संदेश

गांधी परिवार के डीएनए का जांच जरूरी है, रोटी, कपड़ा और मकान की मांग जरूरी है

तूझे और क्या चिंता गांधी, तू तो चला गया इस जहान से। तेरे वारिशों का राज है वे ही हमराज हैं। हम कल भी आजाद नहीं थे आज भी आज़ाद नहीं हैं और कल भी नहीं होंगे। तेरे छर्रे का बनाया कानून गांधी हमें कल भी परेशान किया आज भी कर रहा है कल भी करेगा। नकल की आदत तेरी कल भी नहीं गई आज भी तेरे वंसजों में है और कल भी होगी। यह संतान तेरी गांधी न जायज है न नजायज है। यह कैसी संतान है गांधी नाम तेरा काम नेहरू का और वंश किसी और का गांधी। यह कैसी आजादी है गांधी की कुछ लोग सत्ता में हैं, कुछ लोगों के पास धन है। कुछ लोग देश चला रहे हैं और कुछ लोग आजाद है। आजादी के समय देखे तेरे सारे सपने अब पूरे हो गए गांधी। तू भी चला गया तेरे सपने भी चले गए हैं, हम ढो रहे हैं तेरे तथाकथित वंसजों की गांधीगिरी। तेरा वो सपना जो रोटी, कपड़ा और मकान का था उसका क्या हुआ गांधी। हद है बेशर्मियत की गांधी 70 साल पहले आजाद हुए और अब तक इस मामले में जवाब नहीं आया। हद है तेरे वंशजों का राज का जो अंग्रेजों से भी हरामी है। हरामी नहीं हरामखोर है गांधी। गांधी न किसी जात का है न पांत का यह हरामी खानदान है, जिसकी डीएनए की जांच होनी चाहिए। ...

शपथ कितने दिनों तक याद रहेगी

देश में बड़े जोर-शोर से स्वच्छता और अहिंसा का संकल्प लिया गया। महात्मा गांधी, लालबहादुर शास्त्री को याद किया गया। यह याद कितने दिनों तक रहेगी आने वाले वक्त में सड़क किनारे फैली गंदगी बताएगी। स्वच्छता के लिए बड़ी-बडी रैलियां की गई है, हर तरफ झाड़ू लगें है। यह याद रखना होगा इसे याद रखना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले भी कई बार इसके लिए मुहिम चलती रही हैं अब फिर चल रही हैं और आने वाले समय की मांग होगी इस मुहिम को जिंदा रखना। गंदगी जिस तेजी से बढ़ रही है वह देश के लिए घातक है इसे कम करना है तो लिए हुए संकल्प को याद करना होगा। हलांकि हमें भूलने की बड़ी बीमारी है, लेकिन हर वर्षी पर याद जरूर करते हैं। चाहे वो गांधी की बर्षी हो या नेहरू की। इनकी वर्षी तो हमें याद जरूर रहते हैं बस इसी का फायदा भी नरेंद्र मोदी ने उठाया है ताकि गांधीवादियों को स्वच्छता याद रहे। 

सबको अब पीतरों की याद आने लगी है, अब चले आओ

पितृ पक्ष शुरू हो गया है। सुबह से ही लोगों के घरों में अपने पितरों को बुलाने का दौर शुरू हो गया है। घर में चिड़ियों खास कर कौओं के लिए भोजन रखे जा रहे हैं। गायों की सेवा हो रही है, कुत्तों को भी रोटिया खिलाई जा रही हैं। प्रदुषित हो चुके तालाबों और नदियों में अपने जीवन को नर्क समान जीने वाले जीवों मछलियों को भी आटे के गोलिया खिलाई जा रही हैं। सब पितरों को मोछ प्राप्त कराना है। यह सब हमारे बच्चे भी देख रहे हैं। वे भी आने वाले समय में वही करेंगे जो हम कर रहे हैं। पूरी जिंदगी अपने मां बाप को दो-वक्त की रोटी तक समय पर नसीब नहीं होने देते। पहले-पहल वे हमे अच्छे कपड़े मिले, पुस्तक मिले शिक्षा मिले इसके लिए परेशान रहते हैं तब समय पर नहीं खा पाते। फिर हम उन्हें वृद्धाश्रम भेजकर खाना ही नहीं देते। मरने पर उनकी आवभगत करते हैं क्या फायदा। इससे तो अच्छा है यह पितृपक्ष कभी आए ही न। पितृ पक्ष परिवार को जोड़ने के लिए होता है। परिवार को समूह बनाने के लिए होता है। सामूहिक परिवार का अंग है पितृ पक्ष। यह न सिर्फ पितरों को बुलाने का बल्कि पुर्वजों को याद करने के लिए एकजुटता के लिए है। इसमें समाज और वायु मंडल...

