अभी शान्ति नहीं हुई है। इसलिए यह जरूरी है कि राज्य के प्रशासन का संचालन तब तक इन असामान्य परिस्थितियों के संदर्भ में ही चलाया जाये जब तक वैसी शान्ति स्थापित नहीं हो जाए जो अन्य राज्यों में है।‘‘
‘‘भारत सरकार कुछ बातों के लिए कश्मीर की जनता के प्रति वचनबद्ध है। उसने स्वयं वचन दे रखा है कि राज्य की जनता को यह निश्चित करने का अवसर दिया जायेगा कि वह भारत गणराज्य के साथ रहना चाहती है या उससे बाहर जाना चाहती है। जनमत द्वारा जनता की इस इच्छा को मालूम करने के लिये भी हम वचन दे चुके हैं बशर्ते कि शान्ति का माहौल स्थापित हो जाये और निष्पक्ष जनमत की गारंटी की जा सके। हमने यह भी मान लिया है कि एक संविधान सभा द्वारा जनता की इच्छा से राज्य का संविधान निश्चित किया जायेगा तथा राज्य पर संघ के क्षेत्राधिकार की सीमा भी निश्चित की जायेगी।‘‘
‘‘इस अनुच्छेद का दूसरा भाग जम्मू और कश्मीर राज्य पर संसद् की विधायी शक्ति से सम्बद्ध है। यह मुख्यतया अधिमिलन लेख द्वारा परिमार्जित है। मोटे तौर पर वह विधायी शक्ति प्रतिरक्षा, विदेशी विषय और संचार के तीन विषयों तक सीमित है। लेकिन वास्तव में इन तीन विषयों में ही व्यापक तौर पर कुछ ऐसे मद सम्मिलित हैं जो अधिमिलन विलेख में उल्लिखित हैं।‘‘
‘‘इसके बाद स्पष्टीकरण है जिसमें परिभाषित किया गया है कि ‘राज्य की सरकार‘ से क्या अर्थ है। राज्य का संविधान जो इस समय जम्मू और कश्मीर में लागू है तथा वह उद्घोषणा भी जिसे महाराजा ने 5 मार्च 1947 को जारी किया। दोनों में राज्य की सरकार की परिभाषा की गई है। उद्घोषणा की जो शर्तें राज्य के संविधान के उपबन्धों से असंगत हैं वहां तक वैध या प्रभावशील तो मानी जायेंगी। इसी कारण इस स्पष्टीकरण में उद्घोषणा का हवाला दिया गया है। इस उद्घोषणा के तहत ही महाराजा ने एक अन्तरिम लोकप्रिय सरकार का गठन किया है।‘‘
कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने यह स्पष्ट किया है कि जनमत संग्रह का प्रस्ताव नेहरू की तरफ से नहीं भेजा गया था। बल्कि उसे गवर्नर जनरल माउंट बेटन ने कुछ शर्तों के साथ प्रस्तावित किया था। उन शर्तों में यह शामिल था कि भारत और पाकिस्तान की ओर से जम्मू कश्मीर के खिलाफ सैनिक ताकत का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। यदि पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर हमला किया इस कारण जनमत संग्रह का सवाल संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यवाहियों से अपने आप काफूर हो गया।
(9) 370 जम्मू कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध-(1) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,- (क) अनुच्छेद 238 के उपबंध जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में लागू नहीं होंगे,(ख) उक्त राज्य के लिए विधि बनाने की संसद् की शक्ति,- 1) संघ सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित होगी जिनको राष्ट्रपति, उस राज्य की सरकार से परामर्श करके, उन विषयों के तत्स्थानी विषय घोषित कर दे जो भारत डोमिनियम में उस राज्य के अधिमिलन को शामिल करने वाले अधिमिलन पत्र में ऐसे विषयों के रूप में विर्निदिष्ट है जिनके संबंध में डोमिनियन विधान-मंडल उस राज्य के लिए विधि बना सकता है,
(2) उक्त सूचियों के उन अन्य विषयों तक सीमित होगी, जो राष्ट्रपति, उस राज्य की सरकार की सहमति से, आदेष द्वारा, विनिर्दिष्ट करे। (ग) अनुच्छेद 1 और इस अनुच्छेद के उपबंध उस राज्य के संबंध में लागू होंगे, (घ) इस संविधान के ऐसे अन्य उपबंध ऐसे अपवादों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए, जो राष्ट्रपति आदेष द्वारा विनिर्दिष्ट करें, उस राज्य के संबंध में लागू होंगे,
परन्तु ऐसा कोई आदेश जो उपखंड (ख) के पैरा (प) में निर्दिष्ट राज्य के अधिमिलन पत्र में विनिर्दिष्ट विषयों से संबंधित है, उस राज्य की सरकार से परामर्ष करके ही किया जाएगा, अन्यथा नहींः परन्तु यह और कि ऐसा कोई आदेश जो अंतिम पूर्ववर्ती परंतुक में निर्दिष्ट विषयों से भिन्न विषयों से संबंधित है, उस सरकार की सहमति से ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं। (2) यदि खंड (1) के उपखंड (ख) के पैरा (3) में या उस खंड के उपखंड (घ) के दूसरे परंतुक में निर्दिष्ट उस राज्य की सरकार की सहमति, उस राज्य का संविधान बनाने के प्रयोजन के लिए संविधान सभा के बुलाए जाने से पहले दी जाए तो उसे ऐसे संविधान सभा के समक्ष ऐसे विनिश्चय के लिए रखा जाएगा जो वह उस पर करे। (3) इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेगा कि यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा या ऐसे अपवादों और उपांतरणों सहित ही और ऐसी तारीख से, प्रवर्तन में रहेगा, जो वह विनिर्दिष्ट करेः परन्तु राष्ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना निकाले जाने से पहले खंड (2) में निर्दिष्ट उस राज्य की संविधान सभा की सिफारिष आवश्यक होगी।
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लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा
तीसरी किश्त
