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#jnu जेएनयू का हर छात्र गद्दार नहीं है

जेएनयू #jnu का हर छात्र गद्दार नहीं हैं।यहां की फीस कम जरुर है पर टैक्स की वजह से नहीं बल्की समान शिक्षा की वजह और छात्रों की पहुंचने वाली भिड के कारण है। यहा विदेशों से छात्र पढने आते है। यहां पहुंचने के लिए, यहां पढने के लिए लोग लालाइत रहते है। अपना सौभाग्य मानते हैं कि यहां जेएनयू से पढाई कर रहे हैं, आईआईटी रुढकी और न जाने कहां कहां से पढने वाले जिस तरह गर्व महसूस कहते है कि आई एम आईआईटीयन उसी तरह जेएनयू @jnu से पढने का अपना सम्मान है। अगर वहां से पढने वाले गद्दार हैं तो वहां से पढकर निकलने वाले भी गद्दार होंगे। वे कहां गद्दारी की पढाई करने वाले। वे समाज की बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं और उतना ही टैक्स दे रहे हैं जितना देश के अन्य लोग दे रहे है। आपसे बस इतना ही कहना है कि आप जो आज पूरे छात्रों पर सवाल उठा रहे हैं गद्दार बोलकर आप इतने सालों तक कहां थे। जानते थे कि जेएनयू के छात्र कम्युनिस्ट विचारधारा वाले होते हैं। वैसे ही जैसे कई चुतिए गांधीवादी होते हैं। आप जानते हुए चुप क्यों थे। अगर नहीं जानते थे कि यहां के छात्र कम्युनिष्ट विचारधारा के होते है तो फिर पूरे छात्रों को अपने लपेटे ...

यहां बहुएं करती हैं सास की पूजा

साझा चूल्हे की संस्कृति-सभ्यता वाले अपने देश में रिश्तों की डोर कमजोर हो रही है और परिवार बिखरते जा रहे हैं। ऐसे दौर में रतनपुर का तंबोली परिवार किसी मिसाल से कम नहीं। इस परिवार में कुल 39 सदस्य हैं और इन सभी ने मन के तार इस मजबूती से बांध रखे हैं कि मनमुटाव या आम परिवारों जैसे झगड़े-टंटे इन्हें नहीं तोड़ पाते। इस आत्मीयता के मूल में हैं परिवार की मुखिया और 11 बहुओं की सास जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। जब तक रहीं, अपनी देवरानियों और बहुओं को मां जैसा स्नेह दिया। यही वजह है कि बहुओं ने सास की याद को अमर रखने घर पर उनका मंदिर बनवाया, उनकी मूर्ति का सोने के गहनों से ठीक उसी तरह साज-श्रृंगार किया, जैसा वे किया करती थीं। रोज पूजा-आरती करती हैं बहुएं रतनपुर करैहापारा निवासी 71 वर्षीय शिव प्रसाद तंबोली रिटायर्ड टीचर हैं। अब इस परिवार की बागडोर उनके ही हाथों में हैं। पहले परिवार को संजोए रखने का काम उनकी पत्नी गीता देवी करती थीं। 2010 में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी याद में बने मंदिर में सभी बहुएं और अन्य सदस्य मिलकर सुबह-शाम उनकी पूजा और आरती करते हैं। उनका मानना है कि गीता देवी के प्रयासों से...

बजट में बाबा जी का ठुल्लू मिला

 जेब पर मोदी के कैंची का खच खच, हर घर में परिवार का कच-कच             मोदी सरकार का तीसरा बजट सत्र 2016-17 की घोषणा मार्च के पहले सप्ताह के पहले ही दिन सोमवार को वित्त मंत्री ने प्रस्तुत किया। यह सिर्फ गरीबों और अमीरों का बजट कहें तो कोई हर्ज नहीं होगा। ऐसा लगता है सरकार को जैसे सरकारी नौकरी अथवा प्राइवेट नौकरी करने वाले लोग बेवकूफ हैं। उनपर जीतना टैक्स लाद दो चलेगा। वित्त मंत्री ने कर्मचारियों के पेट और पीछवाड़े दोनों पर लात मारी है, वहीं उद्योगपतियों और सरकार में बैठे लोगों को इससे मुक्त रखा है। यहा यू कहें कि मंत्री, सांसद, विधायकों को इससे लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया है। यह बजट बनियावाद को बढ़ावा देने वाला और निहायत ही घटिया बजट है। सरकार के बजट में छोटे शहरों को ध्यान में नहीं रखा गया। सिर्फ और सिर्फ उत्तर प्रदेश को ध्यान में रखकर यह बजट तैयार किया गया है कहा जाए तो कोई हर्ज नहीं होगी। उत्तर प्रदेश के विकास के लिए ही यह बजट बनाया गया प्रतित होता है।         मोदी सरकार ने अपना तीसरा बजट सोमवार को प्रस्तुत...

