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मांझी का नाव नहीं डूबता मतलब बिहार की नैया को पार लगाने जीतन करेंगे जतन

बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि मांझी का कभी नाव नहीं डूबता। उनकी यह बात कितनी सही हो सकती है यह तो वक्त ही बतलाएगा, लेकिन अभी जो स्थिति है वह तो ऐसा लगता है कि उनका कहना सच हो सकता है। खासकर इससे कि वे खुद दिल्ली पहुंचकर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलना चाह रहे हैं। इस बात को लेकर नरेंद्र मोदी को भी उस वक्त का इंतेजार रहेगा। जब वे नितीश के मांझी से मिलेंगे, क्योंकि 20 मई 2014 को जब जीतन राम मांझी ने बिहार का पतवार थाम्हा था, उस समय यह बात निकलकर आई थी कि मांझी जैसे राम की नाव को खेया था उसी तरह जीतन राम मांझी नितीश के नाव को पार लगा देंगे। वर्तमान में जो स्थिति बनी है वह तो नितीश को मजधार में डूबाने वाला है, क्योंकि बीच मजधार में नितीश ने पतवार थाम्हे मांझी को ऐसा तमाचा मारा है कि वे अब नैया को वहीं डूबाने के लिए नाव में छेद कर खूद नदी में कूद तैरकर पार करने निकल पड़े हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि नितीश नाव में पानी भरने से पहले नाव को किनारे पर ले आते है या फिर बीच में हीं डूब जाएगे। दूसरी तरफ यह भी देखना होगा कि नदी में कूदे मांझी क्या नदी के किनारे पहुंचते है...

घर वापसी में जगह के लिए सवा लखी है ना

हिंदू धर्म में मुस्लिम और इसाई घर वापसी पर उठाए जा रहे सवाल कि वे घर वापसी करेंगे तो कहां रहेंगे उनके लिए क्या स्थान होगा। इसके जवाब कुछ हिंदू वादी कहते हैं कि हिंदू में तीन, तेरह और सवा लखी का प्रचलन है। हिंदूओं में 3 और 13 पहले से बुक है पर सवा लखी एक मात्र ऐसा स्थान है जहां उन्हें जगह मिल सकती है। अर्थात वे मन परिवर्तन होने पर धर्म परिवर्तन करने वाले मुसलमानों और इसाई के लिए यह जगह महफूज होगी। लोगों ने चर्चा और बहस के बीच इसे हिंदूवाद के डर से या सरकार के भय से किया जाने वाला काम नहीं मानते बल्कि स्वयं का लाभ मान रहे हैं। जो हिंदू बन रहे है उन्हें ही लाभ होगा। यह मानना है कुछ सेक्यूलर कहे जाने वाले लोगों का। बड़ी बहस कर लोग इसे सही मानते हैं। क्या है सवा लखी -  सवा लखी उसे मानते है जो तीन अर्थात पहले तीन और तेरह की पक्ति से अलग हो। इसमें पहले तीन को श्रेष्ट और उससे 13 को कम श्रेष्ठ माना जाता है वहीं सवा लखी को सामान्य माना जाता है। इन पर हिंदू धर्म का ज्यादा नियम लागू नहीं होता। यह ‌वैसा ही होता है जैसे समान्य होते है।

देश के मंत्रीयों ने अपनी मां को रखा है गिरवी मोबाइल कंपनी के मालिकों के पास

लूट मचा दी बेशर्म मोबाइल नेटवर्क कंपनियों ने  नया साल क्या आया डोकोमो, रिलायंस जैसे कई कंपनियों ने लूट मचा दी। हरामखोरी की भी हद होती है। इन हरामखोर कंपनियों ने पहले एसएमएस का चार्ज 31 और 1 जनवरी के लिए टेरिफ प्लान को कैंसिल किया और भारत की हिजरी सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो कुत्ती नियमों के आधार पर हरामखोरई शुरु कर दिया। इन मा.... ने तो हद अब कर दी की कॉल पर भी टेरिफ प्लान कैंसिल कर दिया। क्या गुंडा गर्दी है। हराम खोर सरकार के मंत्री क्या अपनी मां को इन कंपनियों के मालिकों के पास गिरवी रख दिए हैं। पब्लिक ने वोट देकर सरकार बनाई है। सेवा के नामपर मां...... रखें हैं। कंपनियां तो ऐसा मैसेज भेजती जैसे अपने बाप को भेज रही हैं। इन मादर..... कंपनियों की ऐसी कि तैसी करने नक्सली ही ठीक करते हैं. उनका समर्थन होना चाहिए। ऐसी सरकार से अच्छी तो नक्सलवादी है कंपनियों के टावर उड़ाकर जो इनकी मां..... है वह ही सही है। साले लोग गां..... मारकर रख दिए है। नेटवर्क क्या दे रहे है जैसे पुरी इनके बाप का हो गया। 

