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साइकिल चलाने के चार चरण जिससे गुजरे हम

  साइकिल कहानी का शीर्षक साइकिल है। हम इसी से संबधित बात कर रहे हैं। हमारे जमाने में साइकिल चार चरणों में सीखी जाती थी। हम वह पीढ़ी हैं जो साइकिल को छोटा होते देखें हैं। चित्र की भांति साइकिल छोटी और छोटी और छोटी होती गयी। जब हम साइकिल चलाना शुरू किए तब चार चरण होते थे... पहला चरण   -   टहलाना,  ढुगराना दूसरा चरण    -   कैंची  तीसरा चरण   -   डंडा  चौथा चरण    -   गद्दी  तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं हुआ करता था। क्योंकि तब घर में साइकिल बस पापा या चाचा चलाया करते थे। साइकिल की ऊंचाई भी आज कि तरह नहीं थी। उस समय साइकिल की ऊंचाई कोई 22 से 24 इंच हुआ करती थी। जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी। ऐसी साइकिल को गद्दी से चलाना मुनासिब नहीं होता था। "टहलाना" तब हमें साइकिल टहलाने के लिए ही मिलती थी। इसमें साइकिल के बाएं तरफ के हैंडल को बाएं हाथ से और फ्रेम या गद्दी को दाहिने हाथ से पकड़कर टहलाना होता था। इस दौर में कभी कभी दो लोगों की संयुक्त जिम्मेदारी में छोटे मोटे काम दिया जाता था। उसमें भी एक साथी को साइकिल...

यौन हिंसा: महिलाएं अपने खिलाफ हो रही घटनाओं पर लड़ने आ रही सामने

बिलासपुर। यौन हिंसा उन्मूलन के लिए आज अंतर्राष्ट्रीय दिवस भले मना लें, बावजूद इसके यौन हिंसा की घटनाओं पर देश में कोई कमी आई हो देखने नहीं मिल रही है। राज्य सरकार, केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट कई कानून बनाए हैं। इसके पालन सख्ती के साथ किए भी जा रहे हैं। यौन हिंसा पीड़ित भी अब ऐसी घटनाओं के खिलाफ खुलकर लड़ने के लिए सामने आ रही हैं। तमाम कोशिशें की जा रही हैं ताकि घटनाओं को रोका जा सके। अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने के मसले इससे भी अच्छा है कि लोगों में यौन हिंसा के बारे में जानकारी और जागरूकता आए। हाल ही में घटी चार घटनाओं जिसमें पीड़ित खुद रसूखदार आरोपियों के खिलाफ लड़ने का निर्णय लीं और कोर्ट से सजा दिलवाई। केस -1 आदर्श किड्जी स्कूल के प्राचार्य को 5 साल की सजा आदर्श किडजी स्कूल के प्राचार्य उत्तम वालके ने 2.5 वर्ष की स्कूली छात्रा के साथ यौन शोषण किया। मामले में फास्टट्रैक कोर्ट ने आरोपी प्राचार्य को 5 साल की सश्रम कारावास व अर्थदंड की सजा सुनाई। केस-2 नाबालिग से दुष्कर्म मामले में आरोपियों 25-25 साल की सजा देवरीखुर्द की 13 साल की बच्ची के साथ चार आरोपियों मनोज वाडेकर, चरण सिंह चौहान, ईश्...