(10) महाराजा हरिसिंह द्वारा दिनांक 25/11/1949 को युवराज कर्णसिंह को सभी उत्तराधिकार सौंप दिए। कर्णसिंह ने ही दिनांक 25/11/1949 को उद्घोषणा जारी की कि राज्य की विधानसभा द्वारा भारत के संविधान को उस हद तक अंगीकृत किया जाए जो जम्मू कश्मीर राज्य के लिए स्वीकार किया गया है। यही कारण है संविधान सभा ने सातवीं अनुसूची में केन्द्र को 97, राज्य को 66 और समवर्ती सूची को 47 विषय सौंपे। अंततः दिनांक 26 नंवबर 1949 को सभा की कार्यवाही के आखिरी दिन वह तय हो सका। इन तीनों सूचियों के विषयों को देसी रियासतों को दिखाकर उनका समर्थन लिया गया। जिस दिन 25 नवंबर 1949 को महाराजा हरिसिंह ने समर्थन दिया। उसी दिन संविधान सभा में अनुच्छेद सातवीं अनूसूची को पारित किया गया। भारत का संविधान 26/11/1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत किया गया। उसके तहत जम्मू कश्मीर संबंधी उपरोक्त उद्घोषणा भी समाहित हो गई। भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ। उसी दिन भारत के राष्ट्रपति ने संविधान (जम्मू कश्मीर पर लागू) आदेश 1950 जारी किया। दिनांक 20/04/1951 को महाराजा ने फिर उद्घोषणा जारी की जिसके अनुसरण में दिनांक 05/11/1951 को जम्मू कश्मीर की संविधान सभा गठित हुई। दिनांक 05/06/1952 को संविधान सभा ने कुछ आधाभूत सिद्धांत गढ़े जिनके संदर्भ में जम्मू कश्मीर का संविधान निर्मित किया जाना था। यह महत्वपूर्ण है कि आधारभूत सिद्धांतों में राज्य के प्रमुख का विधानसभा द्वारा 5 वर्षों या दुबारा निर्वाचन के जरिए प्रावधान किया गया। राज्य प्रमुख का नामकरण सदरे-रियासत किया गया। ऐसा प्रावधान भारत के संविधान में नहीं है। राज्यों के राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा बिना किसी चुनाव प्रक्रिया के नियुक्त किए जाते हैं।
(11) 1949 के अंत तक शेख अब्दुल्ला मंत्रिमंडल के दबाव के कारण महाराजा हरिसिंह को अपने सभी प्रशासनिक और संवैधानिक उत्तरदायित्व अपने पुत्र युवराज कर्णसिंह को सौंपने पड़े। जम्मू कश्मीर विधान सभा द्वारा उन्हें राज्य प्रमुख के रूप में बाकायदा दिनांक 31/10/1951 को सदरे-रियासत के नाम से निर्वाचित किया गया। उसी दिन जम्मू कश्मीर में सामंतवादी शासन का औपचारिक अंत होकर राज्य सत्ता निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में आ गई। भारत सरकार ने अपनी उद्घोषणा दिनांक 15/11/1952 को राष्ट्रपति द्वारा दिए गए अनुच्छेद 370 (3) के तहत आदेश द्वारा इस स्थिति को संवैधानिक मंजूरी दी। जून 1952 में ही शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में राज्य और केन्द्र के बीच 10 सूत्रीय करार दिल्ली में भी हुआ। उसका मकसद था राज्य की संविधान सभा के अनुमोदन से केन्द्र के कितने अधिकार जम्मू कश्मीर पर लागू किए जा सकते हैं। सदरे-रियासत को भी बाकी राज्यों के राज्यपाल के समकक्ष माना गया। इसी बीच राज्य के सामने आ रही कई कठिनाइयों, चुनौतियों और मतभेदों के चलते सदरे-रियासत ने शेख अब्दुल्ला का मंत्रिमंडल दिनांक 08/08/1953 को अक्षमता और जनअविश्वास के आरोप लगाकर बर्खास्त कर दिया। वहां बख्शी गुलाम मोहम्मद के नेतृत्व की कठपुतली सरकार स्थापित हुई। वह 10 वर्षों तक भ्रष्टाचार के आरोपों सहित किसी तरह चलती रही। जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने भारत में अधिमिलन तथा दिल्ली में हुए करार को संवैधानिक रूप से फरवरी 1954 में पुष्ट किया।
(12) असल विवाद की जड़ भारत के राष्ट्रपति के आदेश दिनांक 14/05/1954 में है। अनुच्छेद 370 (1) के तहत राष्ट्रपति के पुराने आदेश 1950 को निरसित करते हुए संविधान (जम्मू कश्मीर पर लागू) आदेश 1954 बनाया गया। इस आदेश के जरिए भारत के संविधान के कई हिस्से जम्मू कश्मीर पर लागू किए गए। इसमें विवादित अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन संबंधी भी था। उसमें परंतुक लगाया गया कि वह जम्मू कश्मीर राज्य पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक वह अनुच्छेद 370 (1) के तहत लागू नहीं हो। दिनांक 17/11/1956 को जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने राज्य का संविधान अंगीकृत किया। उसके शेष हिस्से दिनांक 01/01/1957 को लागू किए गए। राष्ट्रपति का 1954 का आदेश बाद में 1958, 1959, 1960, 1964, 1967 और 1971 के बाद भी राज्य सरकार की सलाह से संशोधित होता रहा। इस कवायद का मुख्य मकसद और असर भारत के संविधान के प्रावधानों को ज्यादा से ज्यादा जम्मू कश्मीर पर लागू करने से था। वह मोटे तौर पर होता भी रहा।
राष्ट्रपति के 1954 के आदेश के जरिए कुछ अपवादों को छोड़कर केन्द्र के लगभग सभी क्षेत्राधिकार जम्मू कश्मीर पर लागू किए गए। केवल राज्य की संविधान सभा द्वारा जम्मूू कश्मीर का जो संविधान बनाया जाना था वह राज्य के हवाले छोड़ दिया गया। यह महत्वपूर्ण है कि 1954 के राष्ट्रपति के आदेश ने भारत सरकार और जम्मू कश्मीर के बीच किए गए करारों और वायदों को जस का तस रखा। वैसे तो भारत के अन्य राज्यों के भी संविधान बनाए गए थे। उन्हें भारत के संविधान में अनुकूलन के जरिए समाहित कर लिया गया। विशेष तथा विषम स्थितियों के चलते जम्मू कश्मीर को अधिकार दिया गया कि वह अपनी संविधान सभा द्वारा राज्य के अधिकारों के लिए एक आंतरिक संविधान की रचना करे। जम्मू कश्मीर के संविधान के बन जाने का फलितार्थ हुआ कि भारत के संविधान के भाग 6 में दिनांक 01/11/1956 के सातवें संशोधन के कारण अनुच्छेद 152 में यह उल्लेख किया गयाः-152. परिभाषा-इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, ‘‘राज्य‘‘ पद के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य नहीं है।‘‘
