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...रक्षाबंधन के मायने क्या

आज रक्षाबंधन है। बहनें अपने भाईयों को राखी बांधेगी। क्या यह रक्षा का बंधन कारगर है जबकी आज हर जगह पर बहनों के साथ शोषण हो रहा है अत्यचार हो रहा है। सोचिए उन लोगों पर क्या गुजरती होगी। वे उन बहनों के बारे में क्या सोचती होंगी जिनके हाथों उनकी अस्मत लुटी जाती होगी। ये उन बहनों के उस समय को सोचती होगी जब वे बहने उन भाईयों के हाथों पर राखी बांधी होगी। रक्षा के लिए अपने रक्षा के लिए समाज के रक्षा के लिए। उसी तरह जिस प्रकार किसी की बहन न होने पर भाई के दिल पर आज जो गुजरेगी। हालांकि आजकल जिनकी बहने होती हैं वे ज्यादा अपराध को अंजाम दे रहे है। ऐसे में इस रक्षा बंधन क्या है...

डॉलर डे... हम कहां और तुम कहां

अ मेरिका आज डॉलर डे मना रहा है। डॉलर का जन्म आज के ही दिन 8 अगस्त 1786 को हुआ था। आपको बता दे कि जब भारत आजाद हुआ था तब भारतीय मुद्रा और अमेरिकी डॉलर की वैल्यू बराबर थी। आजादी के बाद भारत की मुद्रा का दर गिरा और अमेरिका के मुद्रा का दाम बढ़ता गया आज की स्थिति में अमेरिका के एक डॉलर बराबर 61 भारतीय रुपए हो गया है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका के डॉलर हमारे लिए कितना महत्व रखता है।                आज के दिन अमेरिका में अवकाश रहता है। दुनिया का सबसे पसंदीदा मुद्रा डॉलर को माना जाता है। अमेरिका में आज नेशनल डॉलर डे मनाया जा रहा है। 8 अगस्त 1786 के दिन कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने अमेरिका मैद्रिक प्रणाली स्थापित की थी। साथ ही 76 साल बाद 1862 में एक डॉलर का पहला नोट छपा।                आप को बता दें कि डॉलर कॉटन और लिनन के 75:25 से बनता है। दुनिया में 100 अमेरिकी डॉलर सबसे अधिक पसंद किया जाता है। दुनिया भर में इसकी संख्या 9 अरब है। जो पुरे अमेरिकी डॉलर का 7 प्रतिशत है।         ...

महान कार्टूनिस्ट चाचा चौधरी की मौत

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हम तूमको ना भूल पाएंगे प्राण ज गजीत सिंह की बचपन पर आधारित गजल  वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी  को शायद हीं किसी ने न सुना हो... और चाचा चौधरी कॉमिक्स शायद ही कोई भूल पाए... हम सभी को चाचा चौधरी जैसा कैरेक्टर देने वाले प्राण का निधन हो गया है। आप को हमारी और से श्रद्धाजंलि है प्राण... वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी ये दौलत भी ले लो, ये शौहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी... मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी, वो बुढिया जिसे बच्चे कहते थे नानी, वो नानी की बातों में परियों का डेरा, वो चेहरे की झुरियों में सदियों का फेरा, भुलाए नहीं भूल सकता है कोई, वो छोटी सी रातें वो लंबी कहानी...  कड़ी धूप में अपने घर से निकलना, वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना, वो गुड़िया की शादी पे लड़ना झगड़ना, वो झूलों से गिरना वो गिर के संभलना, वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफे, वो टूटी हुई चूडियों की निशानी... वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी... इसी तरह कोई ऐसा नहीं होगा जिसने चाचा चौधरी की कहानी न...

