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दौलतवालों की दमदार दिवाली, किसान के हिस्से में क्या होगी

दिवाली आ गई है, उससे पहले धनतेरस है। इस धनतेरस पर खरीददारी करने इतना आसान नहीं होगा। खरीददारी करने के लिए दौलत, दिल और दम जिसके पास होगा वहीं खरीददारी कर पाएगा। यह दिवाली तंगी में बितना तय हो गया है। दाल, तेल और खाद्यान के बढ़े भाव और देश में सुखा की स्थिति ने दिवाली को दिल से मनाने के लिए तैयार नहीं होने दे रहा है। दिल भी कैसे मान जाएगा कि किसान जो हमें खिलाने के लिए रात-दिन एक करते हैं वे इस दिवाली खाली पेट होंगे। उनकी दिवाली कैसे मनेगी यह किसी ने सोचा है, शायद नहीं... यह सोचने का वक्त किसके पास है। दौलत है दिवाली दिल से मनाएंगे। काश यही किसान समझ जाते की दौलत के लिए पुंजी पतियों को वे अपना जमीन बेंच देते और दौलत लेकर देश को भूखे मरने छोड़ देते, लेकिन वे ऐसा करते नहीं क्योंकि भले ही वे गरीबी में आत्महत्या कर लेंगे, लेकिन किसी को भूखे मरने नहीं देंगे। उनसे दौलत मंद कौन हो सकता है, लेकिन यह वर्ग उतना ही उपोक्षित और निरीह रहा है। किसान सदियों से गरीब है, गरीब रहा है और गरीब रहेगा। वजह इसके पीछे है पहले राजाओं ने फिर सामंतों ने उसके बाद साम्राज्यवादियों ने सिर्फ और सिर्फ किसानों का शोषण...

राज्योत्सव नहीं मनाने पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नाम पत्र

माननीय मुख्यमंत्री जी, तीन दिन का राज्योत्सव नहीं मनाने से सुखा के संकट से नहीं उबर पाएंगे। इसके लिए होगा कि 365 दिन जो आप राज्य में बेरोजगारी है उसे खत्म किजीए। लोगों को रोजगार मिलेगा तो वे महंगा खाना खाने को तैयार हो जाएंगे। इससे जिस किसान के विकास की बात देश आजादी के बाद से सुन रहा है उसका भी भला होगा। उसके उपज के वाजिफ रेट दिलाएं ताकि उनका विकास हो सके। जितना उद्योग लगाना जरूरी है उतना ही जरूरी है किसान खेत में काम करें। नदियों पर बांध बनाने की जरूरत है, सिर्फ कोयला के खान से कोयला निकालने से कुछ नहीं होगा, यहां पर पावर प्लांट लगाने से कुछ नहीं होगा प्लांट लगाना भी जरूरी है पौधे की संख्या लगातार घट रही है। जगंल के क्षेत्र घट रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का सिर्फ उत्खनन नहीं किया जाए, बल्की सौर्य उर्जा का भी उपयोग हो, नदियों का कचरा डालने और उद्योगों कि गंदगी बहाने, शहर के नालियों को उससे जोड़ने का बजाय उसकी गंदगी दूर करने पेय जल लेवल ठीक होगा। उस पर बांध बने यह जरूरी है। इस ओर आप का ध्यान केंद्रीत हो ताकि किसानों के साथ ही बेरोजगारों का विकास हो सके। माननीय आपको उम्मीद के साथ जनता ...

पारिवारिक विवाद में गई दलित बच्चों की मौत पर आंसू बहाने वालों अब बताओ ब्राह्मण का बच्चा क्यों मरा

