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हाईकोर्ट ज्यूडिशियल एकेडमी बिल्डिंग की ढलाई में छत गिरता है और हाईकोर्ट याचिका आने का इंतजार करता है

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नई उम्मीद, नए संकल्प के साथ मनाएं नया साल

दुनिया 2016 की 1 जनवरी मना रहा है। नए वर्ष पर जहां विद्यार्थियों को अपने बेहतरी की उम्मीद है वहीं कामगारों को अपनी तरक्की के लिए नया संकल्प है। उम्मीद और संकल्प लिए नए साल में हम प्रवेश कर चुके हैं। इस नए वर्ष के आगमन पर हमें नया संकल्प लेने के लिए भी है। बहुत जरूरी बात है खेल को बढ़ाने और नशा व महिला उत्पीड़न को कम करने का भी संकल्प लिया जाना चाहिए। 

बड़ी बहस: अखबार है साहब सच को आंच क्या, सब उजागर होगा

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देश के सही मुद्दे से ध्यान भटकाने किस कदर शाजिश हो रही है उसका ये अखबारों की कटिंग नमूना है।  देश के बड़े अखाबर की कटिंग जिस पर छत्तीसगढ़ में विवाद हुआ  

काली स्याही का विमुक्त पंछी है कलम

कलम आज स्वतंत्रता उद्योगपतियों और कार्पोरेट की गुलामी का दंश झेल रहा है। सारे अखबार आज उद्योग घराने के इशारे पर नाच रहे हैं। टीवी चैनल और अखबार ज्यादातर उद्योग बन चुके हैं। टार्गेट मिलता है पत्रकारों को कितनी खबरें करनी है कैसी खबरें करनी है। चाहे वो सरोकार हो न हो पत्रकारिता से जनता से समाज से। फिर भी पत्रकार को करना ही होता है ऐसी खबरें जिससे स्वार्थ सधे अखबार घरानों। यह भी कहा जा सकता है कि पत्राकर आज कोई बचा नहीं और पत्रकारिता अब कोई कर नहीं रहा। जो कर रहे हैं वे या तो किसी अखबार के लिए नहीं बल्कि अपने सोशल मीडिया के लिए कर रहे हैं या फिर अपने वेब के लिए। पत्रकारिता कर्मचारिता में बदल चुकी है यह उस दौर की बात नहीं रही जब कलम को लोग तलवार और तोप से भी ज्यादा कारगर मानते थे। कलम काली स्याही का विमुक्त पंछी था, है, और रहेगा, लेकिन तब जब इसकी आजादी को कर्मचारिता नहीं पत्रकारिता बनाकर रखी जाए। राधारी सिंह दिनकर की कलम या तलवार इसी कड़ी का एक रूप है... स्वतंत्र लेखक को आज धन की कमी है। जिसके पास धन है वे पत्रकार और लेखक नहीं बल्कि कर्मचारी हैं एक उद्योग के एक कार्पोरेट के। ...

लड़कियों को अखबारों से सिर्फ सात्वना मिल रहा काम नहीं

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 और इसे क्या कहें पुरुषवादी सोच न कहें तो कि अखबारों में लड़कियों के लिए जगह तक नहीं है। जगह तो खत्म किया हीं झुठी सात्वना भी दे रहे हैं इससे ज्यादा दुखद और क्या होगा। अखबारों में बेटियों को बचाने के लिए मुहिम चल रहा है, कई अखबार और चैनल तो विधिवित इसकी शुरूआत कर दिए हैं लेकिन वास्तविकता देखकर आप दंग रह जाएंगे। छत्तीसगढ़ हो या मध्यप्रदेश या देश की राजधानी हर जगह यही हाल है। अखबारों और टीवी चैनलों के मीडिया जगत में लड़कियों के लिए जगह खत्म हो गई है। नेशनल टीवी और बड़े अखबारों में महिला न्यूज रीडर को देखकर हर मां-बाप सोचता है कि उसकी भी बेटी इसी तरह बड़े लोगों का इंटरव्यू ले। उनसे जनता के अधिकार के लिए बहस करे, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो मीडिया में सिर्फ नाम का बीटिया बचाओ, बेटियों को आगे बढ़ाओ अभियान चल रहा है। वास्तव में मीडिया में सबसे ज्यादा बेटियों का शोषण हो रहा है। जो बेटियां मीडिया में है उन्हें महिलाओं और महिला बाल विकास से संबंधित ही सॉफ्ट बीट दिए जाते हैं, उनसे कभी भी ऐसे काम नहीं लिए जाते जिससे उनका विकास हो सके। पुरुषवादी मीडिया ने महिलाओं को आज बर्बादी के कट...

