बिरप्पन लिट्टे से मिल गया होता तो
अगर सच में बिरप्पन लिट्टे से 2004 में मिल गया होता तो?
वर्मा की फिल्म के अनुसार
मगर हकिकत कुछ और है...
हकीकत यह है कि उसकी जंगल में छुपाई अकूत संपत्ति आज भी नहीं खोजा न कर्नाटक न ही तमिल की पुलिस।
भारतीय सेना की चल रही कार्रवाई पर भारत की वोट बैंक की राजनीति करने वाली सरकारें न जाने नक्सलवाद पर किस तरह की सोच रखती है यह आज तक पता नहीं चला, लेकिन लिट्टे पर श्रीलंका की महिंदा राजपक्षे सरकार ने जो रूख अख्तीयार किए वह सराहनीय कदम था।
श्रीलंका के गृहयुद्ध में बहुसंख्यक सिंहला और अल्पसंख्यक तमिलो के बीच 23 जुलाई, 1983 से आरंभ हुआ गृहयुद्ध मुख्यतः श्रीलंका की सरकार और अलगाववादी गुट लिट्टे के बीच लड़ा गया। 30 महीनों के सैन्य अभियान के बाद मई 2009 में श्रीलंका की सरकार ने लिट्टे को परास्त कर दिया।
इसी के साथ लगभग 25 वर्षों तक चले इस गृहयुद्ध में दोनों ओर से बड़ी संख्या में लोग मारे गए। यह युद्ध द्वीपीय राष्ट्र की अर्थव्यस्था और पर्यावरण के लिए घातक सिद्ध हुआ। लिट्टे की अपनाई गई युद्ध-नीतियों के चलते 32 देशों ने इसे आतंकवादी गुटों की श्रेणी में रखा। जिनम तथाकथित धर्म और गुट निरपेक्ष राष्ट्र भारत भी शामिल था। इसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपीय संघ के बहुत से सदस्य राष्ट्र और अन्य कई देश हैं। एक-चौथाई सदी तक चले इस जातीय संघर्ष में सरकारी आंकड़ों कि माने तो इसके अनुसार लगभग 80 हजार लोग मारे गये, जबकी इससे कहीं ज्यादा लोग इस कार्रवाई के दौरान मारे गए। बावजूद इसके कि अमेरिका क्या कहेगा, यूरोप क्या कहेगा, चीन क्या कहेगा श्रीलंका की सरकार ने कार्रवाई की। अब लडने की बारी हमारी सरकार की है।
युद्ध में प्रभाकरण का मारा जाना श्रीलंका के लिए रावण वध से कम न था। उस मौत के बाद एसा लगा जैसे पहले लंका में रावण को और उसके बाद कोई युद्ध हुआ होगा जिसमें श्रीलंका की सरकार ने प्रभाकरण जैसे राक्षस को मारकर उसके विरुद्ध युद्ध को समाप्त किया। प्रभाकरण के दो बेटे थे?
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