ललित सुरजन : ग्रामीण पत्रकारिता में भागीदारी
देशबंधु अविभाजीत देश का पहला अखबार हुआ जो ग्रामीण पत्रकारिता को महत्वपूर्ण स्थान देकर देश में ख्याति प्राप्त किया। ग्रामीण क्षेत्र के समाजिक मुद्दों को उठाया। खासकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ (अविभाजीत मध्यप्रदेश) में फैली टोनही प्रताड़ना, बहिष्कार, किसान, मजदूर, फैक्ट्री में होने वाले आंदोलन को सामने लाया। ग्राउंड रिपोर्ट के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में होने वाले घोटालों और भ्रष्टाचार को उजागर किया। जब अन्य अखबार शहरी चकाचौंध से प्रभावित होकर खोए हुए थे तब देशबंधु ने ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहे नए-नए प्रयोगों को समाज के सामने लाया। उस समय के चर्चित अखबार जिन मुद्दों को अनदेखा करते थे उसे उठाकर देशबंदु ग्रामीण इलाकों में अपनी पैठ बनाई। ऐसे तमाम मामलों को अखबार में उजागर कर लोगों तक पहुंचाया। अविभाजित मध्यप्रदेश में देशबंधु को पत्रकारिता का स्कूल कहा जाता था। देशबंधु की नींव भले ही मायाराम सुरजन जी ने रखी, हो लेकिन उसे आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका ललित सुरजन जी ने निभाई। ग्रामीण पत्रकारिता की जब भी बात की जाएगी ललित सुरजन और देशबंधु का नाम सामने आएगा। आज हमारे बीच ललित सुरजन जी नहीं हैं, लेकिन उनके काम आज भी लोगों की जुबान पर हैं, लोग उनको याद करते हैं।
ललित सुरजन देश के वरिष्ठ पत्रकार शिक्षाविद, लेखक, शांति कर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता थे। अप्रैल 1961 में जबलपुर से प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में पत्रकारिता जीवन प्रारंभ किया था। उन्होंने समाचार पत्र के संपादन, प्रबंधन तथा उत्पादन इन सभी में अनुभव हासिल किया। 1 जनवरी 1995 से वे देशबन्धु पत्र समूह के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत रहे हैं। उन्होंने 1966 से 1969 के बीच कॉलेज विद्यार्थियों के लिए स्नातक नामक साहित्यिक पत्रिका का संपादन भी किया। 1969 में रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के नवगठित पत्रकारिता विभाग के मानसेवी विभागाध्यक्ष का दायित्व भी 3 वर्ष तक निभाया। वे 1977 में थामसन फाउंडेशन, यूके की वरिष्ठ पत्रकार फेलोशिप के लिए चुने गए। ललित सुरजन एक जाने-माने शिक्षा शास्त्री भी रहे। उन्होंने राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रायपुर के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन 2006-2011, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन तथा सर्वशिक्षा अभियान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य, केन्द्रीय हिन्दी शिक्षण समिति के उपाध्यक्ष तथा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं।
ललित सुरजन पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर की कार्य परिषद 2000 से 2004 और 2010 से 2017 तक, पं. सुंदर लाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय, बिलासपुर की कार्य परिषद 2012 से 2015 तक, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर की विद्यापरिषद 2011 से 2014 तक राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य रहे हैं। सुरजन अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे। वे भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटेक) की कार्यकारिणी व शासी परिषद के सदस्य व छत्तीसगढ़ राज्य के संयोजक, छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष जैसे अनेक पदों पर अपनी सेवाएं दिए हैं।
ललित सुरजन की रचनाएं
एक लेखक के रूप में ललित सुरजन की पहचान राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रही है। सन् 1960 से लेखन में सक्रिय रहते हुए उनके दो कविता संकलन व पांच निबंध संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। उनके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हुए- अलाव में तपकर, तिमिर के झरने में तैरती अंधी मछलियां, और एक निबंध संग्रह समय की साखी है।