योजनाओं के साथ पहल जरुरी है

योजनाओं के साथ पहल जरुरी है केन्द्र सरकार कई प्रोजेक्ट चलाकर नदियों को साफ करवा रही है। गंगा, यमुना में गंदगी का अंबार लग गया है। कोई माने या न माने पर नदी कभी मर नही सकती यह तय है। यमुना दिल्ली के बाद कई जगहों पर हलांकि सुख जरुर गई है पर उसमें गंदगी ड़ालने और नाले में तब्दिल करने की लोगों की साजिश कभी रुकी नहीं है। लगातार जारी है जैसे नदी कभी शांत नही हो सकती उसी तरह उसके किनारे बसे शहर कभी शांत नही हो सकते। हाल में कोशी में बाढ़ का मंजर है। बिहार के ज्यादा तर शहर इसके चपेट में आएंगे। तबाही तो होगी ही। पहाड़ी नदी है। बिहार का शोक इसे कहा जाता है। जन हानी को सरकार रोकने के लिए प्रयासरत है पर क्या माल हानी को भी रोका जा सकता है। नहीं क्योंकि बनाए हुए घर को कहीं ले जाया नही जा सकता। और वैसे भी यह नदी पहड़ी नदी है नेपाल से निकलती है तो इसका प्रवाह तेज होना लाजमी है। पर हमेसा इस नदी में उतना ही पानी आता होगा जितना 10 साल पहले आता था यह कहना कठिन है। पहले हो सकता है ज्यादा पानी आता हो या यह भी हो सकता है कि अब जबकि हर जगह क्रांकिटीकरण हो गया है तो पानी कहीं नहीं ठहरता और नदी में ज्यादा ...

चौथा स्तंभ गिरवी है

चौथा स्तंभ गिरवी है भारत के संविधान में चार स्तंभ है जिनका अलग-अलग काम है। पहला व्यवस्थापिका, दूसरा कार्यपालिका, तीसरा न्यायपालिका और चौथा स्तंभ है मीडिया। कई बार सवाल उठे कि इस चौथे स्तंभ का काम क्या है ? कुछ बुद्धिजीवी ने यह कहा कि बाकि तीनों स्तंभ की देखरेख करने का काम ही मीडिया का है। पर सच क्या है? भारत की व्यवस्थापिका व्यवस्था तो कर रही है और कार्यपालिका 100 रुपए के काम में से 10 रुपए तक को करा ही रहा है। न्यायपालिका अपने काम में कितना कुछ कर रही है यह सबको पता है। लोकिन मीडिया काम इनकी देख रेख करना था तो वह क्या कर रही है। कहीं ऐसा तो नही कि भारत के तीन स्तंभ को पहले ही गिरवी रख दिया गया था। उम्मीद चौथे स्तंभ से था जिसे अधिकार था कुछ करने और तीनों स्तंभ की देख रेख करने का पर ऐसा हो नहीं पाया। आज चौथे स्तंभ पर खतरे का बादल मंडरा रहा है। हमारा चौथा स्तंभ गिरवी की गिरफ्त में जकड़ता जा रहा है। यह गिरवी हो रही है कार्पोरेट की और ना जाने किनका किनका पर उसे इसका हिसाब भी चुकाना होगा। आज नहीं तो कल मीडीया घराने को जवाब तो देना होगा।

तंबाकू पर कर बड़ने से सिगरेट के दाम बड़ गये...युवाओं पर महंगाई का एक और बोझ बड़ा दिया सरकार ने