New Year: यह कैसा नया साल

लोग उत्साहित कैसे हो सकते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले तो 150 से ज्यादा बच्चों का कत्लेआम हुआ है। अभी कल ही तो मलेशियाई विमान का पता चला है। इसमें 162 लोगों की मौत हुई है। दुनिया गम में डूबा है हम कैसे नए साल का जश्न मना सकते हैं। क्या इस दुनिया से हम अलग है। अगर हां तो किस तरह। भारत के वैसे तो हिंदूवादी लोग किसी भी चीज का विरोध करने लगते हैं। अब इस नए वर्ष पर कहां गए। लाखों करोड़ों के पटाखे फोड़ दिए गए। करोड़ों रुपए खर्च कर डीजे, पब और न जाने कहां कहां पार्टी तैयार की गई है। लोग पुरी रात आज शराब के नशे में नाचेंगे। इसमें शामिल ज्यादातर तथा कथित हिंदूवादी के बच्चे ही होते हैं। कहने को तो कुछ भी कह दें। दिखावे में जीने की आदत हो गई है हिंदूस्तानियों की। अगर ऐसा नहीं है तो नए वर्ष का विरोध कर दिखाएं। पीके का तो बहुत विरोध किया वेलेनटाइन डे का भी बहुत विरोध करते हो। अब कहां गए। अजी कहना बहुत आसान है करना कठीन। वेलेनटाइन डे का विरोध इसलिए कर लेते हो क्योंकि भारत की कुत्ती संस्कृति आपको सह देती है वरना जिस दिन आप इसका विरोध करो और उसी समय कोई बंदूक चला दे दो चार लोगों को कुत्ते की तरह सड़क पर मारक...

पत्रकारों को भी फायदा होगा केंद्र सरकार के मासिक वेतन नियम से

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केंद्र सरकार देश के औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रों में राष्ट्रीय मासिक वेतन 15,000 रुपए करने की तैयारी में है। राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के तहत 45 तरह की आर्थिक गतिविधियों को इस एक्ट में सूचीबद्ध किया गया और इसी एक्ट को राज्यों में भी लागू किया गया। हालांकि राज्य 16 सौ प्रकार के आर्थिक गतिविधियों को इस एक्ट के तहत ला सकती हैं। केंद्रीय श्रम मंत्रालय इसके लिए जल्द ही सभी राज्यों की बैठक बुलाने वाला है। इस एक्ट में संशोधन के लिए सभी राज्यों की राय जानी जाएगी।वहीं एक इंटर मिनिस्ट्रियल कमिटी इस पर पहले से ही काम कर रही है।इसमें संशोधन के बाद सभी श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतनमान तय कर दिया जाएगा, जिसे सभी राज्यों को लागू करना होगा। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने श्रम मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव अरुण कुमार सिन्हा का बयान प्रकाशित किया है। इसमें सिन्हा ने कहा ‘‘न्यूनतम वेतनमान अधिनियम में संशोधन कर इसमें एक प्रावधान जोड़ा जाएगा जिसके तहत राष्ट्रीय दर राज्यों के लिए भी जरूरी होंगे। अब तक यह राज्यों के लिए सलाह तक ही सीमित थे लेकिन अब इनका पालन आवश्यक कर दिया ज...