कलम का मामला है कड़क से अकड़, पकड़ रहिए साहब

यह लेख कलम की पूजा करने वाले पत्रकारों के लिए है। पत्रकारों में जिस तेजी से नैतिकता के गिरने का दौर शुरू है आने वाले समय में लगता नहीं है कि पत्रकारिता सही मायने में हो पाएगा। मीडिया पर पहले से विज्ञापन तंत्र हावी है। वहीं मालिकाना हक के कारण पंगुता की कगार पर पहुंच चुकी पत्रकारिता में कलम पकड़ने वालों की नैतिकता का गिरना लाजमी तो है, लेकिन जो लिखना चाहते हैं और अपनी पत्रकारिता बनाए रखना चाहते हैं उनके लिए अकड़, पकड़ और कड़क बनाए रखना होगा। लिखे तो क्या लिखे जब पढ़ने वाले की फाड़ कर न रख दे। कुछ साल पहले एक पेन के प्रचार में इंटरव्यू लेने वाला पत्रकार मंत्री से सवाल करता है। बारिश वाली सीन में मंत्री जवाब देने की जगह उल्टा सवाल करता है क्या करोगे लिखकर। उस प्रचार वाले पत्रकार ने बड़ी ही सहजता से जवाब देता है लिखकर फाड़ देंगे। यही होना भी चाहिए। लिखिए तो फाड़ देने वाले अंदाज में। माना यह अब मुमकिन नहीं लेकिन जहां है वहां तो लिखिए। दुश्मनी मत लिजिए लेकिन सच को लिखन के लिए अपने पिछवाड़े में दम तो रखिए। पुस्तक को पठन के दौरन एक लाइन “बलिया जिला घर बा त केकरा से डर बा” इस डर को घर से खत्म करना होगा...

पत्रकारिता करना है तो दिल में आग और आंखों में अंगारे रख लो

पत्रकारिता करना है तो दिल में आग और आंखों में अंगारे होना चाहिए वर्ना रांड बजाना और भांड गाना तो पुरी मीडिया गा रही है उसमें और आपमें फर्क ही क्या है --------------- यह लेख कोरी बची पत्रकारिता जो सोशल मीडिया के माध्यम से ही जीवित रखी जा सकती है। मीडिया कार्पोरेट के हाथों बिक चुकी है। वह भी इतने गंदे तरिके से कि पत्रकारिता के स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले वे सारे हवा हवाई सिर्फ नमूने लगते हैं। वो कहते हैं न थ्योरी और प्रेक्टिकल में फर्क होता है। बस मीडिया में वह ही चल रहा है। मीडिया माने रांड चकला में बैठी हुई रांड जिसे पैसा दो और सेक्स कर कुछ समय के लिए संतुष्टी पा लो। सही मायने में अब पत्रकारिता बची है तो सिर्फ सोशल मीडिया पर जहां खुलकर लिख भी सकते हैं और बजा भी सकते हैं। वर्ना खाना तो भांड भी गाते थे राजाओं के समय में। पत्रकारिता में संपादक कुछ नहीं होता, प्रबंध संपादक ही सब कुछ होता है। इस बात को पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले दिमागी रूपी से समझ ले यही सही होगा। दिल में आग है तो उसे जलाए रखो और सोशल मीडिया के माध्यम से उस आग को लोगों के आखों में अंगारे बनाओ। जुड़ जाओ किसी भी मीडिया सं...