संविधान के अध्यापक डाॅ. डी.के. दुबे एक दिलचस्प बात कहते हैं। जब 1954 के राष्ट्रपति के प्रस्तावित आदेश का प्रारूप डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद को दिया गया तो उन्होंने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नेहरू से पूछा कि क्या ऐसा आदेश राष्ट्रपति के द्वारा संवैधानिक रूप से किया जा सकता है। नेहरू ने भी लिखित में उत्तर दिया और उसमें लिखा कि इस संबंध में वे मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए राष्ट्रपति से अनौपचारिक चर्चा करेंगे। जाहिर है राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की आपसी संयुक्त समझ के चलते 1954 का राष्ट्रपति का आदेश संविधानसम्मत समझकर पारित किया गया। संविधान संशोधन संबंधी अनुच्छेद 368 के प्रावधान भी जम्मू कश्मीर में परंतुक के साथ लगाए गए कि ऐसा करने में भी जम्मू कश्मीर की विधानसभा से सहमति लेनी आवश्यक होगी।
यह उल्लेखनीय है कि यदि 1954 का उपरोक्त आदेश जो जम्मू कश्मीर की सरकार के जरिए वहां के नागरिकों को विशेष सुविधाएं और अन्य कई तरह के अधिकार देता है तो आज तक किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक पार्टी ने उसकी संवैधानिकता को लेकर सवाल उठाया भी तो क्या हुआ? आशय तो यही हुआ कि उपरोक्त प्रावधान संवैधानिक रूप से चुनौती योग्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट में जब भी यह सवाल उठाया गया तो उसे संवैधानिक दृष्टि से सही माना गया क्योंकि वह एक असाधारण राजनीतिक अपवादात्मक फैसला था जो बहुत संवेदनशील पस्थितियों के रहते लेना पड़ा था। जम्मू कश्मीर संबंधी ‘अस्थायी उपबंध‘ को सुप्रीम कोर्ट ने स्थायी प्रकृति का ही करार दिया।
(13) असल में विवाद की जड़ राष्ट्रपति के उपरोक्त 1954 के विस्तृत आदेश के तहत संविधान के अनुच्छेद 35-। को परिभाषित करने से उत्पन्न हुआ। उसे संविधान के मूल पाठ के अनुच्छेद 35 और 36 के बीच में नहीं लिखा जाकर राष्ट्रपति के उपरोक्त 1954 के आदेश के तहत ही शामिल किया गया है। इसे भी सुप्रीम कोर्ट ने अपवाद समझकर संवैधानिक ही माना है।
संक्षेप में अनुच्छेद 35 । के जरिए जम्मू कश्मीर राज्य में स्थायी निवासियों की परिभाषा का अधिकार राज्य को दिया गया। ऐसे स्थायी निवासियों के पक्ष में निम्नलिखित अधिकार भी दिए गएः-
1. राज्य में नौकरी तथा रोजगार हेतु।
2. राज्य में अचल संपत्ति धारण करने का अधिकार।
3. राज्य में स्थायी रूप से निवास करना।
4. राज्य द्वारा दी जा रही छात्रवृत्तियों सहित अन्य सुविधाओं और सहूलियतों को पाने का अधिकार।
यही वह नाजुक बिन्दु है जिसने भारत के अन्य प्रदेशों के नागरिकों को जम्मू कश्मीर राज्य में उपरोक्त सुविधाओं से पूरी तौर पर वंचित कर दिया गया। इस मुद्दे को लेकर कई बार आलोचना भी हुई हैं लेकिन उपरोक्त प्रावधानों की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान लेने पर राजनीतिक आंदोलनों का कोई अर्थ नहीं रह गया। यह स्थिति अटपटी होने पर भी लगातार कायम तो रही।
जम्मू कश्मीर का संविधान जनवरी 1957 से लागू हुआ। उसके अनुच्छेद 6 में स्थायी नागरिकता का उल्लेख किया गया। उपरोक्त प्रावधान के तहत दो श्रेणियों के स्थायी निवासियों की परिभाषा को संवैधानिक मान्यता दी गई। राष्ट्रपति के उपरोक्त आदेश 1954 से संलग्न कर 20/04/1927 और 27/06/1932 की दो पुरानी अधिसूचनाओं के तहत जिन्हें जम्मू कश्मीर राज्य का निवासी माना गया उसी परिभाषा को बदले बिना उस पर संवैधानिकता की मुहर चस्पा कर दी गई। संक्षेप में जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासियों को ही नौकरी/रोजगार, अचल संपत्ति का अधिग्रहण, राज्य में स्थायी निवास और छात्रवृत्ति सहित राज्य द्वारा दी गई अन्य सहायता मिलेगी। उसका लब्बोलुआब यही था कि जम्मू कश्मीर राज्य में जो भी 1927 और 1932 की अधिसूचनाओं के तहत निवास करता रहता हो उसे ही वहां का स्थायी निवासी माना जाएगा। इनमें जो व्यक्ति महाराजा गुलाब सिंह के कार्यकाल के पहले से रह रहे हों या संवत् 1942 के पहले उन्हें स्थायी नागरिक माना जाएगा। बाद में संवत् 1968 तक भी जो लोग स्थायी निवास करने राज्य में आएं उन्हें भी स्थायी निवासी माना जाएगा। इसी तरह कई और वर्गीकरण किए गए जिन्हें राज्य का स्थायी निवासी उक्त नोटिफिकेशन के तहत माना गया। समस्या की जड़ यही प्रावधान है।
पहली किश्त
