सरकार का बहुरुपिया चेहरा, नसबंदी के बाद अब जवानों की शहादत लापरवाही किसकी तय नहीं
छत्तीसगढ़
की सरकार का बहुरुपिया चेहरा अब नजर आने लगा है। सरकार में बैठे दोहरे चेहरे वालों
को लोग पहचानने लगे हैं। लोगों को यह भी पता चल रहा है कि अब क्या हो रहा है। उसने
तीसरी बार एक ही पार्टी की सरकार चुनकर कितनी बड़ी गलती किया है यह उसे अब खल रहा
है। दूसरी बार में मिले दर्द और सबक को भूला कर तीसरी बार सरकार चुनने पर सरकार से जो
दर्द मिला है वह कभी नहीं भूला जा सकता। अभी वे सरकार के दूसरे कार्यकाल की घटनाओं
को भूल भी नहीं है कि नया दर्द छत्तीसगढियों को फिर मिला है।
विधानसभा चुनाव नवंबर-दिसंबर 2013 को
अभी एक साल नहीं बीते हैं... और नसबंदी में महिलाओं की मौत का नया दर्द
छत्तीसगढ़ियों को मिला है। नसबंदी में मिलने वाली दवाओं में जहर मिलना छत्तीसगढ़ के
लोगों के साथ क्या है यह सरकार न्यायिक आयोग गठित कर साफ कर चुकी है। दवाओं में
जहर मिलना और लोगों को देने से पहले मिली सप्लाई को सरकार के जिम्मेदारों ने जांच
न कराकर जो लापरवाही दिखाई है वह साफ है। सरकार को छत्तीसगढ़ के लोगों की चिंता
नहीं है। सरकार में बैठे ज्यादातर विधायक बाहरी राज्यों के हैं यहां बसने के बाद
भी उनकी मानसिकता में छत्तीसगढ़िया लोगों के खिलाफ ही हैं। यह बदलाना इतना आसान
नहीं है लोगों को समझना होगा कि कौन नेता स्थानीय है और कौन बाहरी। सरकार नसबंदी
कांड के बाद जो कार्रवाई कर रही है उसमें दोगलापन नजर आता है। सरकार को साफ करना
चाहिए की वह क्या चाहती है और राज्य की सरकार यह साफ कर दी है कि वह क्या कार्रवाई
कर रही है। सब साफ हो गया है कि किसी भी घटना को किसी भी हद तक जाकर दबा देना है।
लोग मर रहे हैं तो मरे सत्ता में बने रहेंगे। सरकार में दोषियों के आसिन होने के
कारण उसने सारे सबूत मिटा डाले। यह पहली बार नहीं हुआ। इससे पहले भी कई घटनाएं हुई
है, इसमें चाहे बालोद में अंखफोडूआ कांड या प्रदेश भर में बच्चेदानी(गर्भाशय कांड)
निकालने का, यहां तक की नक्सली हमले में 76 जवानों की दर्दनाक हत्या का मामला हो
या फिर झीरम घाटी में कांगेस पदाधिकारियों की हत्या का। हर बार सरकार सिर्फ खाना
पूर्ती की है। हर बार सरकार न्यायिक आयोग का गठन कर बच निकली। लोग न्यायिक आयोग के
खिलाफ बोलते नहीं और मीडिया इस मामले में इसलिए भी नहीं बोलती क्योंकि इसमें
न्यायाधीश होते है। मीडिया को पता है कि लोगों को न्यायाधीशों पर कितना विश्वास
होता है उनकी भावनाओं को मीडिया भी आहत नहीं करना चाहती। न्यायिक आयोग में
ज्यादातर न्यायाधीश हैं और लोगों में विश्वास है कि वे इमानदार लोग होते हैं। इतनी
घटनाओं पर सरकार ने जितने न्यायिक आयोग गठित किए है इसमें से अभी तक एक भी ऐसा
मामला नहीं है जिसकी रिपोर्ट नहीं आई है। यह सच्चाई है 100 प्रतिशत। यहां न्यायिक आयोग
का गठन कर मामला सुलझाया नहीं शांत कराया जा रहा है। यह गलत है इसे हाईकोर्ट और
सुप्रिम कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए। नसबंदी कांड पर जैसा कि लिया गया है।
हाईकोर्ट अगर न्यायिक आयोग पर नजर रखे तो जल्द सारे रिपोर्ट आ जाए। पिछले एक दशक
में 7 से ज्यादा घटनाओं को न्यायिक आयोग को सौंपा गया है। इसमें से ज्यादातर मामले
सिफर पड़े हैं। रिपोर्ट न आने से दोषी खुले आम बाहर घूम रहे हैं। अभी 20 लोगों की