अब आजादी की लड़ाई फिर से शुरू करनी होगी

कई सौ साल तक भारत के लोग गुलाम रहे इस गुलामी से अब भी हम आजाद नहीं है। न बोलने की आजादी है न लिखने की और न जीने की। हम जी रहे हैं किस लिए पता नहीं देश है क्या किस लिए पता नहीं। देश कुछ लोग चला रहे हैं। वह भी सिर्फ कुछ हजार लोग 125 करोड़ से अधिक आबादी के तकदीर का फैसला कर रहे हैं। यह तो अंग्रेज और मुगलों से भी भयानक है। भयानक ही नहीं पूरे देश को नपुंसक बनाने वाले कानून व्यवस्था और संविंधान के कारण यह सब हो रहा है। जी हां इस ओर कभी किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया। जब सब आजाद है तो सब देश के विकास में हिस्सा क्यों नहीं बनते। जिम्मेदारी सबके पास होनी चाहिए। गुलामी क्यों भूखे कोई क्यों मर रहा है किसी का एहसान नहीं चाहिए। सबको अधिकार मिले। यह अधूरा लेख है.... मैं अपने अधूरे विचार नहीं छोड़ता फिर लिखुंगा इस ब्लॉक को आपके लिए...

कई जानकारी सोचने पर मजबूर कर देती है, जिंदगी और कुछ भी नहीं

आरती कुंज बिहारी की, बड़ी देर भाई नंदलाला, बनवारी रे, ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, ज्योत से ज्योत जगाते चलो, हे राम हे राम, दिल अपना और प्रीत पराई, एक परदेसी मेरा दिल ले गया, जाने कहाँ गए वो दिन, मन डोले मेरा तन डोले, मेरा नाम राजू घराना अनाम, ओ दुनियाँ के रखवाले, सबकुछ सिखा हमने, एक प्यार का नगमा है, मौजो की रवानी है जिन्दगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है जैसे गीतों को लिखने वाले गीतकार संतोष आनंद के बारे में आज पढ़ने का मौका मिला। यह उस दौरान हुआ जब मैं @दैनिक भास्कर बिलासपुर संस्करण के 22वें स्थापना दिवस पर सीनियर यशवंत गोहिल ने जब उनके गीत को गाया। कार्यक्रम के दौरान गेस्ट के नाते उन्हें एंकर ने बुलाया और उन्हें कुछ नगमें सुनाने को कहा। इस दौरान उन्होंने शोर फिल्म का यही गीत सुनाया एक प्यार का नगमा है... इस दौरान उन्होंने उनकी जीवनी पर थोड़ा प्रकाश भी डाला। जानकर बहुत कुछ जानने को मजबूर हो गया। अंत में इंटरनेट का सहारा लिया। उनके बारे में जो जानकारी मिली वह गीतकार संतोष आनंद के बारे में जानकर सोचने पर मजबूर हो गया। इतने सारे नगमे लिखने वाले संतोष आनंद जी के जीवन में इतने ...

लड़ाई तो बंदुक से ही लड़ेंगे अब कोई अखबार न निकालो

वर्तमान दौर और परिस्थियां देखकर ऐसा महसूस होने लगा है कि मशहूर शायर अकबर इलाहबादी की कही बात “खींचों न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो” गलत हो जाएगी। परिस्थिति अब अखबारों से नहीं सम्हली जा रही यह कहना भी गलत न होगा की इन परिस्थितियों के जनक ही अखबार हैं। अब तो लड़ाई बंदुक से लड़ी जाएगी। इसकी शुरुआत हलांकि हो चुकी है, लेकिन भटके हुए लोगों ने यह काम शुरू किया है। एक तरफ जहां नकस्लियों ने बंदुक उठाकर कचरा हो चुकी व्यस्था के विरोध में है तो वहीं बंदुक उठाए सेना के जवान व्यवस्था को सुधारने के लिए मर रहे हैं। अगर नक्सली अपने असली मुद्दे पर लड़ाई शुरू किए तो यह जायज और देश के लिए सबसे अच्छी बात हो सकती है। बस शुरूआत अच्छी करने वाले नक्सलियों के बीच में नेता अच्छे हो जाएं। या यू कहूं की कोई क्रांतिकारी विचारधारा वाला व्यक्ति की बात ये नक्सली मान ले। बंदूक के दम पर ही सत्ता करें, लेकिन काम देश की भलाई के लिए करें। देश में 100 जवान हैं तो उसमें 90 जवान गांव के किसानों के हैं, उन्हें मारना छोड़ दें मारना ही हैं तो उन 10 लोगों को मारे जो कुर्सी के भूखे हैं। ज...

