शव का अंतिम संस्कार रोकना पाप नहीं गुनाह है
कोरोना के दौर में कयी खबरें मिली। इनमें से एक सामजिक बहिष्कार के रूप में शव दाह गृह में अंतिम संस्कार का विरोध किए जाने के समाचार ने मुझे ज्यादा व्याकूल किया। कहां किस समाज के हम हिस्सा हैं। ऐसा समाज जहां इतने नीचऔर निकृष्टतम लोग रह रहे हैं। अरे छुआ छूत की बीमारी है कोरोना ठीक है, इसका मतलब यह तो नहीं की ऐसे में ऐसी सामाजिक दूरी बना ली जाए कि किसी का शव दाह न करने दे। हां ठीक है सामाजिक दूरी का दौर चल रहा, लेकिन शव का अंतिम संस्कार रोकना बिना सर पैर वाली हरकत है। यह हरकत किया जाना सामाजिक बदलाव का ही एक रूप है। लोग असभ्य होते जा रहे हैं। अपनी संस्कृति और परंपराओं को भूलते जा रहे हैं। कुछ सालों में यह बदलाव देखने मिला है। लोग एकल परिवार में रहते रहते यह भूल गये हैं कि उनके साथ भी ऐसी घटना हो सकती है। तब यही समाज उनका साथ देगा। राजनैतिक स्वार्थ में लोग ऐसे मौके का फायदा भी खूब उठा रहे हैं। इंसानियत को जिंदा रखने के लिए कुछ लोग जहां जान जोखिम में डालकर समाज सेवा कर रहे हैं। वहीं इसी समाज में शामिल मानसिक गंदगी लिए कुछ लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। ये लोग कहां से कैसे पिशाच बन गये समाज को इस ओर वक्त रहते चिंतन करने की जरुरत है।
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