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महंगाई, खेल और पारिवारिक मेल की कहानी है प्रेम रतन धन पायो

फिल्म प्रेम रतन धन पायो एक अच्छी कहानी है। इसे एक बार देखा जा सकता है। यह फिल्म मिली जुली पारिवारिक झगड़े और कहानी से लवरेज है। गुदगुदी है तो अच्छी मारपीट और इमोशनल ड्रामा भी है। फिल्म में उतना सब है जिससे लोग फिल्म देख सके। आप परिवार के साथ यह फिल्म देख सकते हैं, इसमें सलमान खान का दोहरा रोल, और सोनम की अच्छी अदाकारी तो है ही संजय मिश्रा सहित अन्य किरदार भी अपनी भूमिका अच्छे से निभाया है। फिल्म में महिला खेल को जहां बढ़ावा दिया गया है, वहीं सौतेली बहनों को भी हक दिया जाए यह भी दिखाया गया है। इसमें महंगाई पर तंज भी है तो पारिवारिक मेल की कहानी भी है। कुल मिलाकर एक अच्छे फिल्म के रूप में इस फिल्म को भी लिया जा सकता है। वैसे भी भारतीय दर्शक अंत में इमोशनल टच चाहते हैं तो इसमें इमोशनल टच भी है, हैपी इंडिंग के साथ फिल्म अच्छी है। दिवाली से भाई दूज तक के बीच की कहानी है प्रेम रतन धन पायो।

डूबते सूरज के चमक और आदर्श को नमस्कार है

उगते सूरज को तो सब नमस्कार करते हैं, हम डूबते सूरज को भी नमस्कार करते हैं। इसके पीछे हमारी सोच है कि जब हम सबसे ज्यादा समय सूरज की रौशनी से निकालते है और वह डूब रहा हो तो नमस्कार करना जरूरी हो जाता है। इसलिए भारत ही नहीं पूरी दुनिया को डूबते सूरज का महत्व बताता है हमारा छठ। यह एक ऐसा त्योहार है जिसे न हिंदू मनाते है न मुस्लमान ठूकराते है यह हर्षोल्लास और नमस्कार का त्योहार है। इसे सब मिलजूलकर मनाते हैं। इसे क्या हिंदू और क्या मुसलमान जिस जगह पर शुरू हो जाए यह त्योहार सब इसके व्रती के लिए रास्ते बुहारने लगते है। डूबते सूरज को उसकी चमक और आदर्श के लिए नमस्कार करते हैं।  उगते हुए सूरज से तेज, शौर्य, साहस, उर्जा और शक्ति की जहां कामना होती है, वहीं उसके डूबते हुए रूप से शांति की कामना करते हैं। सूरज का डूबना मतलब जीवन में अंधेरा आ जाना नहीं होता, बल्कि शांति और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए कुछ समय का अंधकार जीवन में नई उर्जा, रोशनी भरने के लिए होती है। यह डूबता सूरज अंधेरा जरूर लाता है, लेकिन उसका उगता हुआ स्वरूप सिर्फ और सिर्फ उजाला का आदर्श बनकर आता है। उगता सूरज भी लालीमा लिए ...

दुनिया की फ़ैशन और ग्लैमर राजधानी पेरिस आई लव यू

दुनिया की फ़ैशन और ग्लैमर राजधानी पेरिस में आईएसआईएस ने हमला किया। चाहे जितना भी हमला करलो दुनिया में इंसानियत है रहेगी। खुबसुरत शहर पर हमला का मतलब है इनकी मानसिकता मर गई है। ऐसे मुर्दादिल लोगों के लिए बस बददुआएं हैं। ऐसे लोग न अपने देश के हैं न दुनिया के लिए हैं। नामर्द हैं ऐसे लोग जो बेकसूरो पर कहर बरपा रहे हैं। ऐसे काफिर लोग दुनिया में न रहे वहीं अच्छा है। हम डंके की चोट पर कहते हैं आई लव यू पेरिस हम पेरिस के साथ है। भारत के तमाम लोग पेरिस के साथ। हमारे ऊपर भी हमला हुआ था। अमेरिका 9/11 को, भारत 26/11 को और दुनिया 13/11 को कभी नहीं भूल सकती। दुनिया के लिए यह तीनों तीन काली करतूत करने वालों की काली हरकत के लिए जाना जाएगा। अमेरिका में 2001 में हमला हुआ था, भारत में 2008 में और पेरिस पर 2015 में बड़ा हमला हुआ है। हर सात साल या उसके बाद ये आंतकी किसी न किसी देश में बड़ा हमला किए हैं। कहर बरपाए हैं। आंतकी देशों को खत्म करना जरूरी है, जिहाद के लिए तैयार होने वाले लड़के देशों पर दुनिया को नजर रखना जरूरी है। इन तमाम देशों पर नजर रखकर उन्हें खत्म करना जरूरी है, क्योंकि ये लोग बेकस...