(1)भारतीय नेताओं के कारण सियासत का घाव पक गया है और उसमें मवाद भी है। सियासत की हर सांप्रदायिक खखार के जरिए देश के माहौल में हिंसा का बलगम थूका जा रहा है। यह समय बहुत परेशानदिमागी और चुनौतियों के साथ नागरिक खतरे का भी हो रहा है। हर सच को जिबह कर उसे नारों के गर्भगृह में भ्रूण बना दिया जाता है। यदि किसी घटना, निर्णय या तर्क की तटस्थ, उर्वर, बौद्धिक और देशज जांच की जाए तो उस पर नासमझ समर्थकों द्वारा कायिक, बौद्धिक और मानसिक हमले कराए जाते हैं। इसके बावजूद देश है कि उसे रोशनी की तरफ चलना है। घटाटोप अंधेरा अब उसका नहीं है जिसका सूरज दिन के चौबीस घंटे संसार के किसी मुल्क के ऊपर इतराता रहता था। यह खतरा हिन्दुस्तानी खुद उगा रहे हैं। हर समझदार नागरिक और विशेषकर युवा पीढ़ी को अब सभी विचारधाराओं को दरकिनार करके केवल उस राष्ट्रीय फलसफाई पुस्तक संविधान की इबारत को इस तरह समझने की जरूरत है मानो वह दिए या टाॅर्च की रोशनी बल्कि जुगनू की जगमग तो मान ली जाए जिससे अंधेरा छंटे। जम्मू कश्मीर की सत्यनारायण की कथा का पाठ हर उस पार्टी और नेता की आलोचना भी करेगा जिनके हाथ में सत्ता रही है। उनके साथ जिस तरह की मुश्किलें रही हैं उन्हें भी सहानुभूति की समझ के साथ देखना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हिंसा, हुड़दंग, हिकारत और हत्याएं राष्ट्रीय उपलब्धियों की तरह इतिहास की छाती पर टांक दी जाएंगी।
(2)संविधान के अनुच्छेद 370 को भाजपा की केन्द्र सरकार ने संवैधानिक भाषा में आंशिक रूप से खत्म किया है। उसका आधा हिस्सा अर्थात् अनुच्छेद (2) तथा (3) काटकर फेंकने से अनुच्छेद लहूलुहान हो गया है। केन्द्र सरकार का फैसला इतना गोपनीय, आक्रामक और यक-ब-यक हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। ऐसा नहीं भी है क्योंकि जनसंघ के जमाने से भाजपा अपने चुनाव घोषणापत्रों में साफ ऐलान करती रही है कि केन्द्र में उसकी सत्ता होने पर धारा 370 का खात्मा करेगी क्योंकि इसके कारण जम्मू कश्मीर भारत से एक तरह के भावनात्मक अलगाव में रहता आया है। यह तर्क विचित्र और जटिल होने के साथ साथ खारिज नहीं भी कहा जा सकता। मौजूदा लोकसभा में अपने अकेले दम पर आ चुकी भाजपा राष्ट्रीय जनतांत्रिक जमावड़े के लगभग दो तिहाई बहुमत के साथ अपनी पुरानी घोषणा को अमल में लाने का वायदा पूरा नहीं करती तो इतिहास में उसकी जगह सम्मानजनक नहीं बन पाएगी। यह भी है कि सरकार ने संविधान की मर्यादाओं को ताक में रखकर सभी स्टेक होल्डर्स से बात तक नहीं की। संभवतः संघ परिवार के अंतःपुर में फैसला किया गया होगा। राजग के घटक दलों से भी या तो परामर्श नहीं हुआ या इतना गुपचुप और गोपनीय हुआ कि उनमें से कुछ घटकों पर पहले से भाजपा को अविश्वास रहा होगा। कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां तो केवल कुछ सूंघती ही रहीं। उनके नेताओं को पहले घर पर नजरबंद किया गया और बाद में गिरफ्तार भी।
(3)फैसले की सोची समझी प्रचारित अनुकूल धमक पूरे देश में है। जनता तो क्या कानून के कई विद्यार्थियों और वकीलों को भी कश्मीर संबंधी प्रावधानों की संवैधानिकता, ऐतिहासिकता सामाजिकता और सामासिकता की ठीक ठीक जानकारी नहीं है। अंगरेजी फिल्में देखती अधपकी समझ के भारतीय सिनेमाई दर्शक बीच बीच में तालियां बजाने लगते हैं या हंसने लगते हैं। उसी तरह नागरिक संचार माध्यमों से लेकर सड़कों तक, गोष्ठियों से लेकर सभाओं तक इस फैसले की लोकप्रिय पीठ थपथपा रहे होंगे। जम्मू कश्मीर समस्या देश से एक कठिन जिरह मांगती रही है। अंतहीन बहस का सिलसिला अभी भी कायम रहेगा। यह यात्रा कवि धूमिल को याद करते उलटबांसी में संसद से सड़क की ओर चल पड़ी है। कोई इस मामले को गंभीर तटस्थता से समझना चाहेगा तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और इस्लामी कठमुल्लापन की तरफ से उसके लिए देशद्रोही या तनखैया का नकाब उनकी फैक्ट्री में पहले से तैयार रहता है। इसके साथ साथ जम्मू कश्मीर पर हमला करने वाले पाकिस्तानी कबाइली आतंकवादियों से लेकर आज तक उस प्रदेश के हिंसक अलगाववादियों और पाक-परस्तों को भी कोई सच्चा भारतीय क्यों बख्शे? अनुच्छेद 370 उनके नापाक इरादों और हिन्दुस्तान के खिलाफ नफरत, हिंसा, खूंरेजी, संदिग्ध मुसलमानियत और जम्मू कश्मीर की जनता की भावना के साथ क्षेत्रीय, हिंसक, जातीय और सांप्रदायिक हरकतों के कारण संदेहजनक तो रहा है।
(4)जम्मू कश्मीर से संबंधित संववैधानिक प्रावधान शामिल करने की कवायद में भारत के विभाजन की दर्दनाक पृष्ठभूमि की अनदेखी नहीं की जा सकती। तफसील या तथ्यपरकता के चोचले में जाए बिना मोटे तौर पर यह तय है कि मुस्लिमपरस्ती और हिन्दूपरस्ती की भावनाओं के अतिरिक्त स्वतंत्रता संग्राम से उत्पन्न भारतीय राष्ट्रवाद और देसी राजाओं की अपनी निजी आजादी और स्वायत्तता के दलदल में अंगरेज ने कूटनीतिक चालों के अपने मोहरे चले। मुस्लिम बहुल इलाके पाकिस्तान में चले गए। गुजरात के जूनागढ़ का इलाका जनमत संग्रह तथा नेहरू, पटेल, वीपी मेनन वगैरह के कारण बचा। लगभग साढ़े पांच सौ देसी रियासतें इन्हीं नेताओं के कारण भारत संघ में शामिल होने के लिए स्वेच्छा या अनमने ढंग से ही सही तैयार हो गईं।
(5)भाजपा की एक और सायास तुरुप चाल है। वह भारत के इतिहास में स्वतंत्र भारत के नंबर 2 बेताज बादशाह सरदार पटेल को एकमात्र, सबसे बड़ा और अपराजेय नायक बनाने पर तुली रहती है। पटेल को एकछत्र नेता स्वीकार करते नेहरू की भत्सना करना जनसंघ के दिनों से भाजपा का जिद्दी एजेंडा चला आ रहा है। इतिहास का सच है कि सरदार पटेल ने शुरुआत में ऐसी अपुष्ट इच्छा व्यक्त की थी कि झगड़े का अंत करने कश्मीर का कुछ हिस्सा पाकिस्तान को दे दिया जाए। यह उनका राजनीतिक फलसफा नहीं था। इतिहास में वैकल्पिक, कामचलाऊ और समझौतापरक कच्चे उल्लेख नेता करते रहते हैं। चट्टानी दृढ़ता के सरदार पटेल ने ही अपने नेतृत्व के कारण देसी रियासतों का भारत संघ में विलीनीकरण कराया। नेहरू-पटेल युति ने आपसी विचार विमर्श के बाद कश्मीर पर एक राय कायम की। उसके बाद वह संविधान सभा के अनुच्छेद 306 (ख) (बाद में 370) के अनुसार सर्वसम्मति से दर्ज हुआ। बहुत महत्वपूर्ण है कि संविधान सभा में डाॅ. अंबेडकर, जनसंघ के बाद में हुए संस्थापक हिन्दू महासभा के डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी और बाद में हुए अध्यक्ष आचार्य रघुवीर भी बिना विरोध किए बैठे थे।
