वो सात महीने काली रातें...75 रुपए के लिए आदर्शवादी भारतीय समाज की करतूत
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| शैली राय |
किसी के घर शादी हो, बच्चा हो या कोई और खास मौका, किन्नरों को खबर मिल
जाती है और वे वहां नाचने आते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इनकी दुआएं
जल्दी कुबूल होती हैं, लेकिन इनकी खुद की जिंदगी में क्या दुआओं की कोई जगह
है? शायद नहीं। क्योंकि भारतीय समाज में सबसे ज्यादा उपेक्षित वर्ग
आदिवासी, दलित, महिला और विकलांग को माना जाता है। बावजूद इसके कि एक वर्ग
ऐसा भी है जो इन सबसे कही ज्यादा उपेक्षित और हेय दृृष्टि से देखा जाने
वाला है। उस वर्ग को थर्ड जेंडर, ट्रांस जेंडर, तृतीय लिंग, किन्नर आदि
नामों से यह समाज पुकारता है। भारतीय समाज के धार्मिक व व्यावहारिक दोनों
दृष्टि से देखें तो जहां धार्मिक दृष्टि ने थर्ड जेंडर- किन्नरों को पवित्र
और ऊंचे स्थान पर बैठाया है। वहीं व्यवहार में थर्ड जेंडर को अत्यंत ही
हेय दृष्टि से देखा जाता है। यही वजह है कि भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को
हासिए पर रखा गया है, इसके कारण थर्ड जेंडर आज संविधान से मिलने वाले तमाम
मानवाधिकारों से वंचित हैं।
किन्नौर(हिमाचल प्रदेश का एक जिला) के मूल
निवासी किन्नर को माना जाता है। भारतीय उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक
फैसले में इन्हीं किन्नरों को तीसरी लिंग श्रेणी की मान्यता दी। कोर्ट ने
केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वो किन्नरों को शिक्षा और रोजगार में
आरक्षण दे। बावजूद इसके अगर बात करें पुरुष वादी भारतीय समाज कि जिसके मन
में पुरुष और स्त्री को छोड़कर कोई और वर्ग ही नहीं है तो समाज की ऐसी
मानसिकता नहीं है कि वह ऐसा कुछ सह सके देख सके। यही वजह है कि बाद में
सुप्रीम कोर्ट में गे रिलेशन को लेकर याचिकाएं दायर की गई। बात किन्नरों के
हक की है वे इसी समाज के अंग हैं और इसी से उत्पन्न हुए हैं। विकास के
लाखों दावे करने वाला भारतीय समाज आज भी स्त्री और पुरुष के परंपरागत दायरे
में इस कदर बंधा है कि वह ट्रांसजेंडर और किन्नरों को स्वीकार नहीं कर पा
रहा है। सबसे बड़ी समस्या ये है कि लोग किन्नरों को इंसान के तौर पर
स्वीकार नहीं करते हैं। शासन से लेकर प्रशासन तक इस बात को आज तक स्वीकार
नहीं कर पा रहा है कि किन्नर इसी समाज के अंग हैं। समाज को सबसे पहले
किन्नरों के अस्तित्व को स्वीकार करना पड़ेगा। उन्हें ये समझना पड़ेगा कि
किन्नरों की उत्पत्ति भी पुरुष-स्त्री के योग से हुई है, वो कहीं आकाश से
नहीं टपके हैं। उसके बाद फिर उनकी स्थिति को लेकर बात होगी। सोचिए, यह
अमानवीयता की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है कि सरकार के पास पिछड़े, दलित,
अल्पसंख्यक, विकलांग आदि हर वर्ग, जाति और धर्म के लोगों के विकास के लिए
कार्यक्रम हैं, लेकिन भारतीय समाज में हाशिए पर रहने वाले वर्ग के लिए न तो
कोई योजना है और न ही ऐसा कुछ करने की उनके मन में कोई इच्छा। जैसे किसी
को किन्नरों से मतलब नहीं है। वो कैसे जीते हैं और कैसे अपना गुजारा करते
हैं, इस देश में चोर-लुटेरों को लोन मिल जाएगा लेकिन किन्नर को वह भी नहीं
मिलता कि वे अपना रोजगार चला पेट पाल सकें। भले ही वह किन्नर लोन तय समय पर