पेरिस का हमला मानवता को शर्मशार कर दिया

पेरिस में इंसानियत को शर्मशार करने वाला मामला हुआ है। इंसानियत को हिला देने वाला और दुनिया और मानवता के लिए घातक और कलंकित करने वाला है। इस हमले के पीछे जो भी हो वे नहीं चाहते कि दुनिया में इसांन रहे। यह लोग शैतानी हरकत कर दुनिया में तबाही मचाने की ठान ली है। इंसानियत को बचाने के लिए जरूरी है कि दुनियाभर के तमाम देश एकजुट होकर इस तरह की हरकतों से लड़े। भारत, अमरिका, चीन, फ्रांस, जापान जैसे देशों को पेरिस की मदद करने के साथ ही आत्मघाती हमला करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी करनी चाहिए। इससे इंसानियत को बचाया जा सकेगा। इसके साथ ही इस हमलावरों के बारे में जानकारी निकाली जाए वह किस देश में सबसे ज्यादा हैं उनके ठीकानों से इंसान को निकालकर इन शैतानों को खत्म किया जाए। हमले में 100 से अधिक लोग मारे गए हैं, उतना ही घायल हैं हम प्रार्थना करते हैं कि मरने वालों के आत्मा को भगवान शांति प्रदान करे। उनके परिजनों को इस दुख से निकलने में मदद करे। साथ ही घायल जल्द से जल्द ठीक हों। 

स्याही तेजाबी बनाओ जी

कलम की स्याही को तेजाबी बनाओ जी जहां लिखे वहां आग लग जाए ताकत कलम की बढ़ाओ जी जहां लिखे वहां आग लग जाए मानसीकता मर गई है इंसान की, अब तो राज है बैमान की कलम को मजबूर नहीं कलम मजबूत करो जी ताकी आग लग जाए कलम मजबूत पकड़ो जी ताकी आग लग जाए... कलम के पुजारियों को अब सड़क पर उतरने की जरूरत पड़ गई है, उसके बाद भी लोग कह रहे हैं कि सब कुछ सामान्य है। जबकि देखिए तो देश का वातवरण बहुत खराब हो गया है। साहित्यकारों को प्रतिरोध में उठ खड़ा होना पड़ा है। इससे सरकार के कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। बड़ती संप्रदायिक हिंसा के विरोध में साहित्याकार विरादरी मुखर हो गई है। साहित्यकारों का कहना है कि सरकार, भारत की सांस्कृतिक विविधता की हिफाजत करने में नाकाम रही है। इसका सीधा अभिप्राय है सरकार पर हमला है यह साहित्यिक पुरस्कारों को लौटाने का। इसके साथ ही एक दूसरा तरिका भी है जिससे सरकार को चेताया जा सकता है वह है लेख और समाचारों को लिखकर। देश के साहित्यकारों को इसके लिए भी आगे आना होगा। जब अंग्रेजों का शासन काल था तब भी लेख महत्वपूर्ण थे, उस समय कलम की स्याही में तेजाब निकलती थी, जहां जो भी लेख पड़ता थ...