हरियाणा में पारिवारिक विवाद में गई दलित बच्चों की मौत पर आंसू बहाने वालों अब बताओ कि छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में ब्राह्मण का बच्चा क्यों मरा। इस पर तुम्हारी आवाज क्यों बंद है। वह इलेक्ट्रानिक मीडिया क्या सिर्फ दिल्ली और दिल्ली के हगे का गुह उठाने के लिए नोयड़ा में बैठी है। देश के दुरस्थ अंचलों की आवाज क्यों नहीं उठ रही है। बिलासपुर में हाईकोर्ट है यहां कि आवाज नेशनल स्तर पर क्यों नहीं उठाई गई। एसडीएम कोर्ट के सामने आखिर एक ब्राह्णण का बच्चा आत्मदाह क्यों कर लिया। सरकार हाईकोर्ट से यह जगह महज 6 किमी दूर था न। न्यायधानी में अधिकारियों कि लापरवाही से नसबंदी, न्यायधानी में अधिकारियों की वजह से आत्मदाह आखिर क्यों नहीं आए वे लोग बोलने आखिर क्यों नहीं उसके लिए हो रहा है देश की मीडिया में चर्चा। देश की मीडिया आखिर चूप क्यों है खाज तक से लेकर रंडी टीवी तक सब के सब बंद क्यों है। कांग्रेस शासन काल में बना कानून कांग्रेसियों की मौत की वजह क्यों बन रही है? कांग्रेस शासन काल में 1947 से 1950 तक कानून और संविधान बना है। इसी में से कुछ कानून 107, 116 भी बाद में बन गया। इसी कानून के कारण बिल्हा में द...

20 दिन दो मौत...वजह एक फंडा 107,116

कैसी कानून व्यवस्था है बिलासपुर में... 107, 116 की पेशी के बाद जमानत नहीं मिलने से हाईकोर्ट से महज 6 किमी दूर दो लोगों की मौत हो चुकी है। यह जो धारा है किसी हत्या या बलात्कार करने के लिए नहीं बल्कि सामान्य शांति भंग के लिए उपयोग की जाती है। जानकार कहते हैं कि इसकी जमानत मुचलके पर थाने से हो जाती है। इसके बाद भी दो की मौत हो जाना कुछ तो वजह रही होगी। यह न्यायधानी है यहां कानून का मजाक बन गया है। न जाने न्याय के लिए और कितनी मौत देखनी होगी बिलासपुर के लोगों। केस 1  सेवती के जीवनलाल मनहर । 6 अक्टूबर को पेशी के बाद  सेवती के जीवनलाल मनहर को सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। उसे जमानत नहीं मिलने से पुलिस जेल भेज दी थी। देर रात उसे जमानत मिली। उसके खिलाफ गांव के सरपंच ने तालाब के विवाद में शांति भंग हो जाने की शिकायत किया था। यह मामला पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। इसके बाद भी उसे जेल भेजा गया। हलांकि जानकार कहते हैं कि 107, 116 में थाने से मुचलका पर जमानत हो जाती है, इसके बाद भी बंदपत्र प्रस्तुत करने पर एसडीएम ऐसे मामले में आरोपी के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई कर सकता है। हुआ ...

कानून का मजाक नहीं बने हाईकोर्ट से निवेदन बिल्हा मामले को संज्ञान में ले

बिलासपुर जल रहा है, कैसे उम्मीद करें कि नक्सलवाद मिट जाएगा। कानून से लोगों का भरोसा उठ रहा है लोग कहां जाए? कोर्ट के सामने आत्मदाह कोई मामूली नहीं, जेल में जमानत मिले व्यक्ति की मौत कोई मामूली नही। हाईकोर्ट से निवेदन है इस मामले में सवत: संज्ञान में लेकर पीड़ितों को न्याय दिलाएं। वाह रे न्याय व्यवस्था। आंतकी को बचाने सुप्रीम कोर्ट रात में खुल सकता है, लेकिन जमानत मिलने के बाद जेल से आरोपी नहीं छूट सकता कैसा कानून है यह कैसी न्याय प्रणाली है यह? - इन दुखद घटनाओं को देखकर भारत के  कानून को क्या नाम दूं...? - ओ जलता रहा और काले कोर्ट पहने, सफेद पोस लोग सब देखते रहे...? - ओ एक था और आप सौ...उसे बचा नहीं पाए लानत है आपको। बिलासपुर में 20 दिन दो मौत...वजह एक फंडा 107,116 107, 116 की पेशी के बाद जमानत नहीं मिलने से हाईकोर्ट से महज 6 किमी दूर दो लोगों की मौत हो चुकी है। यह जो धारा है किसी हत्या या बलात्कार करने के लिए नहीं बल्कि सामान्य शांति भंग के लिए उपयोग की जाती है। जानकार कहते हैं कि इसकी जमानत मुचलके पर थाने से हो जाती है। इसके बाद भी दो की मौत हो जाना कुछ तो वजह रही ...