ललित सुरजन जी के यात्रा संस्मरण हैं- शरणार्थी शिविर में विवाह गीत, दक्षिण के अवकाश पर ध्रुव तारा और नील नदी की सावित्रि, द बनाना पील (अंग्रेजी भाषा) में। वे देशबन्धु में हर गुरुवार साप्ताहिक स्तम्भ लिखते थे, और देशबन्धु का चौथा खंभा होने से इंकार शृंखला अपने अंतिम समय तक लिखते रहे। उन्होंने छत्तीसगढ़ में विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘अक्षर पर्व’ का प्रकाशन किया जिसको देश भर में प्रतिष्ठा मिली। वे देशबन्धु के साथ-साथ अक्षर पर्व के संपादक भी थे। साथ ही उन्होंने हाई-वे चैनल’नाम से सांध्यकालीन अखबार बिलासपुर से शुरू किया। बाद में ये भोपाल, बस्तर और रायपुर से छपने लगा।
सुरजन की दूरदृष्टि
ललित सुरजन ने संदर्भ मध्य प्रदेश और संदर्भ छत्तीसगढ़ जैसे दो ग्रंथ छपवाए। ये दोनों ग्रंथ राज्य के बारे में जानकारियों का उस दौर का विकीपीडिया था। इसमें से जब संदर्भ छत्तीसगढ़ छापा गया तो उस समय छत्तीसगढ़ बना ही नहीं था। मध्य प्रदेश ही अस्तित्व में था, लेकिन छत्तीसगढ़ की स्थापना के लिए ये ग्रंथ आधार-पत्र साबित हुआ।
सामाजिक दायित्व
ललित सुरजन ने रोटरी इंटरनेशनल के डिस्ट्रिक्ट 3260 (उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाकौशल) के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में भी सेवाएं दीं। रोटेरियन सुरजन को आर.आई. से बेस्ट गवर्नर का अवार्ड मिला तथा रोटरी फाउण्डेशन से उन्हें साइटेशन ऑफ मेरिट प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें रोटरी सेवाओं के लिए अलग-अलग अवसरों पर सम्मानित किया गया। उन्होंने साहित्य, पत्रकारिता, विश्व शांति व सद्भाव के प्रयोजन से विश्व के अनेक देशों की यात्रा की तथा अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सक्रिय व नेतृत्वकारी भूमिक निभाई। वे सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते थे।
वे देश के प्रसिद्ध पत्रकार मायाराम सुरजन की स्मृति में स्थापित ‘मायाराम सुरजन फाउंडेशन’ के अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष, भारतीय सांस्कृतिक निधि (इन्टैक) छत्तीसगढ़ अध्याय के संयोजक थे। उन्होंने गरीब छात्रों व जरूरतमदों को मदद पहुंचाने 1984 में ‘देशबन्धु प्रतिभा प्रोत्साहन कोष’ ट्रस्ट की स्थापना की जिससे हर साल करीब दो सौ छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान कर शिक्षण कार्य में मदद पहुंचाई जाती है। 1996 में अंग्रेजी माध्यम स्कूल मानसरोवर विद्यालय की स्थापना भी उन्होंने की। उन्होंने उभरते रचनाकारों को प्रोत्साहित करने साहित्य के अनेक शिविर लगाए तथा रचनाकारों से मार्गदर्शन करवाते रहे। रायपुर, चम्पारण, महासमुन्द, कुरूद में शिविर आयोजित किए। व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को उन्होंने छत्तीसगढ़ भ्रमण कराकर व्यंग्य लेखन की सार्थकता पर नव रचनाकारों को परिचित कराया। उन्होंने अपने जीवन में अनेक विदेश यात्राएं भी की।
ग्रामीण पत्रकारिता में योगदान
अपनी साहित्यिक सोच के साथ ही ललित जी ने ग्रामीण और विकासोन्मुखी पत्रकारिता पर पैनी नजर रखी। यही कारण है कि देशबंधु को ग्रामीण पत्रकारिता के लिए देशबंधु को कई बार ग्रामीण पत्रकारिता का स्टेट्समैंन सम्मान मिला। मायाराम सुरजन ने रुढ़िवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध जो जोत जलाई थी, ललित जी ने उसकी चमक और बढ़ाई। कैंसर से पीड़ित होने के बाद इलाज के लिए दिल्ली में होने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखना शुरू कर दिया था। उनके स्तंभ के पाठकों की संख्या अच्छी खासी थी। खासतौर से देशबंधु का चौथा खंभा बनने से इनकार- शीर्षक से उनके लेख पठनीय होते थे।
ललित सुरजन का परिवार
ललित सुरजन का जन्म 22 जुलाई 1946 को महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के के उंद्री में हुआ था। 1966 में उन्होंने हिन्दी में एमए किया तथा 1977 में यूके में उच्चतर अध्ययन किया। उनकी चार पुत्रियां नवनीता, तरूशिखा व सर्वमित्रा तथा एक दत्तक पुत्री गुंजन हैं। जीवन संगिनी श्रीमती माया सुरजन हैं।
देशबंधु से निकले पत्रकार वर्तमान में बड़े मुकाम पर हैं
देशबंधु से निकले पत्रकार जो आज बड़े मुकाम पर हैं। ललित सुरजन के साथ देशबंधु में काम करने वालों में दीवाकर मुक्तिबोध, आनंद मिश्रा, नंद कश्यप, निकस परमार, नथमल शर्मा, रुचिर गर्ग, विनोद वर्मा, सुनील कुमार, आलोक पुतुल, प्रवीण शुक्ला, संदीप सिंह ठाकुर, राजेश अग्रवाल, सतीश जायसवाल, सुदीप ठाकुर जैसे नाम हैं। जो आज दैनिक देशबंधु से निकलकर देश के ख्याति प्राप्त अखबार, चैनल और जगहों पर हैं।
दीपेंद्र कुमार शुक्ला पत्रकार और ब्लॉगर
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