अपनी गहराइयों में मुकम्मल हूं

 अपनी गहराइयों में मुकम्मल हूँ,

तेरी ऊंचाइयों से क्या लूंगा।

जो ख्वाब तूने सजाए हैं आसमानों में,

मैं अपनी जमीं से सिला लूंगा।


कोई रोशन करे अपनी राहों को,

मैं तुझसे चिराग़ नहीं मांगूंगा।

जो रोशनी है मेरे दिल की धड़कनों में,

मैं उसी से अपना जहाँ सजा लूंगा।


कोई कुछ भी मांगे दुआओं में,

मैं अपने सफर से दुआ लूंगा।

मुसाफिर हूँ, मेरे हर रास्ते का हमराज़ हूँ,

हर मोड़ से अपना पता लूंगा।


जो शोहरत तेरी ऊंचाइयों ने दी है,

उससे मेरा कोई वास्ता नहीं।

मेरे सुकून की जो जगहें हैं,

मैं बस वही अपना गुलिस्तां लूंगा।


चाहे कांच के महल बने हवाओं में,

मैं मिट्टी की खुशबू से घर बना लूंगा।

तेरी बुलंदियों के पीछे जो खामोशियाँ हैं,

उनसे बेहतर अपनी सादगी को निभा लूंगा।


जो इम्तिहान हैं इस सफर में बाकी,

उनसे डरकर नहीं भागूंगा।

मैं मुसाफिर हूँ, यही मेरी पहचान है,

हर राह पर नया मुकाम बना लूंगा।


अपनी गहराइयों में मुकम्मल हूँ,

तेरी ऊंचाइयों से क्या लूंगा।

कोई कुछ भी मांगे दुआओं में,

मुसाफिर हूँ, मैं रास्ता लूंगा।


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