कल कुछ बस्ते घर नहीं आए

कल कुछ बस्ते घर नहीं आए कल कुछ बस्ते स्कूल नहीं जाएंगे... यह लेख उन बच्चों के लिए है जो पेशावर स्कूल में हुए आतंकी हमले में मारे गए। पाकिस्तान में जिस तरह से बच्चों पर हमला हुआ इससे यह पता चलता है कि वहां अब मानवता नहीं बची। ना तो देश की सरकार में और ना ही वहां के सैनिकों में आतंक फैलाने वाले लोगों की तो जमीर ही मर गई है। हलांकि यह सच है आज नहीं कल ऐ बच्चे भारत और आस पास के देशों के लिए सर दर्द बनकर उभरते। माफ किजीएगा जो हालात पाकिस्तान ने बनाया है दुनिया में उससे यह अंदाजा लगाना मेरा गलत नहीं है। पाकिस्तान के 100 लोगों का सर्वे करा कर देख लें, 100 घरों की तलाशी लेकर देख लें, वस्तुस्थिति पता चल जाएगी। यह घटना दुनिया में अपने आप को दिखाने के लिए नहीं था बल्कि इस लिए है क्यों कि वहां की सरकार आतंकवादियों की बात कुछ समय तक नहीं मानी। आप अगर पाकिस्तान की बात करेंगे तो वहां किसी भी मजहब और धर्म के लोग अब नहीं रहे और एक बात कहूं की वहां के लोगों का अब ऐसा लगता है कि एक ही मजहब और धर्म है और वह आतंकवाद... हर घर में एके 47 और एके 56 जहां मिले वह देश कैसा हो सकता है। उस देश के लोग कैसे हो...

जिहाद है यह कैसा जो मानवता को खत्म कर गई

पाकिस्तान के पेशावर आर्मी स्कूल पर तालिबानी आतंकियों ने हमला कर दुनिया को जो दिखाया वह मानवता को खत्म करने वाला है। तालिबानी यह कैसी जिहाद कर रहे हैं। क्या चाहते हैं ऐ जिहादी। बंदूक की नोक पर दुनिया पर शासन किया जा सकता तो सिकंदर कभी मरता नहीं। तैमूर लंग तो दुनिया में आज भी होता। आतंकियों से संबंधित अक्सर समाचारों में कुरान की बात करते पढ़ा हूं। सच्चा मुसलमान और कुरान पाक की बात करने वाले आतंकी यह बता सकते हैं कि हथियार उठाकर शुरुआत किसने की है। यह बता सकते हैं कि सबसे पहले किसे मारा गया। कुरान में क्या लिखा है मासूमों की हत्या और महिलाओं को जींदा जलाना। यही लिखा है कुराना में। अगर ऐसा होता तो आज जो लोग कह रहे हैं कि कुरान में लिखा है कि महिलाओं को जींदा जलाना और मासूमों की बेरहमी से हत्या करना लिखा है तो सोचिए वे क्या आज बचे होते। उनके पैदा होते ही कुरान के नियमानुसार उन्हें मार दिया जाता। आंतक का कोई धर्म नहीं होता। मजहब नहीं होती कुरान नहीं होता गीता नहीं होती बाइबल नहीं होता गुरुग्रंथ नहीं होता। उनका सिर्फ और सिर्फ एके 47, एके 56, ग्रेनेड, बम, बंदूक होते हैं। आतंकी को...

भारतीयों को हो क्या रहा है आंतक से जुड़़ने का ट्रेंड होते जा रहा

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     मेहदी मसरुर भारत को शांति के लिए जाना जाता है। किसी को अहित न पहुंचाना ही यहां के लोगों की पहली कोशिश होती है। भारतीय मदद करने से पीछे कभी नहीं हटते। दुनिया में शांति का नोबल भी भारतीयों के नाम ज्यादा है। इससे यह तो पता चलता है कि भारतीय शांति के प्रतिक होते हैं। हमारा राष्ट्र ध्वज भी यही संदेश देता है। ध्वज में केसरिया रंग देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच की पट्टी सफेद चक्र के साथ शांति और सच्चाई और निचली पट्टी हरी जो उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता के साथ हरियाली को दर्शाता है। इसमें सफेद पट्टी बने चक्र को धर्म चक्र कहते हैं। यह चक्र सभी धर्मों को समान रूप से मानता है। इसके बाद भी भारत के लोगों का आंतक के रास्ते पर जाना देश के लिए शर्मनाक है। आतंकी बनने उसकी ट्रेनिंग लेने और उससे जुड़ने की सोचना भी कितनी बड़ी बात हो सकती है। कुछ सालों से देखने को मिल रहा है कि भारत के लोग आतंकवादी संगठनों से जुड़ने में ज्यादा रूचि ले रहे हैं। इस रास्ते पर भारत का आदमी जा रहा है जो पूरी दुनिया में शांति के लिए प्रतिबद्ध है। यह कितनी शर्मनाक बात है। भारत...