दौलतवालों की दमदार दिवाली, किसान के हिस्से में क्या होगी

दिवाली आ गई है, उससे पहले धनतेरस है। इस धनतेरस पर खरीददारी करने इतना आसान नहीं होगा। खरीददारी करने के लिए दौलत, दिल और दम जिसके पास होगा वहीं खरीददारी कर पाएगा। यह दिवाली तंगी में बितना तय हो गया है। दाल, तेल और खाद्यान के बढ़े भाव और देश में सुखा की स्थिति ने दिवाली को दिल से मनाने के लिए तैयार नहीं होने दे रहा है। दिल भी कैसे मान जाएगा कि किसान जो हमें खिलाने के लिए रात-दिन एक करते हैं वे इस दिवाली खाली पेट होंगे। उनकी दिवाली कैसे मनेगी यह किसी ने सोचा है, शायद नहीं... यह सोचने का वक्त किसके पास है। दौलत है दिवाली दिल से मनाएंगे। काश यही किसान समझ जाते की दौलत के लिए पुंजी पतियों को वे अपना जमीन बेंच देते और दौलत लेकर देश को भूखे मरने छोड़ देते, लेकिन वे ऐसा करते नहीं क्योंकि भले ही वे गरीबी में आत्महत्या कर लेंगे, लेकिन किसी को भूखे मरने नहीं देंगे। उनसे दौलत मंद कौन हो सकता है, लेकिन यह वर्ग उतना ही उपोक्षित और निरीह रहा है। किसान सदियों से गरीब है, गरीब रहा है और गरीब रहेगा। वजह इसके पीछे है पहले राजाओं ने फिर सामंतों ने उसके बाद साम्राज्यवादियों ने सिर्फ और सिर्फ किसानों का शोषण...

राज्योत्सव नहीं मनाने पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नाम पत्र

माननीय मुख्यमंत्री जी, तीन दिन का राज्योत्सव नहीं मनाने से सुखा के संकट से नहीं उबर पाएंगे। इसके लिए होगा कि 365 दिन जो आप राज्य में बेरोजगारी है उसे खत्म किजीए। लोगों को रोजगार मिलेगा तो वे महंगा खाना खाने को तैयार हो जाएंगे। इससे जिस किसान के विकास की बात देश आजादी के बाद से सुन रहा है उसका भी भला होगा। उसके उपज के वाजिफ रेट दिलाएं ताकि उनका विकास हो सके। जितना उद्योग लगाना जरूरी है उतना ही जरूरी है किसान खेत में काम करें। नदियों पर बांध बनाने की जरूरत है, सिर्फ कोयला के खान से कोयला निकालने से कुछ नहीं होगा, यहां पर पावर प्लांट लगाने से कुछ नहीं होगा प्लांट लगाना भी जरूरी है पौधे की संख्या लगातार घट रही है। जगंल के क्षेत्र घट रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का सिर्फ उत्खनन नहीं किया जाए, बल्की सौर्य उर्जा का भी उपयोग हो, नदियों का कचरा डालने और उद्योगों कि गंदगी बहाने, शहर के नालियों को उससे जोड़ने का बजाय उसकी गंदगी दूर करने पेय जल लेवल ठीक होगा। उस पर बांध बने यह जरूरी है। इस ओर आप का ध्यान केंद्रीत हो ताकि किसानों के साथ ही बेरोजगारों का विकास हो सके। माननीय आपको उम्मीद के साथ जनता ...

पारिवारिक विवाद में गई दलित बच्चों की मौत पर आंसू बहाने वालों अब बताओ ब्राह्मण का बच्चा क्यों मरा

हरियाणा में पारिवारिक विवाद में गई दलित बच्चों की मौत पर आंसू बहाने वालों अब बताओ कि छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में ब्राह्मण का बच्चा क्यों मरा। इस पर तुम्हारी आवाज क्यों बंद है। वह इलेक्ट्रानिक मीडिया क्या सिर्फ दिल्ली और दिल्ली के हगे का गुह उठाने के लिए नोयड़ा में बैठी है। देश के दुरस्थ अंचलों की आवाज क्यों नहीं उठ रही है। बिलासपुर में हाईकोर्ट है यहां कि आवाज नेशनल स्तर पर क्यों नहीं उठाई गई। एसडीएम कोर्ट के सामने आखिर एक ब्राह्णण का बच्चा आत्मदाह क्यों कर लिया। सरकार हाईकोर्ट से यह जगह महज 6 किमी दूर था न। न्यायधानी में अधिकारियों कि लापरवाही से नसबंदी, न्यायधानी में अधिकारियों की वजह से आत्मदाह आखिर क्यों नहीं आए वे लोग बोलने आखिर क्यों नहीं उसके लिए हो रहा है देश की मीडिया में चर्चा। देश की मीडिया आखिर चूप क्यों है खाज तक से लेकर रंडी टीवी तक सब के सब बंद क्यों है। कांग्रेस शासन काल में बना कानून कांग्रेसियों की मौत की वजह क्यों बन रही है? कांग्रेस शासन काल में 1947 से 1950 तक कानून और संविधान बना है। इसी में से कुछ कानून 107, 116 भी बाद में बन गया। इसी कानून के कारण बिल्हा में द...

