#jnu जेएनयू का हर छात्र गद्दार नहीं है

जेएनयू #jnu का हर छात्र गद्दार नहीं हैं।यहां की फीस कम जरुर है पर टैक्स की वजह से नहीं बल्की समान शिक्षा की वजह और छात्रों की पहुंचने वाली भिड के कारण है। यहा विदेशों से छात्र पढने आते है। यहां पहुंचने के लिए, यहां पढने के लिए लोग लालाइत रहते है। अपना सौभाग्य मानते हैं कि यहां जेएनयू से पढाई कर रहे हैं, आईआईटी रुढकी और न जाने कहां कहां से पढने वाले जिस तरह गर्व महसूस कहते है कि आई एम आईआईटीयन उसी तरह जेएनयू @jnu से पढने का अपना सम्मान है। अगर वहां से पढने वाले गद्दार हैं तो वहां से पढकर निकलने वाले भी गद्दार होंगे। वे कहां गद्दारी की पढाई करने वाले। वे समाज की बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं और उतना ही टैक्स दे रहे हैं जितना देश के अन्य लोग दे रहे है। आपसे बस इतना ही कहना है कि आप जो आज पूरे छात्रों पर सवाल उठा रहे हैं गद्दार बोलकर आप इतने सालों तक कहां थे। जानते थे कि जेएनयू के छात्र कम्युनिस्ट विचारधारा वाले होते हैं। वैसे ही जैसे कई चुतिए गांधीवादी होते हैं। आप जानते हुए चुप क्यों थे। अगर नहीं जानते थे कि यहां के छात्र कम्युनिष्ट विचारधारा के होते है तो फिर पूरे छात्रों को अपने लपेटे में क्यों ले रहे हैं। यहां के दूसरे छात्रों का विचारधारा जानते हैं कि वे क्या सोचते हैं, यह वही यीनिवर्सिटी है जहां से देश का प्रतिनिधित्व करने वाले कई नेता पैदा हुए हैं। यह अभी भी नेता पैदा करती है। यह जानने कि आपने कभी कोशिश की। वहां तक पहुंचने के लिए छात्रों को कितना पापड़ बेलना पडता है यह एसी चेंबर में बैठकर पांचवी आठवी पास लोग नहीं समझ सकते। नहीं समझ सकते दिन रात एककर पढने वाले उस छात्र को जो जेएनयू में पढने के लिए 80 से 90 और 95 प्रतिशत तक लाता है। छात्रों को जाकर देखिए पूछिए कैसे तैयारी करते हैं जेएनयू @http://www.jnu.ac.in/ में एडमिशन मके लिए।आप जिनको आरक्षण के नामपर आईआईटी और न जाने कहां कहां एडमीशन नहीं देते, भगा देते हो वे लोग यहा आते हैं। एक एमपी को आप इतना भाव देते हो जो पांचवी आठवी तक भी नहीं पढा होता वह समझ भी नहीं सकता कि मेहनत करने का मतलब क्या है और आप उन लोगों पर उंगली उठा दिए जो न मुर्दाबाद बोले न जिंदा बाद बोले। उनके मन में आखिर गुस्सा क्यों न हो इस समाज के प्रति उस देश के प्रति वे जो गलती किए ही नहीं उसकी वे सजा पा रहे हैं। अारक्षण के नाम पर कभी तो कभी हिंदू और मुसलमान के नाम पर उनके साथ राजनीति की जा रही है अब देशद्रोह का एक और तबका लग गया उनपर। जेएनयू की फीस कम जरुर है, लेकिन यहां पढने वाला हर छात्र गद्दार नहीं हैं वे कडी मेहनत भी करते है और देश सेवा भी। यह देश सेवा वे टैक्स चुकाकर कर रहे हैं। www.jnu.ac.in पहुंचने के लिए कितने फापड बेलने पडते हैमन तहां के ही नहीं देश के किसी बी यूनिवर्सिटी के छात्रों से पूछिए जाकर। लाखों छात्रों के बीच से क्वालिफाइड होने पर एडमीशन यहां मिलता है फिर स्वतंत्रता के सही मायने को लेकर जंग चलती है। तब जाकर पता चलता है कि हकीकत में लोकतंत्र होने के क्या मायने है। यह संविधान में किस रूप में लिखा है और मिल किस रूप मे रहा है। सारे एमपी और एमएलए को छोडकर पूरा देश इनका गुलाम है, हम स्वतंत्र सही मायने में कभी हुए ही नहीं हैं। क्योंकि आपकी तनख्वाह अगर 80 हजार है तो उसपर 80 प्रकार के टैक्स लग जाते हैं और अपके मेहनत