धर्म परिवर्तन पर संसद में पहली बार बवाल

धर्म परिवर्तन पर पहली बार संसद में बवाल मचा है। यह पहला मौका है जब देश के नेताओं को धर्म परिवर्तन होने की जानकारी मिली है। इससे पहले तथा कथित अल्पसंख्यक (2करोड़ से ज्यादा आबादी वाले लोग) अलग-अलग माध्यम से धर्म परिवर्तन करा रहे थे तब क्यों बवाल नहीं मचा। वोट बैंक कि राजनीति कर बंग्लादेशी नागरिकों को भारत में अल्पसंख्यक किन लोगों ने बनाया। नागरिकों ने या वही संसद में बैठे राजनीतिक पार्टियों में बैठे लोगों ने। आज जो सुविधाएं भारत के लोगों को मिलनी चाहिेए थी पश्चिम बंगाल में, असम और तमिलनायडू में दूसरे देश के लोगों को मिल रही है। भारत के जवान रोज मारे जा रहे है शरहद पर उसपर कभी बवाल नहीं मचा। किसी भी दिन ऐसी मांग उनलोंगो ने नहीं किया कि पाकिस्तान की तरफ से लगातार गोलीबारी हो रही है और बंग्लादेश से लगातार घुसपैठ हो रहा है उसके लिए कदम उठाया जाए। चीन के सैनिक लगातार सीमा क्षेत्र में घुस आते हैं इसपर कभी बवाल नहीं मचा। आज जब हिंदू धर्म पर संकट आ गई है उसे बचाने के लिए प्रयास हो रहे हैं तो इसे राजनीतिक लोग धर्म परिवर्तन के रंग में रंगने की कोशिश कर रहे हैं। लोगों ने वहीं किया ना जो वे करते...

जन संभल जा जरा फिर सरकार चुनने चला है तू...

14 14 14.... 2014 ने जाते जाते ऐसा गम दिया है छत्तीसगढ़ को देश को कि देश और राज्य भूल नहीं पाएगा। इस 14 ने तेरी ऐसी तैसी करके रख दिया। पहले नसबंदी करने वाली 14 महिलाओं की मौत फिर 14 जवानों कि शहादत और अब 14 मासूम बच्चों की मौत। नसबंदी के समय सिर्फ 14 महिलाओं कि मौत बस नहीं हुई, बल्कि 7 से ज्यादा लोगों की सिप्रोसिन 500एमजी सहित दवा खाने से मौत हुई। जवानों की मौत एक 47 और एबुंस से हुई तो बच्चे कुपोषण और कमजोरी से। नसबंदी कांड का खुलासा होने के बाद और परिसमन में गड़बड़ी होने पर हाई कोर्ट ने सरकार को राहत तो दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जो किया वह सरकार के लिए सामत बन गई। ऐसा तगड़ा झटका दिया कि सरकार औंधे मुंह गिर पड़ी। अब दिसंबर में नामांकन और जनवरी 2015 में चुनाव कराना है। चुनाव शहर और ग्राम सरकार की होने वाली है। यहीं से नींव तैयार होती है राजनीति की। इस बार इतना कुछ सहने के बाद लगता है कि जनता संभल कर चलेगी। पिछली गलतियां दोहराएगी नहीें। सरकार चयन में इस बार की गलती जितना महंगा पड़ा है ‌वह नहीं चाहेगी कि यह गलती दोहराई जाए। जन संभल जा जरा फिर सरकार चुनने चला है तू... थोड़ा सोचकर समझ कर ...