गांधी परिवार के डीएनए का जांच जरूरी है, रोटी, कपड़ा और मकान की मांग जरूरी है

तूझे और क्या चिंता गांधी, तू तो चला गया इस जहान से। तेरे वारिशों का राज है वे ही हमराज हैं। हम कल भी आजाद नहीं थे आज भी आज़ाद नहीं हैं और कल भी नहीं होंगे। तेरे छर्रे का बनाया कानून गांधी हमें कल भी परेशान किया आज भी कर रहा है कल भी करेगा। नकल की आदत तेरी कल भी नहीं गई आज भी तेरे वंसजों में है और कल भी होगी। यह संतान तेरी गांधी न जायज है न नजायज है। यह कैसी संतान है गांधी नाम तेरा काम नेहरू का और वंश किसी और का गांधी। यह कैसी आजादी है गांधी की कुछ लोग सत्ता में हैं, कुछ लोगों के पास धन है। कुछ लोग देश चला रहे हैं और कुछ लोग आजाद है। आजादी के समय देखे तेरे सारे सपने अब पूरे हो गए गांधी। तू भी चला गया तेरे सपने भी चले गए हैं, हम ढो रहे हैं तेरे तथाकथित वंसजों की गांधीगिरी। तेरा वो सपना जो रोटी, कपड़ा और मकान का था उसका क्या हुआ गांधी। हद है बेशर्मियत की गांधी 70 साल पहले आजाद हुए और अब तक इस मामले में जवाब नहीं आया। हद है तेरे वंशजों का राज का जो अंग्रेजों से भी हरामी है। हरामी नहीं हरामखोर है गांधी। गांधी न किसी जात का है न पांत का यह हरामी खानदान है, जिसकी डीएनए की जांच होनी चाहिए। ...

शपथ कितने दिनों तक याद रहेगी

देश में बड़े जोर-शोर से स्वच्छता और अहिंसा का संकल्प लिया गया। महात्मा गांधी, लालबहादुर शास्त्री को याद किया गया। यह याद कितने दिनों तक रहेगी आने वाले वक्त में सड़क किनारे फैली गंदगी बताएगी। स्वच्छता के लिए बड़ी-बडी रैलियां की गई है, हर तरफ झाड़ू लगें है। यह याद रखना होगा इसे याद रखना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले भी कई बार इसके लिए मुहिम चलती रही हैं अब फिर चल रही हैं और आने वाले समय की मांग होगी इस मुहिम को जिंदा रखना। गंदगी जिस तेजी से बढ़ रही है वह देश के लिए घातक है इसे कम करना है तो लिए हुए संकल्प को याद करना होगा। हलांकि हमें भूलने की बड़ी बीमारी है, लेकिन हर वर्षी पर याद जरूर करते हैं। चाहे वो गांधी की बर्षी हो या नेहरू की। इनकी वर्षी तो हमें याद जरूर रहते हैं बस इसी का फायदा भी नरेंद्र मोदी ने उठाया है ताकि गांधीवादियों को स्वच्छता याद रहे। 

सबको अब पीतरों की याद आने लगी है, अब चले आओ

पितृ पक्ष शुरू हो गया है। सुबह से ही लोगों के घरों में अपने पितरों को बुलाने का दौर शुरू हो गया है। घर में चिड़ियों खास कर कौओं के लिए भोजन रखे जा रहे हैं। गायों की सेवा हो रही है, कुत्तों को भी रोटिया खिलाई जा रही हैं। प्रदुषित हो चुके तालाबों और नदियों में अपने जीवन को नर्क समान जीने वाले जीवों मछलियों को भी आटे के गोलिया खिलाई जा रही हैं। सब पितरों को मोछ प्राप्त कराना है। यह सब हमारे बच्चे भी देख रहे हैं। वे भी आने वाले समय में वही करेंगे जो हम कर रहे हैं। पूरी जिंदगी अपने मां बाप को दो-वक्त की रोटी तक समय पर नसीब नहीं होने देते। पहले-पहल वे हमे अच्छे कपड़े मिले, पुस्तक मिले शिक्षा मिले इसके लिए परेशान रहते हैं तब समय पर नहीं खा पाते। फिर हम उन्हें वृद्धाश्रम भेजकर खाना ही नहीं देते। मरने पर उनकी आवभगत करते हैं क्या फायदा। इससे तो अच्छा है यह पितृपक्ष कभी आए ही न। पितृ पक्ष परिवार को जोड़ने के लिए होता है। परिवार को समूह बनाने के लिए होता है। सामूहिक परिवार का अंग है पितृ पक्ष। यह न सिर्फ पितरों को बुलाने का बल्कि पुर्वजों को याद करने के लिए एकजुटता के लिए है। इसमें समाज और वायु मंडल...