(6)संक्षेप में किस्सा यह है। 1947 में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के डोगरा राजा हरिसिंह के सामने पाकिस्तान या हिन्दुस्तान में शामिल हो जाने या आजाद बने रहने के विकल्प थे। अधिकांश देसी रियासतों की तरह हरिसिंह के मन में भी आजाद बने रहने की खामखयाली के प्रमाण मिलते हैं। कुछ उग्र तथा इस्लामी कट्टरता के समर्थक पाकिस्तान के साथ मिलना चाहते रहे होंगे। हिन्दू और कई राष्ट्रवादी मुसलमान, जिनमें शेख अब्दुल्ला का भी नेतृत्व प्राप्त रहा होगा, भारत संघ में शामिल होने के पक्षधर बताए जाते हैं। दोनों के बीच राजा हरिसिंह की जम्मू कश्मीर को आजाद रखने की कुलबुलाहट इतिहास का मरा हुआ सच नहीं है। उन्होंने इस संबंध में 12 अगस्त 1947 के लिखे पत्र में भी यही इरादा बताया था। अचानक 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान की तरफ से आए कबाइली आदिवासियों वगैरह ने कश्मीर घाटी पर घातक हमला किया। कुछ हिस्सा उनके कब्जे में चला गया (जो आज तक है) उसे पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है। महाराजा के सेना प्रमुख ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह कुछ सैकड़ा वफादार सैनिकों के साथ हमलावरों से चार दिनों तक जूझते रहे। उनकी शहादत के कारण उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा
दूसरी किश्त
लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा
दूसरी किश्त
(7) गवर्नर जनरल को अपने पत्र दिनांक 26/10/1947 द्वारा महाराजा हरिसिंह ने भारत संघ में शामिल होने का प्रस्ताव भेजा। गवर्नर जनरल ने उसे दूसरे ही दिन कुछ शर्तों के साथ स्वीकार कर लिया। 23 अक्टूबर 1947 से 26 अक्टूबर तक चार दिनों की ऊहापोह में महाराजा हरिसिंह को यही इकलौता सम्मानजनक विकल्प सूझा कि भारत से तत्काल सैनिक सहायता मांगें। भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत यह तब संभव था, जब जम्मू कश्मीर से उसका रिश्ता विधिपूर्ण हो। हड़बड़ी में एक विलेख का प्रारूप तैयार किया गया जिसे अधिमिलन विलेख या Istrument of Accession कहा गया। पहले से कुछ हिस्सा चीन तथा कुछ पाकिस्तान के कब्जे में होने और कुछ को भारत ले जाते सोचते हरिसिंह के पास वक्त नहीं था। लिहाजा तय हुआ प्रतिरक्षा, संचार और विदेशी मामलों के लिए भारत संघ की संवैधानिक जिम्मेदार होगी। बाकी केंद्रीय सरकार के अधिकार जम्मू कश्मीर की हुकूमत के हवाले होंगे। 5 मार्च 1948 को महाराजा ने उत्तरदायी मंत्रिपरिषद स्थापित करते हुए उसे जिम्मेदारी सौंपी कि वह राष्ट्रीय असेम्बली का गठन कर जम्मू कश्मीर के लिए वयस्क मताधिकार के आधार पर राज्य का संविधान बनाए।
(8) अनुच्छेद 370 के इतिहास को सही संदर्भों में समझना बहुत आवश्यक है। कश्मीर का भारत में होने जा रहा विलय एक पेचीदा प्रश्न था। 26 अक्टूबर 1947 को भारत की संविधान सभा कार्यरत थी। इसके साथ साथ आजाद भारत का मंत्रिमंडल भी गठित हो चुका था। संविधान सभा की कार्यवाही में डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्षता करते थे। मंत्रिपरिषद के कार्यसंचालन में प्रधानमंत्री नेहरू के तहत वे कृषि मंत्री रहे थे। जम्मू कश्मीर के मसले को भारी ऊहापोह, अनिश्चय, मतभेद और फिर अंततः संयुक्त जिम्मेदारी के तहत मुकाम पर पहुंचाया गया। यह कार्यवाहियों में मौजूद है कि प्रधानमंत्री नेहरू के साथ डाॅ. अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल और श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी अन्य सदस्यों के अतिरिक्त समय समय पर गुफ्तगू में शामिल रहे।
कई कारणों से आखिरकार एक महत्वपूर्ण सदस्य एन. गोपालस्वामी आयंगर को अनुच्छेद 370 का प्रारूप संविधान सभा में पेश करने के लिए राजी किया गया। आज कहने में उत्तेजक लगता है मानो सब कुछ जवाहरलाल नेहरू ने किया। लेकिन जिस तरह मतभेदों के बावजूद स्वस्थ प्रजातांत्रिक प्रक्रिया अपनाते हुए हमारे कालजयी संविधान निर्माताओं ने मतभेद और सहमति के बीच बार बार और लगातार स्पेस ढूंढ़ा वह आज की संसद में कहां है? इतिहास के किसी कालखंड में क्यों और कैसा निर्णय हुआ उसकी बारीकियों, विवशताओं और शंकाओं को समझे बिना बाद की पीढ़ी फतवा दे सकती है। लेकिन आत्मावलोकन नहीं करती कि उससे कुछ भी करते धरते कितना बन रहा है।
कश्मीर जैसा महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान बिना किसी खास बहस के सदस्यों की सर्वसम्मति से (जिनमें हिन्दू महासभा के सदस्य भी शामिल थे) केवल सदस्य एन0 गोपालस्वामी आयंगार ने लंबा भाषण देकर सदस्यों को जम्मू कश्मीर की अजीबोगरीब परिस्थितियों से वाकिफ और आश्वस्त करते हुए अनुच्छेद 370 (तब 306 (क) पारित करा लिया।
उनके भाषण के कुछ मुख्य अंशों को समझना बहुत आवश्यक हैः-