तमिलनाडू में तबाही

देश भोपाल गैस कांड की 31वीं वरसी मना रहा है। पूरा देश यहां के लोगों को नहीं मिले न्याय के लिए रो रहा है, इसी के साथ प्रकृृति ने तमिलनाडू में कहर बनकर बरपा है। पूरे देश का ध्यान आज तमिलनाडू पर है। यहां भरे पानी ने लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। वहां के लोग सुरक्षित हो दुआएं की जा रही है। यह 31 साल बाद 2-3 दिसंबर की रात फिर से याद दिलाती है। ऐसी ही ठंडी रात थी वो 2-3 दिसंबर की रात जब तन को आधे-अधूरे कपड़े से ढंके भोपाल के लोग नींद में सोते रह गए थे। तमिलनाडू में भी वहीं 1,2 और 3 दिसंबर का समय है जहां लोग भारी बारिश से परेशान हुए हैं। यहां का जनजीवन इतना प्रभावित हो गया कि सेना को कमान सम्हालनी पड़ी है। प्रकृति हमें संदेश दे रही है, हम लगातार प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। आलम देश की राजधानी दिल्ली का भी कुछ ठीक नहीं। वहां प्राकृतिक के साथ इतना ज्यादा खिलवाड हो रहा है कि आने वाले समय में वहां भी हादसा होने की आशंका है। वहां एक गोल परत सा जम गया है धूल और धुएं से बने धुंध का। गैस के गुबार सा हो गया है पूरा शहर। यह भी बोल सकते हैं कि सिलेंडर बन चुका है दिल्ली। प्रकृतिक हादसों को...

और सोता रह गया था भोपाल शहर

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प्राकृतिक खूबसूरती का नायाब तोहफा भोपाल आज से 31 साल पहले 2-3 दिसंबर की रात सोता रह गया था। करीब 70 एकड़ जमीन के टुकड़े पर खड़ा यूनियन कार्बाइड का कारखाना संसार की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी का खामोश सबूत बन गया है। कभी इसके स्थापना पर नए उद्योग के शुभ समाचार के रूप में आया और आखिरकार दुनिया के सबसे दर्दनाक हादसे की वजह बन गया। शहर के सीने पर बंधे यह एक टाइम बम की तरह था। जिसने भोपाल शहर को नींद से उठने तक नहीं दिया, और जो लोग उठे वे फिर कभी चैन से सो नहीं पाए। वे उस दर्द को आज भी महसूस कर रहे हैं, जो उस समय उन्हें मिली।  खूबसूरत भोपाल के दामन में एक ऐसा गहरा दाग, जो दुनिया की याद्दाश्त में हमेशा के लिए दर्ज हुआ। दिसंबर की आहट होती है तो अचानक दो-तीन तारीख की उस भयावह ठंडी रात की याद भी ताजा हो उठती है, जिसकी हवाओं में एमआईसी की चुभती गंध समाई थी।  अगली सुबह यह नाम पहली बार सुना गया था-मिथाइल आइसो साइनेट। करीब 15 हजार बेकसूर लोग मारे गए थे। पहली बार श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ गई थी। यह दिल दहलाने वाला एक आंकड़ा भर नहीं है। जिंदा बच गए हजारों दूसरे लोगों ...

