जब डूबते सूर्य को नमस्कार करते हैं


एक कहावत है ना कि डूबते सूर्य को कोई नमस्कार नहीं करता। ऐसा नहीं है हिंदूओं का छठ एक मात्र ऐसा त्योहार है जिसमें डूबते सूर्य को भी नमस्कार किया जाता है। यह दिवाली से छठे दिन अर्थात षष्ठी तिथि को पड़ता है। इस दिन डूबते सूर्य को और दूसरे दिन उदय होते सूर्य को नमस्कार किया जाता है। दिवाली त्योहार के छठवे दिन सूर्य पूजा का अपना महत्व है। धन धान्य देने वाले इस त्योहार की पूर्वोत्तर भारत में बड़ी धूम होती है। लोग इसे बिहार, झारखंड और उत्तरप्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में बड़े हर्षोल्लास से मनाते है। इसका केंद्र हलांकि बिहार को माना जाता है, पर अब यह अन्य राज्यों और देशों में भी फैल गया है। बिहार के छठ पूजन करने वाले लोग वहां भी इसे मनाने लगे हैं। त्योहार में लोग बड़ी श्रद्धा के साथ पूजा पाठ करते है। इसमें शुद्धता का बहुत ध्यान रखा जाता है। उपवास रखते हैं और धन धान्य, संतान के लिए सूर्य देव के साथ छठ माता की पूजा करते हैं, कामना करते हैं। डूबते और उगते दोनों सूर्य को नमस्कार किया जाता है। लद गए वो दिन कब किसका वक्त बदल जाए कहा नहीं जा सकता।
जानते हैं सूर्योपासना के बारे में
छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाता है। सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। प्रायः हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलंवी भी मनाते देखे गए हैं। इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल सष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया। सूर्य षष्ठी व्रत होनेके कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्षमें दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्रमें और दूसरी बार कार्तिकमें। चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जानेवाले छठ पर्वको चैती छठ व कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जानेवाले पर्वको कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फलप्राप्तिके लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्वको स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। पानी भी नहीं पीने वाला यह पूजा चार दिवसीय होता है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय खाय से शुरु होता है और इसका पहले दिन सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। इसके बाद छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू- चने की दाल और चावल खाया जाता है। दूसरे दिन पंचमी को लोहंडा और खरना किया जाता है। इसमें व्रतधारी दिन भर उपवास के बाद शाम को सूर्य पूजा के बाद भोजन करते है। इसे खरना कहते है इसमें गुड दुध और चावल से बना खीर (जिसे रसिआव भी कहते है), चावल का पिट्‌ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती। अगले दिन अर्थात तीसरे दिन षष्ठी के दिन छठ का प्रसाद बनाया जाता है इसमें ठेकुआ (अगरौटा), चावल का लड्‌डू (कचनी), साथ ही मौसमी फल भी शामिल किया जाता है। शाम को एक बड़ी बांस की टोकरी में सभी प्रसाद रख कर घाट पर जाया जाता है। जहां स्थल पूजा करने के लिए प्रसाद को बांस या पीतल के सूप में सजाया जाता है। कोई एक तो कोई दो जिसे दोहरा सूप भी कहते हैं में प्रसाद चढ़ाते हैं। इस समय अस्ताचंलगामी सूर्य की पूजा की जाती है। जल और दूध से अर्घ्य देते हैं। यह त्योहार संयुक्त रुप से किया जाता है। जैसे तालाब, नदी या कुंआ के पास। पूजा के चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियामान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। षष्ठी की शाम से ही घाट पर रुके व्रती और अन्य जो सुबह आते है सभी एक साथ अर्घ्य करते हैं। इसी दिन व्रती अपना पारण अर्थात उपवास तोड़ते है। उपवास को दुध और छठ के प्रसाद के साथ तोड़ा जाता है। तो ऐसे मनाते है छठ का पवित्र त्योहार। आज छठ है आप सभी को छठ की हार्दिक शुभकामनाएं।

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