बात नहीं पहल भी होनी चाहिए
बात नहीं पहल भी होनी चाहिए
अब वक्त सोच बदलने का है। संतान दो ही अच्छा हो कोई भी बच्चा। महिलाओं को शक्तिशाली बनते देखना चाहते हैं तो उनका सम्मान करना शुरु करो चाहे वह आपकी मां हो दूसरे की बहन वे खुद शक्तीशाली बन जाएंगी आपको रटने की जरुरत नहीं पड़ेगी महिला सशक्तीकरण-महिला सशक्तीकरण।
महिला सशक्तीकरण की बात आज हर व्यक्ति कर रहा है। यह अच्छी बात है कि लोगों को अब यह समझ आने लगा है कि महिलाएं भी इंसान होती है। वरना तुलसीदास जी की लिखी पंक्ति "ढोल, गवांर, शुद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना की अधिकारी" का मतलब ही अलग निकाल लेते हैं। सिर्फ अर्थ ही नहीं निकालते वरन ताड़ना में "प्र" प्रत्यय लगाकर प्रताड़ना बना देते हैं। जबकि तुलसीदास जी के इस पक्ति में प्रयुक्त ताड़ना का अर्थ देख-रेख से है। पर लोगों को लगता है कि तुलसीदास जी अपनी पक्ति में यह कह रहे हैं कि ढोल को जैसे पीटा जाता है उसी प्रकार नारी को भी पीटा जाए। इतना हीं नहीं पूर्व से अब तक ऐसा ही चला आता रहा है। पहले राजवाड़ी प्रथा में लोगों को बंधुआमजदूर बनाकर प्रताड़ित करते हुए रखा जाता था। अपनी शान सौकत के लिए गरीब तबके की असहाय महिलाओं का अपहरण कर दुष्कर्म किया जाता था और आज भी कई जगहों पर किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त जानवरों से कैसा-कैसा काम लिया जाता रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। आज भी हल बीना जानवरों के नहीं चलते।
लोग अब जागरुक हो रहे हैं। महिलाओं के सम्मान के लिए लोग आगे आ रहे है। अब सिर्फ लोग महिलाओं की सोच को लेकर आगे ही नहीं आ रहे कहीं लगने पर उनकी मदद कर रहे हैं पर यह तुलसीदास जी के समय से ऐसा नहीं होता आया है यह तो क्रमिक है जो सदियों से चला आ रहा है। राम राज्य की बात करें तो उस समय भी महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता था। कृष्ण युग में तो महाभारत हीं महिला की प्रताड़ना पर हुआ। लोग आज यह कह रहें है कि अब महिला सशक्तिकरण होनी चाहिए। यह जरुरी है, पर क्या देश दुनिया कि जिस तरह की स्थिति है उससे लगता है कि महिलाएं शक्तिशाली बन पाएंगी। आज अमेरिका की बात करें या चीन की भारत की बात करे या अन्य किसी देश की हर जगह किसी न किसी रुप में महिलाएं प्रताड़ना का शिकार हो रही हैं। सबसे कठोर कानून अरब देशों का है। वहां पर दुष्कर्म या छेड़खानी करने वाले को जान से हाथ धोना पड़ता है। खबरों में वहां भी हमेशा इस तरह की घटनाओं का जिक्र होता रहा है। इस पर वहां रोक नहीं लग पाया है। यहां तक कि वहां तो और महिलाएं प्रताड़ित हो रहीं हैं। पहला उन्हें नकाब से ढके रहने से दूसरा इस तरह कि घटनाएं होती है उससे। विश्व में कई ऊंचे पदों पर आज महिलाएं बैठी हैं और वे पहल कर रहीं हैं पर भारत की बात करे तो हमारे यहां महिला राष्ट्रपति और सर्वोच्च संस्था सांसद के लोक सभा में अध्यक्ष महिला होने पर भी ऐसी कोई कानून नहीं बनी जिससे महिलाओं पर होने वाले अत्याचार दूर हो सके। कुछ कानून जो बनी भी वो भी निहायत घटिया और अमार्यादित हैं।
भारत में एक बात मैंने जो गौर किया वह यह है कि यहां महिलाएं खुद दुसरी महिलाओं को ज्यादा प्रताड़ित करती हैं। बतौर उदाहरण, सास-बहु, ननद-भाभी, जेठानी-देवरानी इस तरह से कई उदाहरण सुनने को देखने को मिलते हैं। आज लगभग हर घर में इस तरह कि प्रताड़ना होती हीं है। महिलाएं खुद दुसरी महिला की मदद नहीं करना चाहती जिसके कारण इनपर ज्यादा अत्याचार हो रहा है यह कहा जा सकता है। भारत के लगभग हर घर में इस प्रकार की घटनाएं रोज हो रहीं है। कुछ की रोपोर्ट पुलिस तक पहुंचती हैं कुछ कोर्ट में हैं और कुछ रोज प्रताड़ित होकर अपना अंत कर रही हैं। इतना ही नहीं कुछ सबकुछ सहकर भी रहीं है। कुछ प्रताड़ित महिलाएं अपने बच्चों के भविष्य के खातिर भी प्रताड़ना का शिकार हो रही और सहन कर रही हैं। जो होना नहीं चाहिए। कई रिपोर्ट ऐसे भी पढ़ने को मिलता है जिसमें लड़की को जन्म देने पर महिलाओं को मारा जा रहा है। पर इसमें उसका क्या दोष है यह समझ नहीं आता लोग महिलाओं पर तो पूरा आरोप लगा देते है पर क्या यह सौ प्रतिशत सच है ! नहीं यह सच नहीं है क्योंकि महिला के द्वारा किसी भी प्रकार की कोई ऐसी शक्ति नहीं है कि वह जिसे भी जन्म दे वह लड़का हो और लड़की न हो। यह पुरुष के स्पर्म के ऊपर होता है कि उससे किसका भ्रूण बनेगा। वह लड़का होगा या लड़की यह इसी से तय होता है।
एक कहावत है न कि "पहले चोरी फिर सीना जोरी" यही पुरुषों में भावना है और घर की महिलाएं भी इसमें उनका साथ देती हैं। हर सास पोता चाहती है पोती नहीं पता नहीं उसका जन्म नहीं होता या उसकी मां के साथ भी इसी तरह की हरकत की जाती जिस तरह की वह अपने बहु के साथ कर रही है तो कैसा लगता।
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