पत्रकार का दिखाई नहीं देने वाला दर्द
समाज के लिए एक बात पर पुरी दुनिया से लड़ने वाले पत्रकार के दर्द को शायद ही कभी किसी ने महसूस किया हो। अपनी कलम से पूरी दुनिया को हिलाने वाला पत्रकार अपने ही संस्थान, साथीयों व परिवार में बहुत ज्यादा उपेक्षित होता है। इतना कि वह पूरी दुनिया जीतकर भी अकेला और सिर्फ अकेला रह जाता है। उसके पास लोग सिर्फ और सिर्फ अपने मतलब के लिए आते हैं। इसके बाद भी जब पत्रकार से कोई काम नहीं हो पाता तो लोग कह देते हैं कि बिका हुआ है साला.... फलाना ढेकाना....। कभी खुद सोचा किसी ने कि पत्रकार का काम क्या है? क्यों उसे उस काम के लिए बोलते हैं जो उसके बस की बात नहीं... पहले उसे खुद दलाली कराना सिखाते हैं और बाद में जब वह किसी काम के बदले पैसा लगने की बात कह देता है तो उसे दलाल कहते हैं। ऐसा सिर्फ और सिर्फ समाज के लोगों की गलती के कारण होता है। पत्रकार को बदनाम करने के पीछे समाज की गलती है, क्योंकि कोई भी पत्रकारिता क्षेत्र में आने से पहले स्वच्छ और इमानदार पत्रकार ही होता है। उसे संस्था और समाज दलाल...दोगला और न जाने क्या गया बना देती है। कभी सोचा है इतनी महंगाई में पत्रकार की कमाई कितनी होती है? मैं बताता हूं पैकेज बंधे हैं देश के बड़े अखबारों में... जूनियर पत्रकार को 3500-4000, उससे सीनियर7000-9000 और सीनियर पत्रकार को 9000-10000 इसके अलावा कुछ विशेष संवाददाता होते हैं उनके 12000-14000 और कुछ सब एडिटर होते हैं जिनका 15-17 हजार रुपए होता है। डीएनई का 20000-22 हजार और संपादक का 25-27 हजार रुपए। (नोट: यह आंकड़ा लगभग में देश के तमाम बड़े अखबारों का जायजा लेने के बाद दिया गया है) इतनी राशि में जबकि बच्चे का स्कूल फीस 6000 रुपए हो, घर का खर्च 5000 हो तो सोचिए एक पत्रकार किस तरह मैनेज करता होगा अपने परिवार का। कई पत्रकार तो जीवन भर जुनियर रिपोर्टर रह जाते हैं। कई में प्रतिभा अच्छी होती है तो वे सीनियर रिपोर्टर तक तो बन जाते हैं, लेकिन संपादक का तेल नहीं लगा पाने की स्थिती में वह भी भूखे मरने कि कगार पर होते हैं। संपादक के हाथ में होता है रिपोर्टर और पत्रकार की तन्खाह बढ़ाना लेकिन जो तेल ज्यादा लगाते हैं उनका तन्खवाह बढ़ा दी जाती है। वहीं जो नहीं लगा पाते उनकी तनख्वाह बढ़ता है 200 से 300 रुपए। विश्वास नहीं तो बड़े समाचार पत्रों के पत्रकारों से जुलाई-अगस्त के समय पूछा जा सकता है कि उसका कितना तनख्वाह बढ़ा है। वह अपने संपांदक को गाली देता मिलेगा। कोसता मिलेगा। वजह है साहब दलाली और दोगलई करने का पत्रकारों के पास.... एक पत्रकार तो पता नहीं किस वेतन आयोग में जीवन गुजर बसर कर रहा है। जबकि वही दूसरों के छठवां और सातवां वेतन मान लागू नहीं होने पर बड़ी-बड़ी लेख छापकर सहयोग करता है, लेकिन समाज कभी उसके लिए एक रैली निकाली मुझे याद नहीं। मुझे तो यह भी याद नहीं कि किसी पत्रकार के मरने पर कोई समाज श्रद्धांजलि भी दिया हो भले वह पत्रकार समाज और व्यक्ति के लिए अपनी जान दे दिया हो। पत्रकार दलाल नहीं है समाज में गलती है कि उसे पत्रकार बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। आने वाले समय में कोई भी पिता सेना में जाने से अपने बेटे को रोकेगा वैसे ही पत्रकार बनने से रोकेगा। क्योंकि यही दो वर्ग है जो समाज में उपेक्षित है।
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