जगंल काट रहे हैं तो जानवर नहीं छोड़ेंगे यह तय है
जगंल काट रहे हैं तो जानवर नहीं छोड़ेंगे यह तय है..
लगातार कट रहे पेड़-पौधे और जंगल का घटता रकबा हमें सचेत होना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं जब न बारिश होगी और न फसल उगेंगे। सबसे बड़ी बात यह होगी कि जिनके घरों को आज हम छीन रहें है वे बेघर होंगे आने वाले समय में और फिर वे आसरा ढुढ़ंने आएंगे हमरे पास... सोचिए अगर शेर या भालू, हाथी या गेंडा हमारे बस्तियों में आएं और लोगों को मार कर उनके घरों पर कब्जा कर लें तो क्या होगा। आने वाले समय में होना भी ऐसा ही चाहिए क्योंकि हमारे पूर्वज और हम दोनों वैसे ही है। आखिर कितना सहेंगे ये लोग वे भी प्राणी ही है उन्हें भी चोट लगती है दर्द होता है। उनको भी खाना चाहिए और वे भी प्यास लगने पर पानी हीं पीते है। जीन नदियों को हम आद इतना गंदा कर दिए हैं कि उसका पानी हम खुद नहीं पी पा रहे है वैसे में सोचिए ऐ न बोलने वाले जानवर कैसे उस पानी को पीकर अपना जीवन यापन कर रहे है।
हे मानव मनु की संतान इतना निर्दयी कब बन गया तू इन न बोलने वाले जीवों की रक्षा में तूझे करनी है यह तू ही कर सकता है। नदी साफ कर, पेड़ लगा पशु वध पर रोक लगा। जैसा तू प्राणी है वैसा ही वह भी है...
लगातार कट रहे पेड़-पौधे और जंगल का घटता रकबा हमें सचेत होना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं जब न बारिश होगी और न फसल उगेंगे। सबसे बड़ी बात यह होगी कि जिनके घरों को आज हम छीन रहें है वे बेघर होंगे आने वाले समय में और फिर वे आसरा ढुढ़ंने आएंगे हमरे पास... सोचिए अगर शेर या भालू, हाथी या गेंडा हमारे बस्तियों में आएं और लोगों को मार कर उनके घरों पर कब्जा कर लें तो क्या होगा। आने वाले समय में होना भी ऐसा ही चाहिए क्योंकि हमारे पूर्वज और हम दोनों वैसे ही है। आखिर कितना सहेंगे ये लोग वे भी प्राणी ही है उन्हें भी चोट लगती है दर्द होता है। उनको भी खाना चाहिए और वे भी प्यास लगने पर पानी हीं पीते है। जीन नदियों को हम आद इतना गंदा कर दिए हैं कि उसका पानी हम खुद नहीं पी पा रहे है वैसे में सोचिए ऐ न बोलने वाले जानवर कैसे उस पानी को पीकर अपना जीवन यापन कर रहे है।
हे मानव मनु की संतान इतना निर्दयी कब बन गया तू इन न बोलने वाले जीवों की रक्षा में तूझे करनी है यह तू ही कर सकता है। नदी साफ कर, पेड़ लगा पशु वध पर रोक लगा। जैसा तू प्राणी है वैसा ही वह भी है...
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