20 दिन दो मौत...वजह एक फंडा 107,116

कैसी कानून व्यवस्था है बिलासपुर में... 107, 116 की पेशी के बाद जमानत नहीं मिलने से हाईकोर्ट से महज 6 किमी दूर दो लोगों की मौत हो चुकी है। यह जो धारा है किसी हत्या या बलात्कार करने के लिए नहीं बल्कि सामान्य शांति भंग के लिए उपयोग की जाती है। जानकार कहते हैं कि इसकी जमानत मुचलके पर थाने से हो जाती है। इसके बाद भी दो की मौत हो जाना कुछ तो वजह रही होगी। यह न्यायधानी है यहां कानून का मजाक बन गया है। न जाने न्याय के लिए और कितनी मौत देखनी होगी बिलासपुर के लोगों। केस 1  सेवती के जीवनलाल मनहर । 6 अक्टूबर को पेशी के बाद  सेवती के जीवनलाल मनहर को सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। उसे जमानत नहीं मिलने से पुलिस जेल भेज दी थी। देर रात उसे जमानत मिली। उसके खिलाफ गांव के सरपंच ने तालाब के विवाद में शांति भंग हो जाने की शिकायत किया था। यह मामला पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। इसके बाद भी उसे जेल भेजा गया। हलांकि जानकार कहते हैं कि 107, 116 में थाने से मुचलका पर जमानत हो जाती है, इसके बाद भी बंदपत्र प्रस्तुत करने पर एसडीएम ऐसे मामले में आरोपी के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई कर सकता है। हुआ ...

कानून का मजाक नहीं बने हाईकोर्ट से निवेदन बिल्हा मामले को संज्ञान में ले

बिलासपुर जल रहा है, कैसे उम्मीद करें कि नक्सलवाद मिट जाएगा। कानून से लोगों का भरोसा उठ रहा है लोग कहां जाए? कोर्ट के सामने आत्मदाह कोई मामूली नहीं, जेल में जमानत मिले व्यक्ति की मौत कोई मामूली नही। हाईकोर्ट से निवेदन है इस मामले में सवत: संज्ञान में लेकर पीड़ितों को न्याय दिलाएं। वाह रे न्याय व्यवस्था। आंतकी को बचाने सुप्रीम कोर्ट रात में खुल सकता है, लेकिन जमानत मिलने के बाद जेल से आरोपी नहीं छूट सकता कैसा कानून है यह कैसी न्याय प्रणाली है यह? - इन दुखद घटनाओं को देखकर भारत के  कानून को क्या नाम दूं...? - ओ जलता रहा और काले कोर्ट पहने, सफेद पोस लोग सब देखते रहे...? - ओ एक था और आप सौ...उसे बचा नहीं पाए लानत है आपको। बिलासपुर में 20 दिन दो मौत...वजह एक फंडा 107,116 107, 116 की पेशी के बाद जमानत नहीं मिलने से हाईकोर्ट से महज 6 किमी दूर दो लोगों की मौत हो चुकी है। यह जो धारा है किसी हत्या या बलात्कार करने के लिए नहीं बल्कि सामान्य शांति भंग के लिए उपयोग की जाती है। जानकार कहते हैं कि इसकी जमानत मुचलके पर थाने से हो जाती है। इसके बाद भी दो की मौत हो जाना कुछ तो वजह रही ...