तंबाकू पर कर बड़ने से सिगरेट के दाम बड़ गये...    संसद में मंत्री जी ने तंबाकू पर टेक्स बड़ा दिया। कितना घाटा हो रहा है आज के युवाओं को जो शौकिया सिगरेट पीते थे उनका तो अब पीना भी बंद हो गया। और जो लोग लत्ती थे  वे भी पीना कम कर दिए। लोगों के साथ यह सरासर अन्याय है। इसके लिए कोई खुलकर विरोध नहीं कर रहा यह समझ नहीं आता। पेट्रोल का दाम अगर 50 पैसे भी बढ़ जाने पर दिनभर इसी की चर्चा होती है। लेकिन तंबाकू का कर बढ़ाए जाने पर लोग चर्चा नहीं कर रहे है यह बहुत आश्चर्य करने वाला है।  मुझे लगता है सरकार जानती नहीं की तंबाकू की पुहंच रेडियो की तरह गांव-गांव और घर-घर में हैं वह बिना सिंगनल के वहां पहुंचता है। भारत का शायद ही कोई गांव होगा जहां तंबाकू की पहुंच न हो। यहां तक बॉलीबुड के फिल्मों में भी इसकी पहुंच हो गई है। तभी तो गाना गाते है ...पान सुपाड़ी का डब्बा दे दई । सरकार युवाओं पर एक और बोझ डाल दी है। इसका विरोध मैं करता हूं। लोगों के ऊपर यह अधिक भार होगा इसके उपयोग से धरती का भार कम होता है और सरकार इसपर कर लगा कर लोगों पर भार बढ़ा दिया है यह बहुत बहुत शब्द नहीं है इ...

बात नहीं पहल भी होनी चाहिए

बात नहीं पहल भी होनी चाहिए अब वक्त सोच बदलने का है। संतान दो ही अच्छा हो कोई भी बच्चा। महिलाओं को शक्तिशाली बनते देखना चाहते हैं तो उनका सम्मान करना शुरु करो चाहे वह आपकी मां हो दूसरे की बहन वे खुद शक्तीशाली बन जाएंगी आपको रटने की जरुरत नहीं पड़ेगी महिला सशक्तीकरण-महिला सशक्तीकरण। म हिला सशक्तीकरण की बात आज हर व्यक्ति कर रहा है। यह अच्छी बात है कि लोगों को अब यह समझ आने लगा है कि महिलाएं भी इंसान होती है। वरना तुलसीदास जी की लिखी पंक्ति "ढोल, गवांर, शुद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना की अधिकारी" का मतलब ही अलग निकाल लेते हैं। सिर्फ अर्थ ही नहीं निकालते वरन ताड़ना में "प्र" प्रत्यय लगाकर प्रताड़ना बना देते हैं।  जबकि तुलसीदास जी के इस पक्ति में प्रयुक्त ताड़ना का अर्थ देख-रेख से है। पर लोगों को लगता है कि तुलसीदास जी अपनी पक्ति में यह कह रहे हैं कि ढोल को जैसे पीटा जाता है उसी प्रकार नारी को भी पीटा जाए। इतना हीं नहीं पूर्व से अब तक ऐसा ही चला आता रहा है। पहले राजवाड़ी प्रथा में लोगों को बंधुआमजदूर बनाकर प्रताड़ित करते हुए रखा जाता था। अपनी शान सौकत के लिए गरीब तबके क...

लगातार प्रताड़ित कर रही है प्रकृति

लगातार प्रताड़ित कर रही है प्रकृति... जुलाई में सावन आता है और बारिश की फूहार होती है लोग उत्साहित होते हैं पर कुछ सालों से ऐसा नहीं हो रहा है। पिछले साल जहां उत्तराखंड तबाह हुआ वहीं इस साल भी कुछ कम हादसे जुलाई में कम नहीं हुए। हर तरफ से हादसों का समाचार आ रहा है, देख लिया हमने प्रकृति से छेड़खानी की तो उसने नहीं बख्शा चाहे वह सुनामी हो या उत्तराखंड। अब महाराष्ट्र के पुणे के भीमाशंकर को हीं ले तो पाएंगे की गांव के ऊपर पहाड़ टूट पड़ा। हम दबने वाले और मृत लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त कर रहे हैं ऐसा नहीं होना था। बुधवार की सुबह हुई यह भूस्खलन क्या वाकई प्रकृति है सिर्फ लगातार चार दिनों से बारिश होने के कारण यह हुआ है। नहीं यह लगातार पानी बरसने से नहीं हुआ इसके पीछे कारण है। हां हो सकता है इस गांव में न हुआ हो पर आसपास के क्षेत्र में यह लगातार हो रहा है। सिर्फ आस पास के क्षेत्र ही नहीं माहाराष्ट्र और पर्टिकुलर कुछ राज्य की बात यहां नहीं हो रही है यहां बात कर रहा हूं प्रकृति के साथ खिलवाड़ की। उत्तराखंड में इतने बांध बना दिया गया इतने पेड़ काट दिये गये और तो और नदियों को उल्टा बहने पर ...

