कलम का मामला है कड़क से अकड़, पकड़ रहिए साहब
यह लेख कलम की पूजा करने वाले पत्रकारों के लिए है। पत्रकारों में जिस तेजी से नैतिकता के गिरने का दौर शुरू है आने वाले समय में लगता नहीं है कि पत्रकारिता सही मायने में हो पाएगा। मीडिया पर पहले से विज्ञापन तंत्र हावी है। वहीं मालिकाना हक के कारण पंगुता की कगार पर पहुंच चुकी पत्रकारिता में कलम पकड़ने वालों की नैतिकता का गिरना लाजमी तो है, लेकिन जो लिखना चाहते हैं और अपनी पत्रकारिता बनाए रखना चाहते हैं उनके लिए अकड़, पकड़ और कड़क बनाए रखना होगा। लिखे तो क्या लिखे जब पढ़ने वाले की फाड़ कर न रख दे। कुछ साल पहले एक पेन के प्रचार में इंटरव्यू लेने वाला पत्रकार मंत्री से सवाल करता है। बारिश वाली सीन में मंत्री जवाब देने की जगह उल्टा सवाल करता है क्या करोगे लिखकर। उस प्रचार वाले पत्रकार ने बड़ी ही सहजता से जवाब देता है लिखकर फाड़ देंगे। यही होना भी चाहिए। लिखिए तो फाड़ देने वाले अंदाज में। माना यह अब मुमकिन नहीं लेकिन जहां है वहां तो लिखिए। दुश्मनी मत लिजिए लेकिन सच को लिखन के लिए अपने पिछवाड़े में दम तो रखिए। पुस्तक को पठन के दौरन एक लाइन “बलिया जिला घर बा त केकरा से डर बा” इस डर को घर से खत्म करना होगा। पत्रकारिता में डरने का दौर खत्म हो गया है। लोगों को नोटिस का भय बहुत ज्यादा दिया जाता है। उन नोटिस देने वालों को बोल दो आप भेजो तो जवाब जरूर मिलेगा। बस करना यह है कि नोटिस को स्केन करना है और उसे सोशल मीडिया पर प्रकाशित कर देना है। नोटिस भेजने वाले को जवाब वहां पर लोग कमेंट से दे देंगे। आपके पास बस जवाब देने का अंदाज होना चाहिए। कोई भी कानून अभी तक ऐसा नहीं बना जिसे तोड़ा न जा सके। वरना दुनिया में बंदुक की जरूरत नहीं पड़ती। लोग कानून से ही डर जाते।
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