मौत का कारण बनी दवा कंपनी पर और जिम्मेदारों पर जो कार्रवाई हुई वह कितना सही था
यह जांच का विषय है। नसंबदी शिविर प्रदेश भर में लगाई गई। हर जगह पर नसबंदी के बाद
महिलाओं को दवाएं दी गई। बिलासपुर के नेमीचंद जैन अस्पताल में भी 8 नवंबर को
नसबंदी शिविर लगाई गयी। यहां भी वही दवाएं दी गई जो बाकि जगहों पर दी गई। इसके बाद
महिलाओं के मौत का दौर शुरु हुआ। 10 नवंबर को पहली महिला की मौत के बाद तो जैसे यह
सिलसीला चल निकला। नसबंदी कराई 13 महिलाएं और बिना नसबंदी के आई-ब्रूफेन और
सिप्रोसिन 500 एमजी खाकर 6 लोगों की मौत हुई। सरकार ने थाने में रिपोर्ट दर्ज
कराई। इसमें नेमीचंद अस्पताल में हुई ऑपरेशन के डॉ. आरके गुप्ता और सीएमएचओ को
दोषी बनाया गया। दोनों को बर्खाश्त कर दिया गया। साथ ही सर्जन डॉ. गुप्ता के खिलाफ
गैर इरादतन हत्या का जुर्म दर्ज कर जेल भेज दिया गया। जो वर्तमान में अपोलो में
जिंदगी मौत के बीच जुझ रहे हैं। सरकार इस डॉक्टर को बली का बकरा बना स्वस्थ्य
मंत्री, कलेक्टर, संभागायुक्त, स्वास्थ्य सचिव सहित कई बड़े पदों को बचा ली। जबकि
पेंड्रा, मरवाही, जांजगीर, अंबिकापुर जैसे जगहों पर भी ऑपरेशन के बाद यही दवा दी
गई और वहां की महिलाओं की भी हालत बिगड़ी। छोड़िए इस बात को उन 6 लोगों ने तो ऑपरेशन
नहीं कराया था जिनकी मौत हुई। दवा खाने से लोगों की मौत हुई है। यह साफ हो गया फिर
सिर्फ डॉक्टर ही कैसे दोषी है? इसपर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। सवाल जांच पर नहीं
जांच में शामिल लोगों के ऊपर नहीं बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली पर है। 1 दिसंबर को दोपहर में सीआरपीएफ के जवानों पर नक्सलियों ने हमला किया 14 जवानों की इस हमले में मौत हो गई वहीं 15 से घायल हो गए। बस्तर में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। क्यों आखिर क्यों केंद्र में भी तो भाजपा की सरकार है। राज्य में भाजपा की सरकार है। क्यों नहीं सामंजस्य बैठा पा रहे है केंद्र और राज्य सरकार। जो कुछ समझ में आ रहा है वह यह कि सरकार चाहती ही नहीं कि राज्य से नक्सल समस्या खत्म हो। नेता मारे जाते है तब थोड़ा कुछ होता है। और तो और नेताओं को भी सरकार की शाजिस के तहत मारा जाता है। राज्य सरकार और नक्सल में कुछ तो सामंजस्य है। अगर ऐसा नहीं तो हमेसा सरकार को बचाने का काम नक्सली नहीं करते। जब भी विषम परिस्थिति में राज्य की भाजपा की सरकार फंसी है तब-तब नक्सलियों ने राज्य की सरकार का साथ दिया है। अभी नसबंदी कांड में सरकार की चारो तरफ से आलोचना हो रही थी। इससे बचाने नक्सलियों ने जवानों की बली सरकार के ऊपर चढ़ाई है। यह साफ है विधानसभा चुनाव 2013 में भाजपा को हार मिलती उस समय नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं को साफ कर दिया जो ज्यादा सक्रिय थे। इसे लोग क्या समझें। नक्सल समर्थक सरकार हो गई है। कभी ऐसा नहीं हुआ की 20 से ज्यादा नक्सली मारे गए हो। हमेसा जवान मारे जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार नहीं चाहती कि नक्सली मारे जाएं। नक्सलियों का राजधानी में बैठकर राज्य की सरकार और केंद्र में बैठकर केंद्र की सरकार मदद कर रही है।
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