बिना सिर पैर के संचालित हो रहे इलेक्ट्रानिक मीडिया
सातवां वेतनमान आयोग केंद्र सरकार ने लागू कर दिया। इसकी अड़चनों को लेकर अब आंदोलनों का दौर चल रहा है। जिसे प्रिंट के साथ इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोग कवरेज कर रहे हैं। इसी तरह के कई आयोग सालों से प्रिंट मीडिया के लिए भी बने हैं। इसमें हालिया विवाद में मजीठिया है। जिसे देने के लिए प्रेस मालिक तैयार नहीं है और प्रिंट मीडिया के लोग लगातार हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके विपरित इलेक्ट्रानिंक मीडिया जन्म से अनाथ जैसी है। यहां प्रिंट मीडिया से भी ज्यादा शोषित वर्ग है, पत्रकारिता के नाम पर इलेक्ट्रानिक मीडिया के रिपोर्टर, कैमरा मैन के साथ जिस तरह का शोषण हो रहा है वह देखने लायक है। बावजूद इसके इनके लिए न तो आज तक कोई बोर्ड का गठन हुआ न वेतन आयोग और न ही कोई नियम बनी। न उनके वेतन को लेकर न उनकी सुरक्षा को लेकर। पत्रकार मर रहे हैं तो इससे सरकार को क्या? वे बीमार है तो प्रेस, इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिकों को क्या?
टीवी चैनलों में बैठकर देश और राज्य की बात करने वाले दिग्गज ने कभी पत्रकारों की दशा पर चिंता नहीं की। सरकारों ने भी मीडियाकर्मियों के लिए गठित आयोगों को कड़ाई से पालन नहीं करा पाई। न ही कभी इस पर चर्चा हुई। सरकार ने कभी कोई पहल नहीं किया और नहीं बड़े-बडे टीवी चैनलों पर प्राइम टाइम से लेकर क्राइम टाइम तक दिखाने वाले दिग्गज पत्रकार और मालिकों ने। कश्मीर में घुस आए आतंकी बुरहान बानी को भटका हुआ सपोला बता देने को आमद प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने गीरेबान में कभी झांकने को तैयार नहीं हुआ। उनके भीतर के लोग और साथी किस मजबूरी में घर चला रहे हैं इस ओर क्यों ध्यान नहीं दिए? क्या वे इस समाज से अलग हैं? नहीं इसी समाज के लोग है वे और उनको मिली हुई सारी सुविधाएं मिलनी चाहिए। अंग्रेजी अखबारों की तुलना में हिंदी प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने वाले हजारों लोगों के लिए कोई वेतन बोर्ड अब तक गठित नहीं हुआ है। प्रिंट मीडिया में कार्यरत पत्रकारों के लिए कम से कम चार वेतन बोर्ड का गठन किया गया है, लेकिन इनमें से एक भी लागू नहीं हुआ है। बात इलेक्ट्रोनिक मीडिया और न्यूज पोर्टल पर काम करने वाले पत्रकारों और गैर पत्रकारों की करें तो इनके लिए कोई व्यवस्था इलेक्ट्रानिक क्रांति के 25 साल बाद भी नहीं हो सका है। न ही ऐसी कोई व्यवस्था है और न ही केंद्र सरकार से इस मामले में आज तक कोइ कदम उठाया गया है। पत्रकारों गैर पत्रकारों को भी वेतन संबंधी, सुरक्षा प्रदान किए जाने की जरूरत है।
टीवी चैनलों में बैठकर देश और राज्य की बात करने वाले दिग्गज ने कभी पत्रकारों की दशा पर चिंता नहीं की। सरकारों ने भी मीडियाकर्मियों के लिए गठित आयोगों को कड़ाई से पालन नहीं करा पाई। न ही कभी इस पर चर्चा हुई। सरकार ने कभी कोई पहल नहीं किया और नहीं बड़े-बडे टीवी चैनलों पर प्राइम टाइम से लेकर क्राइम टाइम तक दिखाने वाले दिग्गज पत्रकार और मालिकों ने। कश्मीर में घुस आए आतंकी बुरहान बानी को भटका हुआ सपोला बता देने को आमद प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने गीरेबान में कभी झांकने को तैयार नहीं हुआ। उनके भीतर के लोग और साथी किस मजबूरी में घर चला रहे हैं इस ओर क्यों ध्यान नहीं दिए? क्या वे इस समाज से अलग हैं? नहीं इसी समाज के लोग है वे और उनको मिली हुई सारी सुविधाएं मिलनी चाहिए। अंग्रेजी अखबारों की तुलना में हिंदी प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने वाले हजारों लोगों के लिए कोई वेतन बोर्ड अब तक गठित नहीं हुआ है। प्रिंट मीडिया में कार्यरत पत्रकारों के लिए कम से कम चार वेतन बोर्ड का गठन किया गया है, लेकिन इनमें से एक भी लागू नहीं हुआ है। बात इलेक्ट्रोनिक मीडिया और न्यूज पोर्टल पर काम करने वाले पत्रकारों और गैर पत्रकारों की करें तो इनके लिए कोई व्यवस्था इलेक्ट्रानिक क्रांति के 25 साल बाद भी नहीं हो सका है। न ही ऐसी कोई व्यवस्था है और न ही केंद्र सरकार से इस मामले में आज तक कोइ कदम उठाया गया है। पत्रकारों गैर पत्रकारों को भी वेतन संबंधी, सुरक्षा प्रदान किए जाने की जरूरत है।
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