बिरप्पन लिट्टे से मिल गया होता तो

अगर सच में बिरप्पन लिट्टे से 2004 में मिल गया होता तो? वर्मा की फिल्म के अनुसार मगर हकिकत कुछ और है... हकीकत यह है कि उसकी जंगल में छुपाई अकूत संपत्ति आज भी नहीं  खोजा न कर्नाटक न ही तमिल की पुलिस।  भारतीय सेना की चल रही कार्रवाई पर भारत की वोट बैंक की राजनीति करने वाली सरकारें न जाने नक्सलवाद पर किस तरह की सोच रखती है यह आज तक पता नहीं चला, लेकिन लिट्टे पर श्रीलंका की महिंदा राजपक्षे सरकार ने जो रूख अख्तीयार किए वह सराहनीय कदम था।  श्रीलंका के गृहयुद्ध में बहुसंख्यक सिंहला और अल्पसंख्यक तमिलो के बीच 23 जुलाई, 1983 से आरंभ हुआ गृहयुद्ध मुख्यतः श्रीलंका की सरकार और अलगाववादी गुट लिट्टे के बीच लड़ा गया। 30 महीनों के सैन्य अभियान के बाद मई 2009 में श्रीलंका की सरकार ने लिट्टे को परास्त कर दिया। इसी के साथ लगभग 25 वर्षों तक चले इस गृहयुद्ध में दोनों ओर से बड़ी संख्या में लोग मारे गए।  यह युद्ध द्वीपीय राष्ट्र की अर्थव्यस्था और पर्यावरण के लिए घातक सिद्ध हुआ। लिट्टे की अपनाई गई युद्ध-नीतियों के चलते 32 देशों ने इसे आतंकवादी गुटों की श्रेणी में रखा। जिनम तथाकथित धर्म और गु...

हर जगह हावी है भाई भतीजावाद

#भाई-#भतीजावाद #Nepotism_in_world #nepotism #nepotism_in_bollywood बॉलीवुड में एक युवक कलाकार की आत्महत्या के बाद नेपोटिज्म अर्थात भाई भतीजावाद की चर्चा एक बार फिर से लहर में है। यह भाई भतीजावाद ना सिर्फ बॉलीवुड में अपितु विश्व के हर संगठन में देखने को मिल रहा है। मैं पत्रकारिता में हूं और दावे से कह रहा हूं कि यह क्षेत्र भी भाई भतीजावाद से अधूरा नहीं है। नेपोटिज्म से पूर्णतः ग्रसित क्षेत्र है। यहां बढ़ वही पाता है जिसके आका(अंकल, भैया) इस फिल्ड के बढ़े ओहदे पर होते हैं। हाल ही में एक सिंगर ने  गायकी के क्षेत्र में भी नेपोटिज्म की बात स्वीकार की। उन्होंने यह स्वीकार किया कि गायन के क्षेत्र में भी गायकों को सही मंच नहीं मिल रहा है। इससे पहले एक महिला कलाकार ने तो खुलकर आरोप लगाया कि कलाकारों को ऑडिशंस में छांटा जा रहा है। सेलिब्रिटी की औलादों को सभी मौका दे रहे हैं। वहां बाॅलिवुड में बाहरी लोगों काम नहीं दिया जा रहा है। जिससे बाॅलीवुड के बाहर के प्रतिभाशाली कलाकारों की प्रतिभा के साथ खिलवाड़ हो रहा है। कुछ घराने बॉलीवुड पर कब्जा कर लिए हैं। इस मामले में मेरा मानना है कि ना सिर्फ ...

कोरोना काल में सब परेशान हुए हैं

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पूरे विश्व कोरोना से परेशान है। भारत के छत्तीसगढ़ से यह तस्वीरें... व्यापारी को कुछ इस तरह घेरा करना पड़ा। किसान सड़क पर धान सुखा रहा हाईकोर्ट में आनलाइन सुनवाई हो रही।  मजदूरों की घर वापसी हो रही। बच्चे खिलौना की जगह मास्क पहन रहेे। पीपीई सूूूट में सेनेटाइजर छिड़काव गर्मी की यात्रा। पैदल राहगीर के जूते घीस जा रहा। संसाधन के अभाव में ट्रकों पर सफर