‘‘यह राज्य भारत संघ में आ गया है। प्रवेश 26 अक्तूबर 1947 को हुआ। उस वक्त से राज्य का उतार चढ़ाव वाला इतिहास रहा है। इस अधिमिलन का अर्थ है कि अब वह राज्य फेडरल राज्य अर्थात् भारत डोमिनियन की इकाई है। भारत गणतंत्र में परिवर्तित होने जा रहा है जिसका उद्घाटन 26 जनवरी 1950 को होगा। इसलिए जम्मू और कश्मीर राज्य को भारत गणराज्य की इकाई होना ही है।‘‘
‘‘इस वर्ष के शुरू में युद्ध बन्द करना तय हो चुका था और युद्ध अभी तक बन्द है। लेकिन अभी भी राज्य की हालत असामान्य तथा उथलपुथल की लगती है। अभी शान्ति नहीं हुई है। इसलिए यह जरूरी है कि राज्य के प्रशासन का संचालन तब तक इन असामान्य परिस्थितियों के संदर्भ में ही चलाया जाये जब तक वैसी शान्ति स्थापित नहीं हो जाए जो अन्य राज्यों में है।‘‘
‘‘भारत सरकार कुछ बातों के लिए कश्मीर की जनता के प्रति वचनबद्ध है। उसने स्वयं वचन दे रखा है कि राज्य की जनता को यह निश्चित करने का अवसर दिया जायेगा कि वह भारत गणराज्य के साथ रहना चाहती है या उससे बाहर जाना चाहती है। जनमत द्वारा जनता की इस इच्छा को मालूम करने के लिये भी हम वचन दे चुके हैं बशर्ते कि शान्ति का माहौल स्थापित हो जाये और निष्पक्ष जनमत की गारंटी की जा सके। हमने यह भी मान लिया है कि एक संविधान सभा द्वारा जनता की इच्छा से राज्य का संविधान निश्चित किया जायेगा तथा राज्य पर संघ के क्षेत्राधिकार की सीमा भी निश्चित की जायेगी।‘‘
‘‘इस अनुच्छेद का दूसरा भाग जम्मू और कश्मीर राज्य पर संसद् की विधायी शक्ति से सम्बद्ध है। यह मुख्यतया अधिमिलन लेख द्वारा परिमार्जित है। मोटे तौर पर वह विधायी शक्ति प्रतिरक्षा, विदेशी विषय और संचार के तीन विषयों तक सीमित है। लेकिन वास्तव में इन तीन विषयों में ही व्यापक तौर पर कुछ ऐसे मद सम्मिलित हैं जो अधिमिलन विलेख में उल्लिखित हैं।‘‘
‘‘इसके बाद स्पष्टीकरण है जिसमें परिभाषित किया गया है कि ‘राज्य की सरकार‘ से क्या अर्थ है। राज्य का संविधान जो इस समय जम्मू और कश्मीर में लागू है तथा वह उद्घोषणा भी जिसे महाराजा ने 5 मार्च 1947 को जारी किया। दोनों में राज्य की सरकार की परिभाषा की गई है। उद्घोषणा की जो शर्तें राज्य के संविधान के उपबन्धों से असंगत हैं वहां तक वैध या प्रभावशील तो मानी जायेंगी। इसी कारण इस स्पष्टीकरण में उद्घोषणा का हवाला दिया गया है। इस उद्घोषणा के तहत ही महाराजा ने एक अन्तरिम लोकप्रिय सरकार का गठन किया है।‘‘
कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने यह स्पष्ट किया है कि जनमत संग्रह का प्रस्ताव नेहरू की तरफ से नहीं भेजा गया था। बल्कि उसे गवर्नर जनरल माउंट बेटन ने कुछ शर्तों के साथ प्रस्तावित किया था। उन शर्तों में यह शामिल था कि भारत और पाकिस्तान की ओर से जम्मू कश्मीर के खिलाफ सैनिक ताकत का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। यदि पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर हमला किया इस कारण जनमत संग्रह का सवाल संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यवाहियों से अपने आप काफूर हो गया।
(9) 370 जम्मू कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध-(1) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,- (क) अनुच्छेद 238 के उपबंध जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में लागू नहीं होंगे,(ख) उक्त राज्य के लिए विधि बनाने की संसद् की शक्ति,- 1) संघ सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित होगी जिनको राष्ट्रपति, उस राज्य की सरकार से परामर्श करके, उन विषयों के तत्स्थानी विषय घोषित कर दे जो भारत डोमिनियम में उस राज्य के अधिमिलन को शामिल करने वाले अधिमिलन पत्र में ऐसे विषयों के रूप में विर्निदिष्ट है जिनके संबंध में डोमिनियन विधान-मंडल उस राज्य के लिए विधि बना सकता है,
(2) उक्त सूचियों के उन अन्य विषयों तक सीमित होगी, जो राष्ट्रपति, उस राज्य की सरकार की सहमति से, आदेष द्वारा, विनिर्दिष्ट करे। (ग) अनुच्छेद 1 और इस अनुच्छेद के उपबंध उस राज्य के संबंध में लागू होंगे, (घ) इस संविधान के ऐसे अन्य उपबंध ऐसे अपवादों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए, जो राष्ट्रपति आदेष द्वारा विनिर्दिष्ट करें, उस राज्य के संबंध में लागू होंगे,
परन्तु ऐसा कोई आदेश जो उपखंड (ख) के पैरा (प) में निर्दिष्ट राज्य के अधिमिलन पत्र में विनिर्दिष्ट विषयों से संबंधित है, उस राज्य की सरकार से परामर्ष करके ही किया जाएगा, अन्यथा नहींः परन्तु यह और कि ऐसा कोई आदेश जो अंतिम पूर्ववर्ती परंतुक में निर्दिष्ट विषयों से भिन्न विषयों से संबंधित है, उस सरकार की सहमति से ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं। (2) यदि खंड (1) के उपखंड (ख) के पैरा (3) में या उस खंड के उपखंड (घ) के दूसरे परंतुक में निर्दिष्ट उस राज्य की सरकार की सहमति, उस राज्य का संविधान बनाने के प्रयोजन के लिए संविधान सभा के बुलाए जाने से पहले दी जाए तो उसे ऐसे संविधान सभा के समक्ष ऐसे विनिश्चय के लिए रखा जाएगा जो वह उस पर करे। (3) इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेगा कि यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा या ऐसे अपवादों और उपांतरणों सहित ही और ऐसी तारीख से, प्रवर्तन में रहेगा, जो वह विनिर्दिष्ट करेः परन्तु राष्ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना निकाले जाने से पहले खंड (2) में निर्दिष्ट उस राज्य की संविधान सभा की सिफारिष आवश्यक होगी।