एक लड़ाई जो पांच हजार सालों से जारी है, स्वरूप बदलकर आरक्षण हुआ

देश में एक ऐसी लड़ाई जारी है जो पिछले पांच हजार सालों से चल रही है। जी हां भारत में जाति वाद की लड़ाई लगभग 5 हजार साल पहले शुरू हुआ। हलांकि आजादी मिलने के बाद यह व्यवस्था को खत्म करने की कवायद की गई, लेकिन इसके स्थान पर विद्वानों ने आरक्षण लाया। इसे लाया तो 10 साल के लिए था, लेकिन अब यह एक महामारी और गंभीर बिमारी की तरह बढ़ता ही जा रहा है। विभिन्न जाति के लोग इसको पाने के लिए आंदोलन और पब्लिक सेक्टर के संसाधनों को जला रहा है। यह अब लड़ाई की तरह हो गया है, जिसे पाने के लिए लोग खून खराबा पर तक उतारू हैं। जातिवाद में आजादी के पहले जितना खतरनाक था उससे कहीं ज्यादा खतरनाक अब होता जा रहा है। पहले उच्च जाति और निम्न जाति में लोगों का विभाजन किया गया था, पहले चार वर्णों में बांटा गया था, ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र थे। आजादी के बाद परिस्थिति बदली, और आरक्षण के लिए भी चार वर्ग ही बनाए गए, या यूं कहे कि इस जातिवाद को जारी रखते हुए विद्वानों ने गंदगी को खत्म करने के बजाय उसे और बढ़ावा दिया। विद्वानों ने जनरल, ओबीसी, एससी और एसटी किया। जनरल मतलब ब्राह्मण, क्षत्रीय, ओबीसी का मतलब वैश्य, एसस...

हाईकोर्ट ज्यूडिशियल एकेडमी बिल्डिंग की ढलाई में छत गिरता है और हाईकोर्ट याचिका आने का इंतजार करता है

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नई उम्मीद, नए संकल्प के साथ मनाएं नया साल

दुनिया 2016 की 1 जनवरी मना रहा है। नए वर्ष पर जहां विद्यार्थियों को अपने बेहतरी की उम्मीद है वहीं कामगारों को अपनी तरक्की के लिए नया संकल्प है। उम्मीद और संकल्प लिए नए साल में हम प्रवेश कर चुके हैं। इस नए वर्ष के आगमन पर हमें नया संकल्प लेने के लिए भी है। बहुत जरूरी बात है खेल को बढ़ाने और नशा व महिला उत्पीड़न को कम करने का भी संकल्प लिया जाना चाहिए। 

बड़ी बहस: अखबार है साहब सच को आंच क्या, सब उजागर होगा

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देश के सही मुद्दे से ध्यान भटकाने किस कदर शाजिश हो रही है उसका ये अखबारों की कटिंग नमूना है।  देश के बड़े अखाबर की कटिंग जिस पर छत्तीसगढ़ में विवाद हुआ  