कलम का मामला है कड़क से अकड़, पकड़ रहिए साहब

यह लेख कलम की पूजा करने वाले पत्रकारों के लिए है। पत्रकारों में जिस तेजी से नैतिकता के गिरने का दौर शुरू है आने वाले समय में लगता नहीं है कि पत्रकारिता सही मायने में हो पाएगा। मीडिया पर पहले से विज्ञापन तंत्र हावी है। वहीं मालिकाना हक के कारण पंगुता की कगार पर पहुंच चुकी पत्रकारिता में कलम पकड़ने वालों की नैतिकता का गिरना लाजमी तो है, लेकिन जो लिखना चाहते हैं और अपनी पत्रकारिता बनाए रखना चाहते हैं उनके लिए अकड़, पकड़ और कड़क बनाए रखना होगा। लिखे तो क्या लिखे जब पढ़ने वाले की फाड़ कर न रख दे। कुछ साल पहले एक पेन के प्रचार में इंटरव्यू लेने वाला पत्रकार मंत्री से सवाल करता है। बारिश वाली सीन में मंत्री जवाब देने की जगह उल्टा सवाल करता है क्या करोगे लिखकर। उस प्रचार वाले पत्रकार ने बड़ी ही सहजता से जवाब देता है लिखकर फाड़ देंगे। यही होना भी चाहिए। लिखिए तो फाड़ देने वाले अंदाज में। माना यह अब मुमकिन नहीं लेकिन जहां है वहां तो लिखिए। दुश्मनी मत लिजिए लेकिन सच को लिखन के लिए अपने पिछवाड़े में दम तो रखिए। पुस्तक को पठन के दौरन एक लाइन “बलिया जिला घर बा त केकरा से डर बा” इस डर को घर से खत्म करना होगा...

पत्रकारिता करना है तो दिल में आग और आंखों में अंगारे रख लो

पत्रकारिता करना है तो दिल में आग और आंखों में अंगारे होना चाहिए वर्ना रांड बजाना और भांड गाना तो पुरी मीडिया गा रही है उसमें और आपमें फर्क ही क्या है --------------- यह लेख कोरी बची पत्रकारिता जो सोशल मीडिया के माध्यम से ही जीवित रखी जा सकती है। मीडिया कार्पोरेट के हाथों बिक चुकी है। वह भी इतने गंदे तरिके से कि पत्रकारिता के स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले वे सारे हवा हवाई सिर्फ नमूने लगते हैं। वो कहते हैं न थ्योरी और प्रेक्टिकल में फर्क होता है। बस मीडिया में वह ही चल रहा है। मीडिया माने रांड चकला में बैठी हुई रांड जिसे पैसा दो और सेक्स कर कुछ समय के लिए संतुष्टी पा लो। सही मायने में अब पत्रकारिता बची है तो सिर्फ सोशल मीडिया पर जहां खुलकर लिख भी सकते हैं और बजा भी सकते हैं। वर्ना खाना तो भांड भी गाते थे राजाओं के समय में। पत्रकारिता में संपादक कुछ नहीं होता, प्रबंध संपादक ही सब कुछ होता है। इस बात को पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले दिमागी रूपी से समझ ले यही सही होगा। दिल में आग है तो उसे जलाए रखो और सोशल मीडिया के माध्यम से उस आग को लोगों के आखों में अंगारे बनाओ। जुड़ जाओ किसी भी मीडिया सं...