कई जानकारी सोचने पर मजबूर कर देती है, जिंदगी और कुछ भी नहीं

आरती कुंज बिहारी की, बड़ी देर भाई नंदलाला, बनवारी रे, ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, ज्योत से ज्योत जगाते चलो, हे राम हे राम, दिल अपना और प्रीत पराई, एक परदेसी मेरा दिल ले गया, जाने कहाँ गए वो दिन, मन डोले मेरा तन डोले, मेरा नाम राजू घराना अनाम, ओ दुनियाँ के रखवाले, सबकुछ सिखा हमने, एक प्यार का नगमा है, मौजो की रवानी है जिन्दगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है जैसे गीतों को लिखने वाले गीतकार संतोष आनंद के बारे में आज पढ़ने का मौका मिला। यह उस दौरान हुआ जब मैं @दैनिक भास्कर बिलासपुर संस्करण के 22वें स्थापना दिवस पर सीनियर यशवंत गोहिल ने जब उनके गीत को गाया। कार्यक्रम के दौरान गेस्ट के नाते उन्हें एंकर ने बुलाया और उन्हें कुछ नगमें सुनाने को कहा। इस दौरान उन्होंने शोर फिल्म का यही गीत सुनाया एक प्यार का नगमा है... इस दौरान उन्होंने उनकी जीवनी पर थोड़ा प्रकाश भी डाला। जानकर बहुत कुछ जानने को मजबूर हो गया। अंत में इंटरनेट का सहारा लिया। उनके बारे में जो जानकारी मिली वह गीतकार संतोष आनंद के बारे में जानकर सोचने पर मजबूर हो गया। इतने सारे नगमे लिखने वाले संतोष आनंद जी के जीवन में इतने गम थे। जवानी में उन्होंने एक पैर खोकर संघर्ष शुरू किया तो बुढ़ापे में उनके बेटे और बहु ने आत्महत्या कर उन्हें जीवन को ही गम में डूबो दिया। 16 अक्टूबर 2014 को उनके बेटे और बहु ने भ्रष्टाचार का आरोप लगने पर आत्महत्या कर लिया था। यह मीडिया ने जरूर भूला दिया। लेकिन कब तक जेहन है उनके लिखे गानों को जब जब कोई याद करेगा। उनके बारे में पढ़ेगा और फिर लिखेगा। क्या 76 साल के इस बुजुर्ग गीतकार को न्याय मिला। क्या दिल्ली पुलिस उन्हें न्याय दिला पाई। दिल्ली में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी है, विधानसभा, लेकसभा, राज्यसभा मतलब संसद भी है। जब ऐसे बड़े लोगों को न्याय के लिए इतना इंतजार करना पड़ा और उनके मामले को मीडिया ने दबाकर रख दिया तो देश के हालात पर मीडिया की रिपोर्टिंग कितना कारगर हो रहा है इसको अच्छे से समझा जा सकता है। 

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