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लहूलुहान अनुच्छेद 370 की कश्मीर व्यथा कथा
तीसरी किश्त
(10) महाराजा हरिसिंह द्वारा दिनांक 25/11/1949 को युवराज कर्णसिंह को सभी उत्तराधिकार सौंप दिए। कर्णसिंह ने ही दिनांक 25/11/1949 को उद्घोषणा जारी की कि राज्य की विधानसभा द्वारा भारत के संविधान को उस हद तक अंगीकृत किया जाए जो जम्मू कश्मीर राज्य के लिए स्वीकार किया गया है। यही कारण है संविधान सभा ने सातवीं अनुसूची में केन्द्र को 97, राज्य को 66 और समवर्ती सूची को 47 विषय सौंपे। अंततः दिनांक 26 नंवबर 1949 को सभा की कार्यवाही के आखिरी दिन वह तय हो सका। इन तीनों सूचियों के विषयों को देसी रियासतों को दिखाकर उनका समर्थन लिया गया। जिस दिन 25 नवंबर 1949 को महाराजा हरिसिंह ने समर्थन दिया। उसी दिन संविधान सभा में अनुच्छेद सातवीं अनूसूची को पारित किया गया। भारत का संविधान 26/11/1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत किया गया। उसके तहत जम्मू कश्मीर संबंधी उपरोक्त उद्घोषणा भी समाहित हो गई। भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ। उसी दिन भारत के राष्ट्रपति ने संविधान (जम्मू कश्मीर पर लागू) आदेश 1950 जारी किया। दिनांक 20/04/1951 को महाराजा ने फिर उद्घोषणा जारी की जिसके अनुसरण में दिनांक 05/11/1951 को जम्मू कश्मीर की संविधान सभा गठित हुई। दिनांक 05/06/1952 को संविधान सभा ने कुछ आधाभूत सिद्धांत गढ़े जिनके संदर्भ में जम्मू कश्मीर का संविधान निर्मित किया जाना था। यह महत्वपूर्ण है कि आधारभूत सिद्धांतों में राज्य के प्रमुख का विधानसभा द्वारा 5 वर्षों या दुबारा निर्वाचन के जरिए प्रावधान किया गया। राज्य प्रमुख का नामकरण सदरे-रियासत किया गया। ऐसा प्रावधान भारत के संविधान में नहीं है। राज्यों के राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा बिना किसी चुनाव प्रक्रिया के नियुक्त किए जाते हैं।
(11) 1949 के अंत तक शेख अब्दुल्ला मंत्रिमंडल के दबाव के कारण महाराजा हरिसिंह को अपने सभी प्रशासनिक और संवैधानिक उत्तरदायित्व अपने पुत्र युवराज कर्णसिंह को सौंपने पड़े। जम्मू कश्मीर विधान सभा द्वारा उन्हें राज्य प्रमुख के रूप में बाकायदा दिनांक 31/10/1951 को सदरे-रियासत के नाम से निर्वाचित किया गया। उसी दिन जम्मू कश्मीर में सामंतवादी शासन का औपचारिक अंत होकर राज्य सत्ता निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में आ गई। भारत सरकार ने अपनी उद्घोषणा दिनांक 15/11/1952 को राष्ट्रपति द्वारा दिए गए अनुच्छेद 370 (3) के तहत आदेश द्वारा इस स्थिति को संवैधानिक मंजूरी दी। जून 1952 में ही शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में राज्य और केन्द्र के बीच 10 सूत्रीय करार दिल्ली में भी हुआ। उसका मकसद था राज्य की संविधान सभा के अनुमोदन से केन्द्र के कितने अधिकार जम्मू कश्मीर पर लागू किए जा सकते हैं। सदरे-रियासत को भी बाकी राज्यों के राज्यपाल के समकक्ष माना गया। इसी बीच राज्य के सामने आ रही कई कठिनाइयों, चुनौतियों और मतभेदों के चलते सदरे-रियासत ने शेख अब्दुल्ला का मंत्रिमंडल दिनांक 08/08/1953 को अक्षमता और जनअविश्वास के आरोप लगाकर बर्खास्त कर दिया। वहां बख्शी गुलाम मोहम्मद के नेतृत्व की कठपुतली सरकार स्थापित हुई। वह 10 वर्षों तक भ्रष्टाचार के आरोपों सहित किसी तरह चलती रही। जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने भारत में अधिमिलन तथा दिल्ली में हुए करार को संवैधानिक रूप से फरवरी 1954 में पुष्ट किया।
(12) असल विवाद की जड़ भारत के राष्ट्रपति के आदेश दिनांक 14/05/1954 में है। अनुच्छेद 370 (1) के तहत राष्ट्रपति के पुराने आदेश 1950 को निरसित करते हुए संविधान (जम्मू कश्मीर पर लागू) आदेश 1954 बनाया गया। इस आदेश के जरिए भारत के संविधान के कई हिस्से जम्मू कश्मीर पर लागू किए गए। इसमें विवादित अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन संबंधी भी था। उसमें परंतुक लगाया गया कि वह जम्मू कश्मीर राज्य पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक वह अनुच्छेद 370 (1) के तहत लागू नहीं हो। दिनांक 17/11/1956 को जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने राज्य का संविधान अंगीकृत किया। उसके शेष हिस्से दिनांक 01/01/1957 को लागू किए गए। राष्ट्रपति का 1954 का आदेश बाद में 1958, 1959, 1960, 1964, 1967 और 1971 के बाद भी राज्य सरकार की सलाह से संशोधित होता रहा। इस कवायद का मुख्य मकसद और असर भारत के संविधान के प्रावधानों को ज्यादा से ज्यादा जम्मू कश्मीर पर लागू करने से था। वह मोटे तौर पर होता भी रहा।