जगंल काट रहे हैं तो जानवर नहीं छोड़ेंगे यह तय है

जगंल काट रहे हैं तो जानवर नहीं छोड़ेंगे यह तय है.. लगातार कट रहे पेड़-पौधे और जंगल का घटता रकबा हमें सचेत होना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं जब न बारिश होगी और न फसल उगेंगे। सबसे बड़ी बात यह होगी कि जिनके घरों को आज हम छीन रहें है वे बेघर होंगे आने वाले समय में और फिर वे आसरा ढुढ़ंने आएंगे हमरे पास... सोचिए अगर शेर या भालू, हाथी या गेंडा हमारे बस्तियों में आएं और लोगों को मार कर उनके घरों पर कब्जा कर लें तो क्या होगा। आने वाले समय में होना भी ऐसा ही चाहिए क्योंकि हमारे पूर्वज और हम दोनों वैसे ही है। आखिर कितना सहेंगे ये लोग वे भी प्राणी ही है उन्हें भी चोट लगती है दर्द होता है। उनको भी खाना चाहिए और वे भी प्यास लगने पर पानी हीं पीते है। जीन नदियों को हम आद इतना गंदा कर दिए हैं कि उसका पानी हम खुद नहीं पी पा रहे है वैसे में सोचिए ऐ न बोलने वाले जानवर कैसे उस पानी को पीकर अपना जीवन यापन कर रहे  है।                       हे मानव मनु की संतान इतना निर्दयी कब बन गया तू इन न बोलने वाले जीवों की रक्षा में तूझे करनी है यह तू ही कर सक...

टमाटर इतना लाल कैसे हुआ

टमाटर इतना लाल कैसे हुआ... टमाटर के दाम में अचानक हुई वृद्धि ने लोगों की सब्जियों से यह दूर हो गया है। इसका न अब सलाद में उपयोग हो रहा है और ना ही सब्जियों में डाला जा रहा है। इसके दाम की बढ़ोत्तरी की एक कहानी है। कहानी यह है कि पहले लगभग हर घर में आम का चुरा या आम की खटाई हुआ करती थी. या आम को छिलकर काटकर लोग सुखाया करते थे और जब बारिश का मौसम आता था तो उसका उपयोग सब्जी को खट्टा करने के लिए किया करते थे। आज की स्थिति किसी से छूपा नहीं है न तो घरों में खटाई है और न ही लोग आम को सुखा कर रखते है। आज भूमंडलीकरण(Globalization) का दौर है और हर कोई अपने काम में व्यस्त है। ऐसे में किसी के पास इस काम के लिए समय नहीं है और सबसे दुःखद बात यह है कि इस ग्लोबलाइजेशन ने परिवारों को तोड़कर रख दिया है। लोग स्वतंत्र  और स्वच्छंद हो रहे हैं। मां बाप को वृद्धाश्रम भेज रहे है और बच्चों को बोर्डिंग स्कूल जिसको जहां मन कर रहा है वहां घूम रहा है। ऐसे में उनके ऊपर न तो अब समाज का डर है न लोक लज्जा। टामाटर में लोक लज्जा और समाज के डर की क्या जरुरत है यही सोच होगा आप का तो बता दें कि पहले दादी दादा और घर...