वेश्यावृत्ति प्रोफेशन, वेश्यालय चलाना गैरकानूनी
सेक्स वर्क को वैध या अवैध और इसे जायज ठहराने न ठहराने पर अभी बहस चल रही है। यह एक पेशा और प्रोफेशन है इसे पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने माना यह बढ़ी बात है। आदमी शरीर के हर अंग से धन कमा सकता है इसे सभी को स्वीकार करना होगा। इससे पहले ट्रांसजेंडर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था, अब वेश्यावृत्ति पर महत्वपूर्ण आदेश दिया है। इससे अब उन लोगों का जीवन बेहतर होगा हो दूसरा काम या शारीरिक श्रम नहीं कर सकते वह सेक्स वर्कर के रूप में भी अपना करियरआगे बढ़ा सकते हैं। क्योंकि ज्यादातर मजदूर हाथ और पैर का इस्तेमाल कर धन अर्जित करते हैं। कुछ मुंह और दिमाग का करते थे अब इस फैसले के बाद कुछ योनीऔर लिंग का उपयोग कर अपना जीवन यापन बेहतर बना पाएंगे। हालांकि भारत में कुछ जातियां में वेश्यावृत्ति की परंपरा रही है। प्राचीन काल में नगर वधू और अब वेश्यावृत्ति हर समय हर काल में यह रहा तो है, स्वीकार्य तो है, लोग चाहते तो है यह व्यवस्था हो लेकिन खुलकर कभी सामने नहीं आते। वैसे ही जैसे शराब पीते तो हैं, लेकिन परिवार के सदस्य जान न जाएं इसलिए उनसे छुपाते हैं। ठीक वेश्यावृत्ति से आनंद की प्राप्ति के लिए बैंकाक और थाईलैण्ड जाना सब चाहते है, नागपुर, बनारस, कोलकाता, दिल्ली के कोठों में जाना सब चाहते, लेकिन यह राज रहे इस शर्त पर। भारत का हर वर्ग वेश्यावृत्ति का द्योतक है। हर वर्ग में यह व्याप्त है। लेकिन जहां मध्यम वर्ग इसे विकल्प के रूप में देखता है तो उच्च वर्ग लिए यह विलासिता है, जबकि निचले तबके के लिए यह सिर्फ नित्यक्रिया की वस्तु है। यहां अलग-अलग तरह के सेक्स वर्कर्स और ग्राहक मिलेंगे। इनमें जहां निचले तबके में घर वाले ही इसे कानूनी मान्यता दे देते हैं, उनके लिए सिर्फ पैसा मायने रखता है। क्योंकि उनके लिए लिंग और योनी सिर्फ और सिर्फ शौच का अंग मात्र है। उन्हें इसके बदले पैसा, रोजगार या दूसरा लाभ हो तो भी स्वीकार कर लेते हैं, और न हो तब भी दूसरे की इच्छा के लिए भी कर लेते हैं। वहीं उच्च वर्ग अपने सैटिस्फेक्शन मात्र के लिए कितना भी पैसा खर्च कर सकते हैं। जबकि मध्यमवर्ग इसे अपने विकल्प के लिए उपयोग करते हैं, जहां उन्हें लगता है कि काम फंस गया है तो वह अपने आप को परोसने में पीछे नहीं हटते। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब सिनेरियो बदलेगा और लोग इस प्रोफेशन को भी सम्मान की नजर से देखेंगे। यहां तक कि उम्मीद लगाई जा रही है कि देश में बलात्कार की घटनाओं में भी कमी आएगी। अखबारों की रिपोर्ट की माने तो अकेले भारत में लगभग 25 लाख से 1 करोड़ लोग सेक्स वर्कर हैं। यह वोट बैंक भी हैं। इसलिए भी उम्मीद लगाई जा रही है कि केंद्र और राज्य की सरकारें इस ओर जरुर ध्यान देंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि “वेश्यावृत्ति एक पेशा है और सेक्स वर्कर्स कानून के तहत सम्मान और समान सुरक्षा के हकदार हैं। अगर ये स्पष्ट हो कि सेक्स वर्कर वयस्क है और अपनी इच्छा से वेश्यावृत्ति में है, तो पुलिस को इसमें हस्तक्षेप करने या उसके खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। इस देश के प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत सम्मानजनक जीवन का अधिकार है।”
देश के शीर्ष अदालत ने वेश्यावृत्ति पर महत्वपूर्ण फैसला दिया। इसका व्यापक असर देहव्यापार से जुड़े लोगों पर पड़ने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस आदेश में कहा है कि वेश्यावृत्ति भी एक प्रोफेशन है, ऐसे में अपनी मर्जी से पेशा अपनाने वाले सेक्स वर्कर्स को सम्मानीय जीवन जीने का हक है। इसलिए पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करे। शीर्ष अदालत ने इस मामले को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ पुलिस को भी कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों को देखें तो इसके मुताबिक सेक्स वर्कर्स को सहमति से यौन संबंध बनाने के लिए अरेस्ट, दंडित, परेशान या छापेमारी के जरिए प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा है कि वेश्यालयों पर छापे के दौरान सेक्स वर्कर्स को अरेस्ट, परेशान नहीं करना चाहिए। जुर्माना नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि स्वैच्छिक रूप से सेक्स वर्क अवैध नहीं है। केवल वेश्यालय चलाना गैरकानूनी है। सेक्स वर्कर्स की उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर पुलिस को सेक्स वर्कर्स के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। यौन उत्पीड़न के शिकार सेक्स वर्कर्स को हर सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जिनमें तुरंत मेडिकल और कानूनी सहायता उपलब्ध कराना शामिल है। सेक्स वर्कर के बच्चे को उसकी मां की देखभाल से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। अगर किसी नाबालिग को वेश्यालय या सेक्स