वो कत्ल की रात थी

भोपाल में 2-3 दिसंबर की रात 1984 में कत्लेआम किया गया। इससे प्रभावित 15000 लोगों ने अपने जान गवाएं और करीब 1.50 लाख लोंग आज भी उसका दर्द झेल रहे हैं। दर्द ऐसा जो असहनीय है इसलिए भी क्योंकि शासन, प्रशासन, कोर्ट किसी ने भी इस दर्द को दुर करने कुछ नहीं किया। कुछ करने का मतलब भी यह है कि मुख्य आरोपी को खुद सरकार ने विदेश पहुंचा दिया, बाकी छुटभैये आरोपी को भी कोई खास कार्रवाई नहीं किया। इतने बड़े हादसे के लिए जिम्मेदारों बचे रह गए। न शासन ने जिम्मेदारी ली न प्रशासन ने। हाल में न्यायिक जांच आयोग ने मामले की जांच भी किया तो वह भी बस नाम का। सवाल तो बनता है बॉस आखिर 31 साल तक न्यायलयों ने क्या किया? शासन ने क्या किया? और प्रशासन ने किया ही क्या? सवाल तो उठना ही है  चाहे वे देश की सरकार के तीन अंगो कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका पर हो या फिर भारत के संविधान भारत को एक सार्वभौमिक, समाजवादी गणराज्य पर। कुछ नहीं किया गया। भोपाल गैस त्रासदी से प्रभावित लोगों के लिए किसी ने कुछ नहीं किया। इसलिए तो वह कत्ल की रात थी। चारो तरफ सिर्फ कत्ल किया गया, कत्लेआम किया गया, जगजाहिर कत्ल सरेआ...

15 हजार लोगों की मौत के 31 साल बाद नहीं दिला पाए न्याय, लानत है व्यवस्था पर

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भोपाल के हजारों लोगों की इहलीला एक झटके में समाप्त कर देने वाले आज 31 साल बाद भी आजाद हैं। कुछ दोषी पकड़े भी गए तो उन्हें सरकारों ने निजी लाभ के लिए विदेश भेज दिया। यह न्याय व्यवस्था पर सवाल है, सरकार पर सवाल है कि इनके दोषियों को 31 साल बाद भी सजा नहीं हुआ। लानत है ऐसे कानून, न्याय और सरकारों पर जिसने पूरे भोपाल को मुर्दा बनाने वालों को छोड़ दिया। शर्म आनी चाहिए ऐसी कानून को न्याय व्वस्था को और सरकार को जिसने 15 हजार लोगों को न्याय नहीं दे पाए। शर्म आनी चाहिए सुप्रीम कोर्ट को जबलपुर हाईकोर्ट को और भोपाल के जिला कोर्ट में बैठे न्यायधीशों को जो सामूहिक मौत के जिम्मेदारों को सजा नहीं दे सके। उन मरने वालों को न्याय नहीं दे सके। ठिक 31 साल पहले की बात कर रहा हूं, यह वही समय था जब आधी रात थी। जब पूरा भोपाल चैन की नींद सो रहा था, और सोता रह गया था। भोपाल की 15 हजार से अधिक जनता दूबारा नहीं जग सकी थी। भोपाल के यूनियन कार्बाइड नामक कम्पनी जहां किटनाशक बनता था के कारखाने का टैंक नंबर 610 में एक विस्‍फोट होने, और उसके बाद रिसने वाली जहरीली गैस ने लगभग 15,000 से अधिक लोगो को मौत दे...

पुरुषवाद का उदाहरण है महिलाओं का मंदिर-मस्जिद में प्रवेश पर रोक

हिंदू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई हर वर्गों में महिलाओं पर अत्याचार है। एक ओर जहां देवी पूजन कर मातृ को आराध्य माना जाता है वहीं महिलाओं को मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारे में प्रवेश पर कही रोक होता है तो कहीं पूजा न ही करने दिया जाता। हालिया रिपोर्ट 28 नवंबर को देखने को आई है। इसमें दिखाया गया है कि शिंगणापुर में स्थापित शनि भगवान के मंदिर में एक महिला ने पूजा किया। इससे पहले हनुमान को छुने पर प्रतिबंध है। वहीं मस्जिद में भी कुछ समय पहले महिलाओं के प्रवेश पर वर्जित किया गया है। राजस्थान की बात की जाए तो वहां महिलाओं को सिर हमेशा ढंके रहना होता है। पुरुष प्रधान देश में महिलाओं के पूजन पर प्रतिबंध क्यों नहीं। नवरात्रि में नौ दिन उपवास बंद क्यों नहीं होता, लोग पुरुषों से ही शादी क्यों नहीं कर लेते उन्हीं से बच्चा भी पैदा करें। महिलाओं में मासिक धर्म के कारण उन्हें अछूत माना जाता है जबकि इसी देश में एक मंदिर ऐसा है जहां पर महावारी को प्रसाद और उन्नति के रूप में पूजा की जाती है। महावारी उन्नति का प्रतिक है। मंदि-मस्जिद में प्रवेश पर रोक पुरुषवाद का स्पष्ट उदाहरण है। महिलाएं भी उसी ...