दौलतवालों की दमदार दिवाली, किसान के हिस्से में क्या होगी

दिवाली आ गई है, उससे पहले धनतेरस है। इस धनतेरस पर खरीददारी करने इतना आसान नहीं होगा। खरीददारी करने के लिए दौलत, दिल और दम जिसके पास होगा वहीं खरीददारी कर पाएगा। यह दिवाली तंगी में बितना तय हो गया है। दाल, तेल और खाद्यान के बढ़े भाव और देश में सुखा की स्थिति ने दिवाली को दिल से मनाने के लिए तैयार नहीं होने दे रहा है। दिल भी कैसे मान जाएगा कि किसान जो हमें खिलाने के लिए रात-दिन एक करते हैं वे इस दिवाली खाली पेट होंगे। उनकी दिवाली कैसे मनेगी यह किसी ने सोचा है, शायद नहीं... यह सोचने का वक्त किसके पास है। दौलत है दिवाली दिल से मनाएंगे। काश यही किसान समझ जाते की दौलत के लिए पुंजी पतियों को वे अपना जमीन बेंच देते और दौलत लेकर देश को भूखे मरने छोड़ देते, लेकिन वे ऐसा करते नहीं क्योंकि भले ही वे गरीबी में आत्महत्या कर लेंगे, लेकिन किसी को भूखे मरने नहीं देंगे। उनसे दौलत मंद कौन हो सकता है, लेकिन यह वर्ग उतना ही उपोक्षित और निरीह रहा है। किसान सदियों से गरीब है, गरीब रहा है और गरीब रहेगा। वजह इसके पीछे है पहले राजाओं ने फिर सामंतों ने उसके बाद साम्राज्यवादियों ने सिर्फ और सिर्फ किसानों का शोषण किया। उनसे मोटी रकम कर के रूप में वसूले, कम उत्पादन पर उनके ऊपर अधिक टैक्स लगाए गए। इस अंग्रेजी टैक्स ने किसानों का वैक्स कर के रख दिया है। अंग्रेजों के टैक्स और मुगलो कर अधिरोपित कर चाबूक मारा जाता था। यह किसानों के साथ आजादी के बाद भी होता रहा और कानून बन गया। आजादी के 60 साल बाद भी इसमें सुधार नहीं हो सका। न बाबा अंबेडकर ने किसानों के लिए कुछ कानून बनाया और न ही उनके लिए महात्मा गांधी ने कुछ किया। किसान तब भी निरीह रहा और आज भी है। किसान उन हरिजनों और उन जनजातियों से भी पिछड़ा रह गया जो आज के समय में शासन कर रहे हैं। किसान किसी जाति का नहीं होता इस लिए वह मर रहा है तो मरे, किसान वोट बैंक नहीं बना इसलिए उसके तरफ किसी का ध्यान नहीं है, लेकिन किसान दिवाली पर उजाला कि हमेशा मन्नत करता है, कामना करता है, लेकिन उसके लिए हम क्या फरियाद करते हैं?

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