कोरोना और टिड्डियों से लड़ता भारत

देश में अभी दो तरह की समस्याएं हैं। एक चीन के तरफ से कोरोना वायरस तो दूसरी तरफ पाकिस्तान से टिड्डी दल। ये दोनों समस्याएं भारत के लोगों को परेशान की हुई हैं। दोनों समस्याओं को देखा जाए तो दोनों के फैलने के लिए वर्तमान में उचित समय है। क्योंकि तापमान, मौसम, वातावरण सबकुछ इनके लिए उपयुक्त है। हर साल बदलते मौसम के साथ कोई न कोई नई बीमारी आती ही हैं, यह नई बात नहीं है। हालांकि कुछ दशकों से यह लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कुछ ऐसी ही बीमारियां भारत में देखने को मिली है। मलेरिया, टाइफाइड के बाद भारत में एचआईवी, चिकनगुनिया, फैलेरिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू , वर्ल्ड फ्लू, चमकी बुखार आदि फैले हैं। अभी कोरोना काल चल रहा है, बड़ी संख्या में लोग इस वायरस से प्रभावित हुए हैं। कई लोगों की जान गई है। विश्व इस महामारी से परेशान है। इसी बीच पाकिस्तान से उड़कर बड़ी संख्या में टिड्डियों का दल भारत में आ गया है जो यहां की फसलों को तबाह कर रहा है। यह भी एक महामारी ही है जो इंसानों पर भारी पड़ रही है। क्योंकि जब इंसान के पास खाने के लिए दाने ही नहीं रहेंगे तो वह भी स्वयं मौत के कगार पर चला जाएगा। ...

श्रमिक चाइना से नहीं आए फिर अप्रवासी या प्रवासी कैसे हो गये

#श्रमिक भारत के ज्यादातर राज्यों से मजदूरी की तलाश मेें एक बड़ा वर्ग हजारों किलोमीटर का सफर करता है। इसमें अनपढ़ और अकुशल मजदूरों के साथ ही पढ़े लिखे कुशल श्रमिक भी शामिल हैं। जो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद जैसे महानगरों के अलावे छोटे छोटे नगरों में रोजगार की तलाश के लिए आए हुए हैं। पेट में  और बेरोजगारी का आलम यह है कि जिसे जहां रोजगार मिल गया वह वही अपना पेट पालना चाहता है। 5-10 हजार से लेकर इस 30- 35 हजार तक महीने के लिए हजारों हजार किलोमीटर का सफर यह वर्ग तय करता है। इन श्रमिकों में निम्न आय और मध्यमवर्गीय परिवार के बेरोजगार ज्यादा होते हैं। सब अपना श्रम बेचते और पैसा कमाते हैं। तभी तो यह श्रमिक हैं। भारत में श्रमिक कब अप्रवासी और प्रवासी हो गए पता ही नहीं चला। यह ना तो चाइना से आए हैं ना अमेरिका से ना ही पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश से यह भारत के ही श्रमिक हैं कामगार हैं। जो मजदूरी की तलाश में अपने घरों को छोड़कर दूसरे राज्यों की ओर रूख किए हुए हैं। इनको प्रवासी अप्रवासी श्रमिक तो नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह भारत के नागरिक हैं और भारत का संविधान सभी क...

झीरम हमला की यादें

शाम के पांच बजे थे, यूनिवर्सिटी से छूटने के बाद हास्टल के लिए आया और क्या चल ‌रहा जानने के‌ लिए टीवी पर न्यूज लगाया था। तभी एक के बाद एक फूल स्क्रीन ब्रेकिंग आना शुरू हो गया। दरभा में नक्सली हमला... कांग्रेस के काफीले पर‌ नक्सली हमला... दरभा के झीरम घाटी में हमला हुआ है... पत्रकार के लिए यह अनुमान लगाना कठीन नहीं था, क्या हुआ होगा। वह भी उस क्षेत्र के पत्रकार के लिए जहां आए दिन नक्सली घटनाएं होती हैं। जर्नलिज्म के दूसरे सेमेस्टर का स्टूडेंट भले कुछ न समझ पाए लेकिन यह बड़ी घटना है एक पत्रकार के लिए समझना कठिन न था। उसके बाद कौन टीवी से हटता है, लगातार अपडेट आ रहे थे। महेंद्र कर्मा की हत्या.... नंदकुमार पटेल व दीपक पटेल का अपहरण.... पुलिस मौके पर पहुंची... विद्याचरण शुक्ल गंभीर रूप से घायल... जगदलपुर मेडिकल काॅलेज‌ में भर्ती... रायपुर के कई नेता थे उस काफीले मे.... मातम‌ का लहर छाया... चुनाव से ठीक छह माह पहले घटना हुई। इसके बाद भी प्रदेश में भाजपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई‌। वजह स्पष्ट था, कांग्रेस में कोई भी शीर्ष नेता नहीं बचा था। जो थे उनपर लोगों को भरोसा नहीं था ऐसा बि...

