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वो सात महीने काली रातें...75 रुपए के लिए आदर्शवादी भारतीय समाज की करतूत

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शैली राय (शैली राय ... का जन्म दार्जिलिंग में हुआ और छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहती हैं। वहां एनजीओ चला रही हैं ,  जिसका मुख्य उद्देश्य समाज सेवा है। छत्तीसगढ़ के कॉलेज से ग्रेज्युएशन ,  फैशन डिजाइनिंग में डिप्लोमा तथा एरिना मल्टीमीडिया से डिजाइनिंग कोर्स किए हैं। इनका कहना है कि उच्च शिक्षित होने के बावजूद किन्नर होने से हमें कहीं नौकरी नहीं मिली। शैली  कहती हैं  किन्नरों के प्रति समाज में जो सोच है ,  उसे बदलने की जरूरत है। किन्नर एकाकी जीवन जीते हैं ,  वे न तो घर बसा सकते और ना ही  उन्हें  संतान का सुख मिलता है। समाज में भी उचित मान - सम्मान नहीं मिलता।)    कि सी के घर शादी हो, बच्चा हो या कोई और खास मौका, किन्नरों को खबर मिल जाती है और वे वहां नाचने आते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इनकी दुआएं जल्दी कुबूल होती हैं, लेकिन इनकी खुद की जिंदगी में क्या दुआओं की कोई जगह है? शायद नहीं। क्योंकि भारतीय समाज में सबसे ज्यादा उपेक्षित वर्ग आदिवासी, दलित, महिला और विकलांग को माना जाता है। बावजूद इसके कि एक वर्ग ऐसा भी है जो इन सबसे...

सूखे पर राहत या राहत पर सूखा

सूखे पर राहत सूखा पीड़ित किसानों के साथ सरकारों का राहत के नाम पर किया जाने वाला मजाक कोई नई बात नहीं हैं। मुआवजे के नाम पर किसानों के साथ लगातार भद्दा मजाक जारी है। ऐसे ही कई मामले एक साथ छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में सामने आया। दरअसल यहां के रंगबेल , खैरभवना और कनबेरी के किसानों ने खेत में धान और बीमा कंपनी को ऋण लेकर धन दिया था। इसलिए की फसल पर कोई मुसिबत के वक्त यह राशि बीमा कंपनी से मिलेगी , लेकिन जब सच में मुसीबत आई और बीमा कंपनी ने जो मदद दिया वह उन्हें राहत कम ताज्जूब ज्यादा किया। यह सूखे की राहत किसके के लिए फायदेमंद है , किसान या बीमा कंपनी। किसानों के लिए उनके खेत और उस पर उगी फसल ही सालभर की कमाई का प्रमुख जरिया है। ऐसे में अल्पवर्षा की वजह से निर्मित हुए सूखे के हालात ने उनकी कमर तोड़ दी है। इस मुश्किल में शासन ने उनके लिए बीमा के मरहम की व्यवस्था करते हुए राहत देने की योजना शुरू जरूर की। लेकिन इस बीमा योजना के रूप में उनके खाते में दी जा रही राशि भी उनके जख्म पर राहत देने नाकाफी है। सूखे की मार पर मरहम की बजाय बीमा कंपनी ने किस्तों में किसानों को बहुत कम राशि जारी कर...

कुर्ते का रंग फीका पड़ने की फरियाद फोरम से...

तेरा रंग ऐसा चढ़ गया कोई और रंग न चढ़ सके तेरा नाम सीने पे लिखा हर कोई आके पढ़ सके है जुनून है जुनून है तेरे इश्क का यह जुनून है... यह गीत तो आपने सुना ही होगा। जिला उपभोक्ता फोरम के एक फैसले पर यह बाखूब बैठता है। दरअसल बिलासपुर जिला उपभोक्ता फोरम में एक फरियादी ने अपने कुर्ते का रंग फीका पड़ने और उसी कुर्ते में से एक रंग निकलकर दूसरे रंग पर चढ़ जाने का परिवाद दायर किया।  शिकायत की सुनवाई के बाद फोरम ने मंहगे कुर्ते की कीमत  वापस करने और क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है। आम आदमी अपने अधिकारों को लेकर कितना सजग हो चुका है, इसे उपभोक्ता फोरम में आए एक फैसले से समझा जा सकता है। मामला रोचक और जागरूक करने वाला है। दरअसल एक शख्श ने महज इतनी सी बात पर कि उसके कुर्ते का रंग फीका पड़ गया है,फोरम का दरवाजा खटखटाया। 7 महीने की लड़ाई लड़ी और उसकी जीत हुई। फोरम के मेंबरान ने क्षतिपूर्ति सहित दुकानदार को 4650 रुपए लौटाने का आदेश दिया है। सरकंडा के कपिल नगर की रहने वाली करिश्मा चंद्रा ने अग्रसेन चौक स्थित अंदाज नामक कपड़े की दुकान से 29 अक्टूबर 2015 को 1650 में एक कुर्ता खरीदा। यह...

