गुलामी से दो कदम ही निकले हैं हम

15 अगस्त को हम आजाद हुए। ढाई साल बाद बना हामारा संविधान। नकल का यह संविधान 26 जनवरी 1950 हमारा संविधान लागू हुआ। इसमें वे सारी व्यवस्थाएं हमें मिली जो अंग्रेजों की नकल कर ली गई। गुलामी हमें जकड़ी रही। साल बीतते गए। साल, दस साल और फिर पचास साल बीत गए। हम उन्हीं नियमों को मानते रहे जो उस समय की व्यवस्था थी। कुछ परिवर्तन भी हुआ पर नाम मात्र का। दुनिया का सबसे बड़ा लिखीत संविधान होने का परचम हर साल लहरा रहे हैं पर फायदा क्या है पता नहीं। संविधान ऐसा ही कि दो वक्त की रोटी इसके कागज को जलाकर सेंकी जा सकती है लेकिन गरीबों के लिए इसमें कुछ भी नहीं है। अमीरों के लिए भी कुछ नहीं है। अगर इसमें कुछ है तो मध्यम वर्गीय लोगों के लिए न मरे में है न जींदा में। ये वे लोग है जो न मर्द में है न औरत में थर्ड जेंडर को कुछ समय तो मान्यता भी मिल गई है। इनका उससे भी हाल बुरा है। अभी तो बस जिसके पास राशन कार्ड, वोटर आईडी, आधार, बैंक में खाते आदि-आदि है उन्हे सभी लाभ मिल रहे हैं। जिनके पास नहीं है वे परेशान है इसके लिए प्रतिदिन सिर फुड़वा रहे हैं। साला एक नागरिकता ही नहीं है भारत का। किसी के पास अगर वोरट आईडी कार्ड है तो उसे दूसरे राज्यों में मान्यता नहीं है। किसी के पास आधार कार्ड है तो उसे प्रूफ कराना होता है कि उसका है की नहीं। बैंक का पासबुक है तो उसमें लगा फोटो उसी का है या नहीं यह डाउट है। इतने बैंक है कि सारे बैंकों का पासबुक मान्य नहीं होगा। यह भी बड़ी फजीहत है। इतना हीं नहीं भारत में पैदा हुए हो तो इसका सबुत भी आपके पास होना चाहिए वर्ना आपको पाकिस्तानी या विदेशी बनाकर जेल में भी ठूसा जा सकता है। वहीं दुश्मन देश के नागरिकों को ससम्मान सारी सुविधाएं दी जा रही हैं। वर्षों से यही हो रहा है। अब इसे देखने के बाद तो इतना ही लगता है की हम गुलामी से बस दो कदम ही दूर चले हैं अब तक...

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