स्याही तेजाबी बनाओ जी

कलम की स्याही को तेजाबी बनाओ जी जहां लिखे वहां आग लग जाए
ताकत कलम की बढ़ाओ जी जहां लिखे वहां आग लग जाए
मानसीकता मर गई है इंसान की, अब तो राज है बैमान की
कलम को मजबूर नहीं कलम मजबूत करो जी ताकी आग लग जाए
कलम मजबूत पकड़ो जी ताकी आग लग जाए...
कलम के पुजारियों को अब सड़क पर उतरने की जरूरत पड़ गई है, उसके बाद भी लोग कह रहे हैं कि सब कुछ सामान्य है। जबकि देखिए तो देश का वातवरण बहुत खराब हो गया है। साहित्यकारों को प्रतिरोध में उठ खड़ा होना पड़ा है। इससे सरकार के कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। बड़ती संप्रदायिक हिंसा के विरोध में साहित्याकार विरादरी मुखर हो गई है। साहित्यकारों का कहना है कि सरकार, भारत की सांस्कृतिक विविधता की हिफाजत करने में नाकाम रही है। इसका सीधा अभिप्राय है सरकार पर हमला है यह साहित्यिक पुरस्कारों को लौटाने का। इसके साथ ही एक दूसरा तरिका भी है जिससे सरकार को चेताया जा सकता है वह है लेख और समाचारों को लिखकर। देश के साहित्यकारों को इसके लिए भी आगे आना होगा। जब अंग्रेजों का शासन काल था तब भी लेख महत्वपूर्ण थे, उस समय कलम की स्याही में तेजाब निकलती थी, जहां जो भी लेख पड़ता था उसके अंदर आग लग जाती थी विरोध के लिए। इन लेखों से निकली आग ने लोगों में इतना आग लगा दिया था कि अंग्रेज देश छोड़कर भाग गए थे। लोग जान देने से नहीं गुरेज खाते थे और अंग्रेजों को इसी बात की डर हो गई थी। यही हाल वर्तमान में भी हो गया है। हालात यह है कि देश के बड़े साहित्यकार और फिल्म जगत से जुडे लोगों को सड़क पर उतरकर विरोध करना पड़ा है। यह पहला मौका है जब देश के लिए इतनी बड़ी संख्या में सभी वर्ग विरोध करने सड़क पर उतरी है। यह कोई समान्य घटना नहीं है इससे सरकार अगर सचेत नहीं हुई तो परिणाम बहुत भयावह होंगे। 

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