पत्रकार का दिखाई नहीं देने वाला दर्द

समाज के लिए एक बात पर पुरी दुनिया से लड़ने वाले पत्रकार के दर्द को शायद ही कभी किसी ने महसूस किया हो। अपनी कलम से पूरी दुनिया को हिलाने वाला पत्रकार अपने ही संस्थान, साथीयों व परिवार में बहुत ज्यादा उपेक्षित होता है। इतना कि वह पूरी दुनिया जीतकर भी अकेला और सिर्फ अकेला रह जाता है। उसके पास लोग सिर्फ और सिर्फ अपने मतलब के लिए आते हैं। इसके बाद भी जब पत्रकार से कोई काम नहीं हो पाता तो लोग कह देते हैं कि बिका हुआ है साला.... फलाना ढेकाना....। कभी खुद सोचा किसी ने कि पत्रकार का काम क्या है? क्यों उसे उस काम के लिए बोलते हैं जो उसके बस की बात नहीं... पहले उसे खुद दलाली कराना सिखाते हैं और बाद में जब वह किसी काम के बदले पैसा लगने की बात कह देता है तो उसे दलाल कहते हैं। ऐसा सिर्फ और सिर्फ समाज के लोगों की गलती के कारण होता है। पत्रकार को बदनाम करने के पीछे समाज की गलती है, क्योंकि कोई भी पत्रकारिता क्षेत्र में आने से पहले स्वच्छ और इमानदार पत्रकार ही होता है। उसे संस्था और समाज दलाल...दोगला और न जाने क्या गया बना देती है। कभी सोचा है इतनी महंगाई में पत्रकार की कमाई कितनी होती है? मैं बताता हू...

नेता जी की टोपी...गोल या लंबी

नेता जी नेता जी, नेता जी। आ गये हैं, नेता जी।। छा गये हैं, नेता जी घर पर नेता आते हैं वादे कर-कर जाते हैं।। नेता जी के वादे न्यारे पूरे झूठे प्यारे प्यारे।। नेता जी, नेता जी आ गये है, नेता जी।। नेता जी के रंग अनेक चेहरा बदला नियत एक।। आरोप-प्रत्यारोप का बढ़ा प्रचलन चौपर, टूजी, आदर्श, कोल खनन।। नेता जी का है बोलबाला हो रहा दिन रात घोटाला।। स्वयं को पाक-साफ बतलाने में वादों को झूठलाने में।। आगे हैं नेता जी जागे हैं नेता जी नेता जी, नेता जी आ गये हैं, नेता जी।। पांच साल हो गया है पूरा मूंह में राम बगल में छूरा।। नेता जी की भीड़ है आई कुर्सी के लिए है मची लड़ाई।। पेट्रोल, डीजल, गैस, राशन, तेल घर चलाना नहीं है बच्चों का खेल।। नेता जी, नेता जी आ गये हैं नेता जी।। आरक्षण का है फेंका जाल नेता जी ने किया कमाल।। जनता में मच गया बवाल उठ रहा दिन रात सवाल।। देश में बढ़ा है यौन उत्पीड़न भ्रूण हत्या, महिलाओं का शोषण।। नेता जी है बहुत ही शातीर दल बदल रहे हैं कुर्सी के खातीर।। नेता जी, नेता जी आ गये है नेता जी।। शिक्षा का गिरा है स्तर शिक्षक सो रहे लगा कर बिस्तर।। अस्पताल से गायब है डॉक्टर और सिस्टर ...

#jnu जेएनयू का हर छात्र गद्दार नहीं है

जेएनयू #jnu का हर छात्र गद्दार नहीं हैं।यहां की फीस कम जरुर है पर टैक्स की वजह से नहीं बल्की समान शिक्षा की वजह और छात्रों की पहुंचने वाली भिड के कारण है। यहा विदेशों से छात्र पढने आते है। यहां पहुंचने के लिए, यहां पढने के लिए लोग लालाइत रहते है। अपना सौभाग्य मानते हैं कि यहां जेएनयू से पढाई कर रहे हैं, आईआईटी रुढकी और न जाने कहां कहां से पढने वाले जिस तरह गर्व महसूस कहते है कि आई एम आईआईटीयन उसी तरह जेएनयू @jnu से पढने का अपना सम्मान है। अगर वहां से पढने वाले गद्दार हैं तो वहां से पढकर निकलने वाले भी गद्दार होंगे। वे कहां गद्दारी की पढाई करने वाले। वे समाज की बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं और उतना ही टैक्स दे रहे हैं जितना देश के अन्य लोग दे रहे है। आपसे बस इतना ही कहना है कि आप जो आज पूरे छात्रों पर सवाल उठा रहे हैं गद्दार बोलकर आप इतने सालों तक कहां थे। जानते थे कि जेएनयू के छात्र कम्युनिस्ट विचारधारा वाले होते हैं। वैसे ही जैसे कई चुतिए गांधीवादी होते हैं। आप जानते हुए चुप क्यों थे। अगर नहीं जानते थे कि यहां के छात्र कम्युनिष्ट विचारधारा के होते है तो फिर पूरे छात्रों को अपने लपेटे ...