दिल्ली दूर है तो क्या इरादे भी मजबूत हैं

दिल्ली के कई किस्से और कई कहानियां हैं। खुशी है, दर्द है इसके कई गम हैं। दिल्ली कभी दिलवालों की हो जाती है। तो कभी काम की तलाश में निकले बेरोजगारों की। रोजगार की तलाश में निकले मजदूरों की। अच्छे वेतन में नौकरी करने वालों की, उच्च शिक्षा के लालायित पढ़ाई करने वाले छात्रो की। सिविल सेवा की तैयारी करने वाले उच्च महत्वाकांक्षी युवाओं की।‌ दिल्ली राजनीति में भविष्य तलाशने निकले नेताओं और दहशत फैलाने निकले आतंकियों की हो जाती है। दिल्ली कभी मांग पूरी नहीं होने पर विरोध करने का जगह होती है तो कभी दंगा फैलाने की। यह दिल्ली है यह कहने को तो केंद्र शासित प्रदेश है और यहां एक नहीं दो-दो राजधानियां और दो-दो सरकारों काम करती हैं, लेकिन व्यवस्था एक से भी सही नहीं हो पा रही। हिंदी पट्टी के ज्यादातर लोग (लोग इसलिए क्योंकि बच्चे से बुजुर्ग तक सभी) अपने जीवनकाल में एक बार दिल्ली जरुर जाना चाहते हैं। तभी तो कहावत भी बनी दिल्ली अभी बहुत दूर है।        स्कूल की किताबों में विज्ञान का चमत्कार (wonder of science) पढ़ाया जाता है जिसमें संसाधनों के बढ़ने और मेट्रो रेल के चलने से इसकी दूर...

बेरोजगार और लाचार मजदूरो की घर वापसी महंगाई और भुखमरी को जन्म देगी

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बिलासपुर में बैग ठीक कराते हुए मजदूर , किसान के लिए भारत में आजादी के बाद से सैकड़ों आंदोलन हुए हैं। कितनी ही पार्टियां और लोग मजदूर व किसान के हित के लिए लड़ते लड़ते अरबपति बन गये। पार्टियां सरकार बना लीं तो लड़ने वाले लोग मंत्री बन और अरबपति बन गये। नहीं बदली तो किसान व मजदूरों की समस्याएं उनकी किस्मत उनकी हालात। कल भी मजदूर मजदूरी करने, पेट पालने, भुखमरी से बचने पलायन कर रहा था, आज भी मजदूर पलायन कर रहाहै। कुछ गुदड़ी के लाल हुए होंगे जो आगे बढ़ गये होंगे उनकी गिनती लाखों में एक-दो होगी। लेेेेेकिन मजदूरों के हालात आज भी वही है, परिस्थितियां आज भी वैसी ही है जैसी आजादी के वक्त थी। मजदूरों के पास काम नहीं है, सरकारें राहत पैकेज की घोषणा पर घोषणा कर रही हैं। मजदूरों की घर वापसी करवा रही हैं। यह सोचे बिना कि यह मजदूर घर वापस जाकर क्या काम करेंगे। घर में बिना काम किए कितने दिन रहेंगे। उन उद्योगों का क्या होगा जहां ये काम कर रहे थे। उनके उत्पादन का क्या जिससे जीवन आसान हो रही थी। महंगाई कम थी‌। घर में रहकर मजदूर कितने दिन काम‌ नहीं करेगा। कितने दिन तक सरकारें इनको बिना काम क...