पोर्न पर प्रतिबंध कानून में देरी या देरी का कानून, समर्थक भी कम नहीं

शासन ने पोर्न वीडियो अर्थात ब्लू फिल्मों की साइट पर प्रतिबंध लगाया। यह जानते हुए कि पोर्न का कारोबार भारत में करोड़ों अरबों रुपए का है। यह अनवरत काल से फल फूल रहा है इस प्रतिबंध के बाद और बढ़ेगा। वजह लोग कई-कई हजार वीडियों वाट्सएप और अन्य माध्यमों से डाउनलोड कर एक दूसरे को भेज रहे हैं। प्रतिबंध के बाद यह और बढ़ गया है। लोग इसपर तरह-तरह के कमेंट कर रहे हैं। हालांकि कई हजार साइटों पर से प्रतिबंध हट भी गया, लेकिन सवाल यह है कि ऐसा किया ही क्यों गया। यह किया गया तो फिर हटाया क्यों गया। सरकार ने गलती की है या सरकारी तंत्र ने। क्योंकि अगर प्रतिबंध जायज था तो फिर इस प्रतिबंध को हटाया क्यों गया। साथ ही इस पर प्रतिबंध लगाने में इतनी देरी हुई है या जानबुझकर पोर्नोग्राफी को बढ़ावा दोने और प्रचारित करने के लिए इस प्रकार की हरकत की गई। कुछ का यह भी कहना है कि शासन को पोर्नो से कोई फायदा नहीं हो रहा था इसलिए बैन कर दिए और अब सेटिंग हो गया तो हटा लिए। हालांकि मामला जो भी हो बहुत अच्छा तो नहीं पर बहुत खराब भी नहीं हुआ। कहा यह भी जाता है कि  इन फिल्मों के कारण परिवार टूट रहे थे, साथ ही असामाजिक घटनाए...

नियम बनाने वालों ने खुद के लिए बना लिया कानून स्मोकिंग करना जरूरी है इनके लिए

पब्लिक प्लेस में स्मोकिंग बैन है। एक्ट के सेक्शन 3(1) के तहत दी गई पब्लिक प्लेस की डेफिनेशन को प्रोहीबिशन ऑफ स्मोकिंग इन पब्लिक प्लेस रूल्स 2008 (2008 रूल्स) के रूल 2 (डी) के साथ पढ़ने पर डेफिनेशन में वर्क प्लेस भी शामिल होता है और इस तरह संसद भी एक्ट के अंतर्गत पब्लिक प्लेस के दायरे में आता है।’ संसद में सांसदों के लिए तय किए गए एक स्मोकिंग एरिया ने एंटी टोबेको एक्टिविस्ट को नाराज कर दिया है। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, तंबाकू विरोधी एक हेल्थ इंस्टीट्यूट ने लोकसभा स्पीकर को लेटर लिखकर इस फैसले को गलत बताया है। इंस्टीट्यूट का कहना है कि एंटी टोबेको एक्ट के तहत तय की गई पब्लिक प्लेस की डेफिनेशन में संसद भी आती है और संसद परिसर में सांसदों को स्मोकिंग की इजाजत देना रूल्स के खिलाफ है। लेटर में दिया गया कानूनों का हवाला सुमित्रा महाजन को लिखे गए इस लेटर में सिगरेट एंड अदर टोबेको प्रोड्क्ट एक्ट 2003 (Cigarettes and other Tobacco Products Act 2003) का हवाला देते हुए कहा गया है, ‘एक्ट के सेक्शन-4 के मुताबिक अक्टूबर 2008 से सभी पब्लिक प्लेस में स्मोकिंग बैन है। एक्ट के सेक्शन ...