काली स्याही का विमुक्त पंछी है कलम

कलम आज स्वतंत्रता उद्योगपतियों और कार्पोरेट की गुलामी का दंश झेल रहा है। सारे अखबार आज उद्योग घराने के इशारे पर नाच रहे हैं। टीवी चैनल और अखबार ज्यादातर उद्योग बन चुके हैं। टार्गेट मिलता है पत्रकारों को कितनी खबरें करनी है कैसी खबरें करनी है। चाहे वो सरोकार हो न हो पत्रकारिता से जनता से समाज से। फिर भी पत्रकार को करना ही होता है ऐसी खबरें जिससे स्वार्थ सधे अखबार घरानों। यह भी कहा जा सकता है कि पत्राकर आज कोई बचा नहीं और पत्रकारिता अब कोई कर नहीं रहा। जो कर रहे हैं वे या तो किसी अखबार के लिए नहीं बल्कि अपने सोशल मीडिया के लिए कर रहे हैं या फिर अपने वेब के लिए। पत्रकारिता कर्मचारिता में बदल चुकी है यह उस दौर की बात नहीं रही जब कलम को लोग तलवार और तोप से भी ज्यादा कारगर मानते थे। कलम काली स्याही का विमुक्त पंछी था, है, और रहेगा, लेकिन तब जब इसकी आजादी को कर्मचारिता नहीं पत्रकारिता बनाकर रखी जाए। राधारी सिंह दिनकर की कलम या तलवार इसी कड़ी का एक रूप है... स्वतंत्र लेखक को आज धन की कमी है। जिसके पास धन है वे पत्रकार और लेखक नहीं बल्कि कर्मचारी हैं एक उद्योग के एक कार्पोरेट के। ...

लड़कियों को अखबारों से सिर्फ सात्वना मिल रहा काम नहीं

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 और इसे क्या कहें पुरुषवादी सोच न कहें तो कि अखबारों में लड़कियों के लिए जगह तक नहीं है। जगह तो खत्म किया हीं झुठी सात्वना भी दे रहे हैं इससे ज्यादा दुखद और क्या होगा। अखबारों में बेटियों को बचाने के लिए मुहिम चल रहा है, कई अखबार और चैनल तो विधिवित इसकी शुरूआत कर दिए हैं लेकिन वास्तविकता देखकर आप दंग रह जाएंगे। छत्तीसगढ़ हो या मध्यप्रदेश या देश की राजधानी हर जगह यही हाल है। अखबारों और टीवी चैनलों के मीडिया जगत में लड़कियों के लिए जगह खत्म हो गई है। नेशनल टीवी और बड़े अखबारों में महिला न्यूज रीडर को देखकर हर मां-बाप सोचता है कि उसकी भी बेटी इसी तरह बड़े लोगों का इंटरव्यू ले। उनसे जनता के अधिकार के लिए बहस करे, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो मीडिया में सिर्फ नाम का बीटिया बचाओ, बेटियों को आगे बढ़ाओ अभियान चल रहा है। वास्तव में मीडिया में सबसे ज्यादा बेटियों का शोषण हो रहा है। जो बेटियां मीडिया में है उन्हें महिलाओं और महिला बाल विकास से संबंधित ही सॉफ्ट बीट दिए जाते हैं, उनसे कभी भी ऐसे काम नहीं लिए जाते जिससे उनका विकास हो सके। पुरुषवादी मीडिया ने महिलाओं को आज बर्बादी के कट...

तमिलनाडू में तबाही

देश भोपाल गैस कांड की 31वीं वरसी मना रहा है। पूरा देश यहां के लोगों को नहीं मिले न्याय के लिए रो रहा है, इसी के साथ प्रकृृति ने तमिलनाडू में कहर बनकर बरपा है। पूरे देश का ध्यान आज तमिलनाडू पर है। यहां भरे पानी ने लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। वहां के लोग सुरक्षित हो दुआएं की जा रही है। यह 31 साल बाद 2-3 दिसंबर की रात फिर से याद दिलाती है। ऐसी ही ठंडी रात थी वो 2-3 दिसंबर की रात जब तन को आधे-अधूरे कपड़े से ढंके भोपाल के लोग नींद में सोते रह गए थे। तमिलनाडू में भी वहीं 1,2 और 3 दिसंबर का समय है जहां लोग भारी बारिश से परेशान हुए हैं। यहां का जनजीवन इतना प्रभावित हो गया कि सेना को कमान सम्हालनी पड़ी है। प्रकृति हमें संदेश दे रही है, हम लगातार प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। आलम देश की राजधानी दिल्ली का भी कुछ ठीक नहीं। वहां प्राकृतिक के साथ इतना ज्यादा खिलवाड हो रहा है कि आने वाले समय में वहां भी हादसा होने की आशंका है। वहां एक गोल परत सा जम गया है धूल और धुएं से बने धुंध का। गैस के गुबार सा हो गया है पूरा शहर। यह भी बोल सकते हैं कि सिलेंडर बन चुका है दिल्ली। प्रकृतिक हादसों को...