राष्ट्रपति के 1954 के आदेश के जरिए कुछ अपवादों को छोड़कर केन्द्र के लगभग सभी क्षेत्राधिकार जम्मू कश्मीर पर लागू किए गए। केवल राज्य की संविधान सभा द्वारा जम्मूू कश्मीर का जो संविधान बनाया जाना था वह राज्य के हवाले छोड़ दिया गया। यह महत्वपूर्ण है कि 1954 के राष्ट्रपति के आदेश ने भारत सरकार और जम्मू कश्मीर के बीच किए गए करारों और वायदों को जस का तस रखा। वैसे तो भारत के अन्य राज्यों के भी संविधान बनाए गए थे। उन्हें भारत के संविधान में अनुकूलन के जरिए समाहित कर लिया गया। विशेष तथा विषम स्थितियों के चलते जम्मू कश्मीर को अधिकार दिया गया कि वह अपनी संविधान सभा द्वारा राज्य के अधिकारों के लिए एक आंतरिक संविधान की रचना करे। जम्मू कश्मीर के संविधान के बन जाने का फलितार्थ हुआ कि भारत के संविधान के भाग 6 में दिनांक 01/11/1956 के सातवें संशोधन के कारण अनुच्छेद 152 में यह उल्लेख किया गयाः-152. परिभाषा-इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, ‘‘राज्य‘‘ पद के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य नहीं है।‘‘
संविधान के अध्यापक डाॅ. डी.के. दुबे एक दिलचस्प बात कहते हैं। जब 1954 के राष्ट्रपति के प्रस्तावित आदेश का प्रारूप डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद को दिया गया तो उन्होंने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नेहरू से पूछा कि क्या ऐसा आदेश राष्ट्रपति के द्वारा संवैधानिक रूप से किया जा सकता है। नेहरू ने भी लिखित में उत्तर दिया और उसमें लिखा कि इस संबंध में वे मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए राष्ट्रपति से अनौपचारिक चर्चा करेंगे। जाहिर है राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की आपसी संयुक्त समझ के चलते 1954 का राष्ट्रपति का आदेश संविधानसम्मत समझकर पारित किया गया। संविधान संशोधन संबंधी अनुच्छेद 368 के प्रावधान भी जम्मू कश्मीर में परंतुक के साथ लगाए गए कि ऐसा करने में भी जम्मू कश्मीर की विधानसभा से सहमति लेनी आवश्यक होगी।
यह उल्लेखनीय है कि यदि 1954 का उपरोक्त आदेश जो जम्मू कश्मीर की सरकार के जरिए वहां के नागरिकों को विशेष सुविधाएं और अन्य कई तरह के अधिकार देता है तो आज तक किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक पार्टी ने उसकी संवैधानिकता को लेकर सवाल उठाया भी तो क्या हुआ? आशय तो यही हुआ कि उपरोक्त प्रावधान संवैधानिक रूप से चुनौती योग्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट में जब भी यह सवाल उठाया गया तो उसे संवैधानिक दृष्टि से सही माना गया क्योंकि वह एक असाधारण राजनीतिक अपवादात्मक फैसला था जो बहुत संवेदनशील पस्थितियों के रहते लेना पड़ा था। जम्मू कश्मीर संबंधी ‘अस्थायी उपबंध‘ को सुप्रीम कोर्ट ने स्थायी प्रकृति का ही करार दिया।
(13) असल में विवाद की जड़ राष्ट्रपति के उपरोक्त 1954 के विस्तृत आदेश के तहत संविधान के अनुच्छेद 35-। को परिभाषित करने से उत्पन्न हुआ। उसे संविधान के मूल पाठ के अनुच्छेद 35 और 36 के बीच में नहीं लिखा जाकर राष्ट्रपति के उपरोक्त 1954 के आदेश के तहत ही शामिल किया गया है। इसे भी सुप्रीम कोर्ट ने अपवाद समझकर संवैधानिक ही माना है।
संक्षेप में अनुच्छेद 35 । के जरिए जम्मू कश्मीर राज्य में स्थायी निवासियों की परिभाषा का अधिकार राज्य को दिया गया। ऐसे स्थायी निवासियों के पक्ष में निम्नलिखित अधिकार भी दिए गएः-
1. राज्य में नौकरी तथा रोजगार हेतु।
2. राज्य में अचल संपत्ति धारण करने का अधिकार।
3. राज्य में स्थायी रूप से निवास करना।
4. राज्य द्वारा दी जा रही छात्रवृत्तियों सहित अन्य सुविधाओं और सहूलियतों को पाने का अधिकार।
यही वह नाजुक बिन्दु है जिसने भारत के अन्य प्रदेशों के नागरिकों को जम्मू कश्मीर राज्य में उपरोक्त सुविधाओं से पूरी तौर पर वंचित कर दिया गया। इस मुद्दे को लेकर कई बार आलोचना भी हुई हैं लेकिन उपरोक्त प्रावधानों की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान लेने पर राजनीतिक आंदोलनों का कोई अर्थ नहीं रह गया। यह स्थिति अटपटी होने पर भी लगातार कायम तो रही।
जम्मू कश्मीर का संविधान जनवरी 1957 से लागू हुआ। उसके अनुच्छेद 6 में स्थायी नागरिकता का उल्लेख किया गया। उपरोक्त प्रावधान के तहत दो श्रेणियों के स्थायी निवासियों की परिभाषा को संवैधानिक मान्यता दी गई। राष्ट्रपति के उपरोक्त आदेश 1954 से संलग्न कर 20/04/1927 और 27/06/1932 की दो पुरानी अधिसूचनाओं के तहत जिन्हें जम्मू कश्मीर राज्य का निवासी माना गया उसी परिभाषा को बदले बिना उस पर संवैधानिकता की मुहर चस्पा कर दी गई। संक्षेप में जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासियों को ही नौकरी/रोजगार, अचल संपत्ति का अधिग्रहण, राज्य में स्थायी निवास और छात्रवृत्ति सहित राज्य द्वारा दी गई अन्य सहायता मिलेगी। उसका लब्बोलुआब यही था कि जम्मू कश्मीर राज्य में जो भी 1927 और 1932 की अधिसूचनाओं के तहत निवास करता रहता हो उसे ही वहां का स्थायी निवासी माना जाएगा। इनमें जो व्यक्ति महाराजा गुलाब सिंह के कार्यकाल के पहले से रह रहे हों या संवत् 1942 के पहले उन्हें स्थायी नागरिक माना जाएगा। बाद में संवत् 1968 तक भी जो लोग स्थायी निवास करने राज्य में आएं उन्हें भी स्थायी निवासी माना जाएगा। इसी तरह कई और वर्गीकरण किए गए जिन्हें राज्य का स्थायी निवासी उक्त नोटिफिकेशन के तहत माना गया। समस्या की जड़ यही प्रावधान है।
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