यहां बहुएं करती हैं सास की पूजा

साझा चूल्हे की संस्कृति-सभ्यता वाले अपने देश में रिश्तों की डोर कमजोर हो रही है और परिवार बिखरते जा रहे हैं। ऐसे दौर में रतनपुर का तंबोली परिवार किसी मिसाल से कम नहीं। इस परिवार में कुल 39 सदस्य हैं और इन सभी ने मन के तार इस मजबूती से बांध रखे हैं कि मनमुटाव या आम परिवारों जैसे झगड़े-टंटे इन्हें नहीं तोड़ पाते। इस आत्मीयता के मूल में हैं परिवार की मुखिया और 11 बहुओं की सास जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। जब तक रहीं, अपनी देवरानियों और बहुओं को मां जैसा स्नेह दिया। यही वजह है कि बहुओं ने सास की याद को अमर रखने घर पर उनका मंदिर बनवाया, उनकी मूर्ति का सोने के गहनों से ठीक उसी तरह साज-श्रृंगार किया, जैसा वे किया करती थीं। रोज पूजा-आरती करती हैं बहुएं रतनपुर करैहापारा निवासी 71 वर्षीय शिव प्रसाद तंबोली रिटायर्ड टीचर हैं। अब इस परिवार की बागडोर उनके ही हाथों में हैं। पहले परिवार को संजोए रखने का काम उनकी पत्नी गीता देवी करती थीं। 2010 में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी याद में बने मंदिर में सभी बहुएं और अन्य सदस्य मिलकर सुबह-शाम उनकी पूजा और आरती करते हैं। उनका मानना है कि गीता देवी के प्रयासों से...

बजट में बाबा जी का ठुल्लू मिला

 जेब पर मोदी के कैंची का खच खच, हर घर में परिवार का कच-कच             मोदी सरकार का तीसरा बजट सत्र 2016-17 की घोषणा मार्च के पहले सप्ताह के पहले ही दिन सोमवार को वित्त मंत्री ने प्रस्तुत किया। यह सिर्फ गरीबों और अमीरों का बजट कहें तो कोई हर्ज नहीं होगा। ऐसा लगता है सरकार को जैसे सरकारी नौकरी अथवा प्राइवेट नौकरी करने वाले लोग बेवकूफ हैं। उनपर जीतना टैक्स लाद दो चलेगा। वित्त मंत्री ने कर्मचारियों के पेट और पीछवाड़े दोनों पर लात मारी है, वहीं उद्योगपतियों और सरकार में बैठे लोगों को इससे मुक्त रखा है। यहा यू कहें कि मंत्री, सांसद, विधायकों को इससे लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया है। यह बजट बनियावाद को बढ़ावा देने वाला और निहायत ही घटिया बजट है। सरकार के बजट में छोटे शहरों को ध्यान में नहीं रखा गया। सिर्फ और सिर्फ उत्तर प्रदेश को ध्यान में रखकर यह बजट तैयार किया गया है कहा जाए तो कोई हर्ज नहीं होगी। उत्तर प्रदेश के विकास के लिए ही यह बजट बनाया गया प्रतित होता है।         मोदी सरकार ने अपना तीसरा बजट सोमवार को प्रस्तुत...

एक लड़ाई जो पांच हजार सालों से जारी है, स्वरूप बदलकर आरक्षण हुआ

देश में एक ऐसी लड़ाई जारी है जो पिछले पांच हजार सालों से चल रही है। जी हां भारत में जाति वाद की लड़ाई लगभग 5 हजार साल पहले शुरू हुआ। हलांकि आजादी मिलने के बाद यह व्यवस्था को खत्म करने की कवायद की गई, लेकिन इसके स्थान पर विद्वानों ने आरक्षण लाया। इसे लाया तो 10 साल के लिए था, लेकिन अब यह एक महामारी और गंभीर बिमारी की तरह बढ़ता ही जा रहा है। विभिन्न जाति के लोग इसको पाने के लिए आंदोलन और पब्लिक सेक्टर के संसाधनों को जला रहा है। यह अब लड़ाई की तरह हो गया है, जिसे पाने के लिए लोग खून खराबा पर तक उतारू हैं। जातिवाद में आजादी के पहले जितना खतरनाक था उससे कहीं ज्यादा खतरनाक अब होता जा रहा है। पहले उच्च जाति और निम्न जाति में लोगों का विभाजन किया गया था, पहले चार वर्णों में बांटा गया था, ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र थे। आजादी के बाद परिस्थिति बदली, और आरक्षण के लिए भी चार वर्ग ही बनाए गए, या यूं कहे कि इस जातिवाद को जारी रखते हुए विद्वानों ने गंदगी को खत्म करने के बजाय उसे और बढ़ावा दिया। विद्वानों ने जनरल, ओबीसी, एससी और एसटी किया। जनरल मतलब ब्राह्मण, क्षत्रीय, ओबीसी का मतलब वैश्य, एसस...

हाईकोर्ट ज्यूडिशियल एकेडमी बिल्डिंग की ढलाई में छत गिरता है और हाईकोर्ट याचिका आने का इंतजार करता है

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