का एक बडा हिस्सा इन अंग्रेजी हुकुमत जो आज के सांसद और मंत्री एमएलए हैं कि सेवा में चले जाता है। मेहनत आप करते हो और उसका लाभ उठाता कोई और है। जेएनयू कि फीस कम है टैक्स के कारण एसा आप सोच रहे हैं हकिकत में कुछ प्रतिशत है। फीस इसलिए कम नहीं है कि आपकी टैक्स से यहां के लोगों का फीस पटाया और खाना खिलाया जा रहा है यहां पढने वालों कि संख्या इतनी है कि वे अपना फिस भी भर रहे हैं और उनकी संख्या ज्यादा होने से वे खाना सस्ता ले पा रहे हैं। सेंट्रल किचन का नाम सुना होगा यहां यह चलता है। आप संसद के खाने और वहां जाने वाले लोगों को मिलने वाली सुविधा के बारे में क्यों नहीं बोलते। छात्र अपनी फीस दे रहे है तब उनको वह सुविधा मिल रही है हराम का खाना आपके मंत्री और विधायक सांसद खा रहे हैं देश के छात्र नहीं। छात्र के बाप से पुछो क्या हाल है, अच्छा आप का भी तो बच्चा पढ रहा है स्कूल कालेज में वह भी हराम का खा रहा होगा। लगी मिर्च हुई तिलमिली ऎसे ही हर छात्र को हो रही है जो सही हैं। आईआईटी की फीस आपको पता है, क्यों नहीं पता वहां पढने वाले छात्रों से पूछिए। कैसे एक बाप अपने बेटे को पढाता है फिर जब वह जाब में अता है और टेक्स कटता है तो सोचिए कैसा लगता होगा। यह सोचने के लिए दिमाग चाहिए सुनी सुनाई बातों मे आकर हिंदू मुसलमान करने वालों को क्या पता की साले नेता गद्दार हैं और पूरे युवा को बदनाम कर अपना भविष्य सुरक्षित कर रहे हैं। आईआईटी में पढाई करने वाले चार लोग इंडियन मुजाहिदीन में शामिल हो जाए तो क्या पूरी संस्थान गलत है क्या वे छात्र गलत हैं जो जानते तक नहीं कि कौन लोग थे वे जो शामिल हुए। अगर उन्हे भी गद्दार बोले तो उसके बारे में सोचे आपके बेटे को कोई गद्दार और देशद्रोही बोले तो। जेएनयू के उन लगभग दो सौ छात्रों के विरोध करने का तरीका बहुत गलत है, लेकिन यह क्यों करना पडा किसी ने सोचा। वे विरोध कर रहे थे, किस तरह की आजादी मांग रहे है किसी ने ध्यान नहीं दिया। आपकी लोकतंत्र स्वतन्त्र है, आज मीडिया स्वतंत्र है? कोर्ट कचहरी के फैसले तक पर तो पांचवीं पास नेताओं का दखल है बात करते हैं देश स्वतंत्र है। हामन स्वतंत्र है कोई तो बस नेता स्वतंत्र हैं। जेएनयू के छात्र जो तरीका अपनाए मीडिया से उन्हे महत्व मिली, पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका के दरवाजे पर वकीलों से मार पडी, लेकिन यह कितने छात्रों थे 50,60,100, 200। इससे ज्यादा तो नहीं होंगे। जेएनयू में 8000 हजार से अधिक छात्र पढ़ते हैं, सब गद्दार नहीं है। एक बच्चे के एडमीशन से लेकर हर साल बदलने वाले पाठ्यक्रम और ड्रेस को खरीदने वाले से मिलो फिर छात्र पर उंगली ऊठाओ। क्यों विरोध न करे छात्र आपकी व्यवस्था पर उसे समाज से मिल क्या रहा है सिर्फ गालियों के सिवा। आजादी के 70 साल बाद भी देश में एक समान शिक्षा व्यवस्था नहीं लागू करा पाए हैं हम और बोलते हैं कि छात्र गद्दार हैं। आपकी नजर में अगर हर छात्र गद्दार है तो उसके अभिभावक और देश का हर शख्स गद्दार होगा। क्योंकि अगर आप एक दो या 100, 200 लोगों के करतूत पर 8000 छात्रों को गद्दार बोल रहे है, तो वह इसी देश और समाज से है तो यह भी सही मानिए की हम सबके लिए यह शब्द गद्दार है और देश द्रोही है। सही व्यक्ति की पहचान हो और भेड चाल के तर्ज पर पूरे समाज को दोषी न बनाया जाए यह सही नहीं है।

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