पुरुषवाद का उदाहरण है महिलाओं का मंदिर-मस्जिद में प्रवेश पर रोक
हिंदू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई हर वर्गों में महिलाओं पर अत्याचार है। एक ओर जहां देवी पूजन कर मातृ को आराध्य माना जाता है वहीं महिलाओं को मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारे में प्रवेश पर कही रोक होता है तो कहीं पूजा न ही करने दिया जाता। हालिया रिपोर्ट 28 नवंबर को देखने को आई है। इसमें दिखाया गया है कि शिंगणापुर में स्थापित शनि भगवान के मंदिर में एक महिला ने पूजा किया। इससे पहले हनुमान को छुने पर प्रतिबंध है। वहीं मस्जिद में भी कुछ समय पहले महिलाओं के प्रवेश पर वर्जित किया गया है। राजस्थान की बात की जाए तो वहां महिलाओं को सिर हमेशा ढंके रहना होता है। पुरुष प्रधान देश में महिलाओं के पूजन पर प्रतिबंध क्यों नहीं। नवरात्रि में नौ दिन उपवास बंद क्यों नहीं होता, लोग पुरुषों से ही शादी क्यों नहीं कर लेते उन्हीं से बच्चा भी पैदा करें। महिलाओं में मासिक धर्म के कारण उन्हें अछूत माना जाता है जबकि इसी देश में एक मंदिर ऐसा है जहां पर महावारी को प्रसाद और उन्नति के रूप में पूजा की जाती है। महावारी उन्नति का प्रतिक है। मंदि-मस्जिद में प्रवेश पर रोक पुरुषवाद का स्पष्ट उदाहरण है। महिलाएं भी उसी कोख से पैदा होती है, जिससे पुरुष पैदा होते हैं। पुरुष में लिंग होता है इसका मतलब यह नहीं कि वह श्रेष्ठ है और महिलाओं में योनी होती है इसका मतलब यह नहीं कि वह अछूत है। देश की दशा बदलनी है तो हर वर्ग को समान माना जाए, समान अधिकार मिले। यह तो समानता के अधिकार तक का हनन है। मंदिर में प्रवेश और पूजा पर रोक, मस्जिद में प्रवेश पर रोक और नवाज अदायगी में रोक यह सब कोरी पुरुषवादी सोच का प्रतिक बस है। जबकि एक जैसे विर्य से ही नर और मादा दोनों जन्म लेते हैं। वैज्ञानिक युग होने के बाद भी कोरी कायरतावादी कल्पना का शिकार होना घृणित तो हैं ही मातृपूजन का अपमान भी है।
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