जमा करने की क्षमता रखता हो, लेकिन बैंक अधिकारी उन्हें भगा देते हैं।
मनुष्य के रूप में जन्म लेने के बावजूद किन्नर अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर
हैं। किन्नरों के साथ होने वाले सामाजिक भेदभाव से उनका मनोबल टूटता है।
उनके लिए न रोजगार की व्यवस्था है और न ही उनकी खुद की कोई परिवार जैसी
इकाई है। सामाजिक भेदभाव की यह स्थिति समाप्त होनी ही चाहिए। आदर्शवादी
समाज के सबसे उपेक्षित तबकों में से एक किन्नर को आज
राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से इसकी शिनाख्त सबसे उत्पीड़ित तबकों के
रूप में की जा रही है। ऐसे में वर्षों से दुत्कार, प्रताड़ना और अपमान झेलने
वाला यह तबका अब धीरे-धीरे अंगड़ाई लेने लगा है। मसला शिक्षा का हो, संगठन
बनाने-सामाजिक काम करने का हो या फिर राजनीति में सक्रिय भागीदारी का, इस
समुदाय की छटपटाहट खुल कर सामने आने लगी है। इन्हीं में से एक हैं
@chhattisgarh छत्तीसगढ़ की स्वयं सेवी संस्था के जरिये सामाजिक चेतना जगाने
और उज्जैन किन्नर अखाड़े से चर्चा में आई अखाड़े की संस्थापक सदस्य रही शैली
राय। उन्होंने बात करते हुए कई बातें बताई इन्हीं में से उनकी एक लाइन
दिल-दिमाग की नसों को हिला कर रख देने वाली थी। उनके वे शब्द थे कि वे
छत्तीसगढ़ के एक होटल में पेट के लिए महज 75 रुपए में सात माह तक सफाई का
काम की। इस दौरान उन्हें पेट के लिए अपने शरीर तक को नीलाम करना पड़ा,
मजबूरी उन्होंने शेयर की बताई कि उन्हें सात माह तक 75 रुपयों के लिए किस
तरह खुद की रातें काली करनी पड़ी। अभी उन्हें किन्नर अखाड़ा की स्थापना के
लिए हर जगह जाना जाता है, लोग उनसे जुड़ रहे हैं। लेकिन वे उन समय को नहीं
भूल सकती जो समाज से उन्हें मिला। किन्नर होने का पता चलने पर 11वीं थी जब
उन्हें घर से निकाल दिया गया। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी कहे जाने वाले
बिलासपुर के छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान(सिम्स) के एक वार्ड जहां
एचआईवी एड्स पीडितों को रखा जाता है वहां उन्होंने दिन गुजारा। फैशन
डिजाइनिंग का कोर्स पूरा करने के बाद भी उन्हें जॉब नहीं मिला। जॉब जहां
मिला वहां भी उनको विभिन्न तरह के कमेंट्स और हरकतों से गुजरना पड़ा। अंत
में सबकुछ छोड़ शैली ने भगवा को अपनाया उसे अंगीकार किया। अब वे इस समाज से
किन्नरों के लिए लड़ रही हैं। यह लड़ाई समाज को समझाने के लिए हैं कि किन्नर
भी आपकी ही संतानों में से एक है, वे आपके ही सुखों का फल हैं। वे आपसे ही
उत्पन्न हुए हैं उन्हें आपको स्वीकार करना ही होगा। उनका मानना है कि
समय-समय पर दुनिया भर में विभिन्न मंचों पर मानवाधिकार उल्लंघन और
मानवाधिकारों की बदतर स्थिति की चर्चा की जाती है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं
से वंचित और समाज की प्रताडऩा के शिकार किन्नरों की स्थिति पर बहुत कम
लोगों का ध्यान जाता है। उनकी बातों में एक पीड़ा है जिसके अहसास से हमारा
समाज कोषों दूर है। देश की आजादी को 67 साल बीत गए हैं, लेकिन आज भी हमारे
समाज का एक तबका आजादी के अधिकारों से वंचित है।
सदर्भ
॰ लेखक के खुद के विचार हैं।
॰ शैली राय से बात के कुछ अंश।
॰ अध्ययन उपरांत विभिन्न स्रोतों से प्राप्त ज्ञान।

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