वर्कर्स के साथ रहते हुए पाया जाता है तो ये नहीं माना जाना चाहिए कि उसकी तस्करी की गई है। अगर सेक्स वर्कर ये दावा करे कि नाबालिग उसका बेटा/बेटी है, तो इसे सुनिश्चित करने के लिए टेस्ट कराया जा सकता है। अगर दावा सही है तो नाबालिग को जबरदस्ती अलग नहीं करना चाहिए। अरेस्ट, रेड और रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान मीडिया को सेक्स वर्कर्स की पहचान उजागर नहीं करनी चाहिए। पुलिस को कंडोम के इस्तेमाल को सेक्स वर्कर्स के अपराध का सबूत नहीं समझना चाहिए। बचाए गए सेक्स वर्कर्स को कम से कम 2-3 सालों के लिए सुधार गृहों में भेजा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर मजिस्ट्रेट फैसला करता है कि सेक्स वर्कर ने अपनी सहमति दी है, तो उन्हें सुधार गृहों से जाने दिया जा सकता है। साथ ही केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कहा है कि वे सेक्स वर्कर्स को उनसे जुड़े किसी भी पॉलिसी या प्रोग्राम को लागू करने या सेक्स वर्क से जुड़े किसी कानून/सुधार को बनाने समेत सभी डिसिजन मेकिंग प्रोसेस में शामिल करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का मतलब है कि अब पुलिस सेक्स वर्कर्स के काम में साधारण परिस्थितियों में बाधा नहीं डाल सकती है। जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एएस बोपन्ना की तीन जजों की पीठ ने कहा, "वेश्यावृत्ति एक पेशा है और सेक्स वर्कर्स कानून के तहत सम्मान और समान सुरक्षा के हकदार हैं। अगर ये स्पष्ट हो कि सेक्स वर्कर वयस्क है और अपनी इच्छा से वेश्यावृत्ति में है, तो पुलिस को इसमें हस्तक्षेप करने या उसके खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। इस देश के प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत सम्मानजनक जीवन का अधिकार है।” सुप्रीम कोर्ट ने वेश्यावृत्ति को पेशा माना है। यह पहली बार है जब देश के शीर्ष अदालत की ओर से वेश्यावृत्ति को लेकर इस तरह का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने साफ कहा कि सहमति से यह कार्य करने वाले सेक्स वर्करों और उसके ग्राहक के खिलाफ पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है। सेक्स वर्कर भी कानून के समक्ष सम्मान व बराबरी के हकदार हैं। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दिया गया यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है, खासकर समाज में बराबरी के हक के विवाद के बीच। चर्चा इस बात की भी है कि क्या कोर्ट के इस फैसले के बाद देश में सेक्स वर्कर्स की हालत में बदलाव देखने को मिलेगा? क्या अब उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त होगा?
महत्वपूर्ण आदेश में कहा गया है कि “सेक्स वर्कर्स को अपनी इच्छा से यौन संबंध बनाने के लिए गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। ना ही उसे किसी तरह दंडित, परेशान या प्रताड़ित किया जाना चाहिए। वेश्यालयों पर छापे के दौरान सेक्स वर्कर्स को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।” इतना ही नहीं कोर्ट ने कहा कि “सेक्स वर्कर के बच्चे को उसकी मां की देखभाल से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। मीडिया को सेक्स वर्कर्स की पहचान उजागर नहीं करनी चाहिए। अगर सेक्स वर्कर चाहती है तो उसे सुधार गृह से जाने दिया जा सकता है।
केंद्र सरकार अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को मान लेती है तो सबसे बड़ा बदलाव समान कानूनी अधिकार को लेकर होगा। सरकार अगर निर्देश मानती है तो सेक्स वर्कर्स को भी अन्य लोगों की तरह समान कानूनी अधिकार मिलेंगे। ऐसा होने पर अगर कोई सेक्स वर्कर किसी मामले में आपराधिक, यौन या किसी अन्य तरह की शिकायत दर्ज कराता या कराती है तो पुलिस को उसे गंभीरता से लेना होगा। इसके साथ ही कानून के अनुसार उसे कार्रवाई करनी होगी। कोर्ट के निर्देश लागू होने पर सेक्स वर्कर्स को न तो गिरफ्तार किया जा सकेगा ना ही उन्हें पुलिस प्रताड़ित कर सकेगी। अगर किसी सेक्स वर्कर के साथ यौन हिंसा होती है तो उसे किसी अन्य यौन उत्पीड़ित की तरह ही चिकित्सा देखभाल व अन्य सेवाएं दी जाएंगी। पुलिस को सभी सेक्स वर्कर्स के साथ शालीनता से पेश आना होगा। उन्हें न तो शाब्दिक रूप से न ही शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा सकेगा। हालांकि इसका दूसरा पहलु यह भी निकलेगा कि अगर कोई कानून का गलत उपयोग किया तब दिक्कत होगी। क्योंकि अगर ग्राहक के साथ पैसा लेने के बाद उसके खिलाफ कोई कार्रवाई की याचिका की जाती है तब कानूनी बाधाएं उत्पन्न होंगी। इसके बचाव के लिए और दूसरी समस्या उत्पन्न न हो इसके लिए बहस होनी बाकि है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने क्रिमिनल मैटर को जिस तरह से जनहित का मुद्दा बनाया है इससे पीटा एक्ट सहित कई कानूनों पर असर पड़ेगा।
©दीपेंद्र शुक्ल
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